इसमें कोई शक नहीं है कि उत्तर प्रदेश राष्ट्र की राजनीति के लिहाज से सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण राज्य है। देश की 542 लोकसभा सीटों में से अकेली 60 सीटें उत्तर प्रदेश में है। जब तक उत्तर प्रदेश और बिहार मे मजबूत होकर कांग्रेस वहां से ज्यादा सीटें नहीं लातीं, वह केन्द्र में अपने बूते सरकार बनाने की सोच भी नहीं सकती।

सवाल उठता है कि आखिरकार कांग्रेस ने उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों मंे अपना प्रभाव खो कैसे दिया। क्या आपातकाल के कारण ही ऐसा हुआ? इन्दिरा गांधी के समर्थ्रक इसे नही ंमान सकते। उनका कहना है कि इन राज्यों में कांग्रेस के पतन के अनेक कारण हैं। 1960 और 1970 के दशक में कांग्रेस वहां मजबूत थी। उसका कारण उसका वहां एक मात्र राजनैतिक दल होना था। उस समय पार्टी में उन राज्यों में बड़े बड़े नेता थे, जिनका अपना जनाधार था और उनके जनाधार के कारण कांग्रेस की वहां मजबूती थी। तब जाति और धर्म आधारित पार्टिया वहां नहीं थीं।

1952 से 1967 तक तो कांग्रेस ने केन्द्र और देश के लगभग राभी राज्यों में शासन भी किया। 1967 के पहले कांग्रेस ने लोकसभा की सीटों के 73 फीसदी पर सफलता पाई थी। उसी तरह विधानसभाओं में भी कम से कम इसके पास 60 फीसदी विधायक हुआ करते थे। यदि साफ साफ विश्लेषण किया जाए, तो पता चलता है कि कांग्रेस का असली पतन 1980 के दशक के अंत में होना शुरू हुआ था। उस समय तक उसने देश की आबादी के एक बड़े हिस्से पर अपना असर खो दिया था। खासकर मुसलमान 1980 के अंत आते आते उससे अलग हो गए थे। 1989 मंे कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश और बिहार में सत्ता गंवा दी थी। उसके बाद दोनों राज्यों में यह अपना खोया हुआ गौरव नहीं प्राप्त कर पाई।

इन्दिरा गांधी के समर्थक आहत है कि इन दोनों राज्यों में पार्टी के पतन के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया है। यदि उनसे बात की जाए, तो वे वहां पार्टी के पतन के लिए अनेक कारण बताते हैं। पहला कारण तो यह है कि 1970 तक कांग्रेस देश भर में एक बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित थी, जो अनेक वर्गों, समूहों और समुदायों को अपने साथ जोड़े हुए थी। लेकिन बाद में सभी समूहों की आकांक्षाओं को पूरा करने मे वह विफल होती गई और अनेक जाति और सांप्रदायिक संगठन मजबूत होते गए। कांग्रेस के अंदर से ही अनेक मजबूत नेता पार्टी से निकलकर क्षेत्रीय पार्टियां बनाते रहे। कांग्रेस का अनेक बार विभाजन हुआ। आज भी देश भर में अनेक कांग्रेस पार्टियां हैं। इन सबके कारण मूल कांग्रेस बहुत कमजोर हो चुकी हैं

पार्टी ेके चरित्र में भी भारी बदलाव आया है। पार्टी के अंदर लोकतंत्र का अभाव हो गया है। चुनाव नाम मात्र के होते हैं। सबकुछ ऊपर से नामांकित होता है। कांग्रेस पार्लियामेंटरी बोर्ड का नाम निशान तक नहीं रह गया है। कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक भी अब बहुत कम होती है। नीचे से पार्टी को मजबूत करने की कोशिश भी नहीं होती है। पार्टी के अंदर हवावाज नेताओं की तूती बोलती है। चापलूसों का राज चलता है।

पार्टी अब पूरी तरह से सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर आश्रित हो गई है। उन दोनों के अलावा पार्टी में और कोइै ऐसा नेता नहीं है, जो चुनावी सभाओं में भीड़ आकर्षित कर सके। राहुल और सानिया की सभाआंे में जुटी भीड़ को वोट में बदलने क ेतंत्र का भी पार्टी के अंदर अभाव होता जा रहा है।

कांग्रेस की जीत का जो सामाजिक समीकरण था, वह ध्वस्त हो गया है। ब्राह्मण व अन्य ऊंची जातियां, अनुसूचित जाति और मुसलमान पार्टी के मुख्य सामाजिक आधार थे। उत्तर प्रदेश में यह आधार अब खिसक चुका है। ऊंची जाति के लोग भाजपा की ओर चले गए और मुस्लिम व अनुसमचित जाति के लोग जनता दल, समाजवादी पार्टी व बसपा के साथ हो लिए। उत्तर प्रदेश में तो कांग्रेस अब तीसरे या चौथे नंबर की पार्टी बन गई है। इस तरह से कांग्रेस का ऐसा पतन हो गया है कि इसके उत्थान के लिए बहुत मेहनत और प्रतिबद्धता चाहिए। (संवाद)