लेकिन हुआ इसका ठीक उलटा। कांग्रेस की सीटें 53 से बढ़कर 126 सीटों वाली विधानसभा में 78 हो गई। इसके कारण कांग्रेस को अपने बूते ही बहुमत प्राप्त हो गया। पिछली विधानसभा में यह बोडो पीपुल्स फ्रंट के साथ मिलकर सरकार चला रही थी। अब तो सरकार चलाने के लिए उसे अब उस सहयोगी के सहयोग की भी जरूरत नहीं रही।

इस अप्रत्याशित विजय ने मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के सामने एक अप्रत्याशित समस्या खड़ी कर दी। नए विधायक मंत्री बनने के लिए दबाव डालने लगे। वे दिसपुर तक ही अपनी बेचैनी का इजहार करके संतुष्ट नहीं हुए, बल्कि दिल्ली तक दौड़ लगाने लगे। उसके बाद तो तरुण गोगोई ने मंत्री चुनने का जिम्मा ही कांग्रेस आलाकमान के ऊपर छोड़ दिया। इसके कारण मंत्रिमंडल के गठन में 9 दिन का विलंब हुआ।

मंत्रिमंडल में कुछ पुराने चेहरे नहीं लिए जा सके। उसमें 8 नए मंत्री आ गए। पिछली विधानसभा क स्पीकर और डिपुटी स्पीकर को भी मंत्रिमंडल में लिया गया। जिन लोगों का मंत्रिमंडल में दुबारा नहीं लिया गया, उनमें भूमिधर बर्मन भी एक हैं। वे एक बार तो हितेश्वर साइकिया के मरने पर कार्यवाहक मुख्यमंत्री की भूमिका तक निभा चुके हैं।

मंत्री बनने की मांग सिर्फ विधायकों की तरफ से निजी तौर पर ही नहीं आई, बल्कि पार्टी के चाय प्रकोष्ठ ने भी अपने में से कम से कम दो मंत्री बनाने की माग रख दी। उसका कहना था कि चाय मजदूर समुदाय के लोगों के समर्थ्रन के कारण उनके इलाके से 32 विधायक जीत कर आए। गौरतलब है कि राज्य की 36 विधानसभा सीटों पर चाय बगान मजदूरों की भूमिका निर्णायक होती है।

पर गोगोई की सबसे बड़ी चुनौती बोडो जनजाति की आकांक्षाओं को पूरा करना है। पिछली विधानसभा में बोडो पीपुल्य फ्रट के 11 विधायक थे और सरकार में 3 मंत्री थे। इस बार 12 विधायक जीत कर आए हैं। जाहिर है सरकार मंे वे बेहतर प्रतिनिधित्व चाहते हैं। पर कांग्रेसी विधायकों की ओर से मांग इतनी ज्यादा थी कि गोगोई अपने सहयोगी दल के एक ही विधायक को मंत्री बना सके। मुख्यमंत्री को अपनी पार्टी के लोगों ने यादा दिलाया कि उस पार्टी के तीनों मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के जबर्दस्त आरोप हैं और बदली हुई परिस्थितियों में उस पार्टी का सरकार में लेने की जरूरत ही नहीं है। कैबिनेट में एक ही जगह पाकर बोडो खुश नहीं हैं। अब वे चाहते हैं कि निगमों मंे उनके लोगों का चेयरमैन बगैरह बनाया जाए।

गौहाटी के राजनैतिक पंडितों का मानना है कि अब वहां अलग बोडोलैंड की मांग की आशंका और भी बढ़ गई है। अलग राज्य की मांग उनकी पुरानी मांग है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी यह मांग कमजोर हो गई थी। अब सत्ता से असंतुष्ट होने के कारण वे अपनी मांग पर फिर वापस जा सकते हैं। (संवाद)