वह अन्ना द्वारा प्रभावी लोकपाल कानून बनाने के प्रयासों को कमजोर करना चाह रही थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ सिर्फ अपनी थोथी प्रतिबद्धता दिखाकर सरकार एक ऐसा लोकपाल बनाना चाहती है, जो मुख्य सतर्कता आयोग की तरह नकारा और कमजोर हो, लेकिन अन्ना और उनकी टीम के लोग एक ऐसा लोकपाल बनाना चाहते हैं, जो वास्तव में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में कुछ कारगर हो। सरकारी और अन्ना की ठीमों के बीच मसौदा समिति की बैठकों में जबर्दस्त तनाव रहता है और सरकारी पक्ष अन्ना टीम को गुमराह करने में सफल नहीं हो पा रहा है।
अन्ना टीम के खिलाफ उसी भड़ास को निकालने के लिए प्रणब मुखर्जी ने चार मंत्रियों के साथ हवाई अड्डे पर बाबा रामदेव की ऐसा स्वागत किया, जिससे बाबा का कद भले बहुत ऊंचा हो गया हो, लेकिन सरकार की अपनी प्रतिष्ठा काफी गिर गई। प्रणब मुखर्जी और कपिल सिब्बल उस मसौदा समिति के सदस्य भी हैं जो लोकपाल विधयेक का मसौदा तैयार कर रही है। वे दोनों बाबा की अगवानी करने के लिए दिल्ली हवाई अड्डे पर दों अन्य मंत्रियों को लेकर इसलिए पहुंच गएए ताकि वे टीम अन्ना को यह दिखा सकें कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे असली योद्धा वे नहीं हैं, बल्कि बाबा रामदेव हैं। सरकार बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले देश के सबसे बड़े योद्धा के रूप में देश और दुनिया में प्रोजेक्ट करना चाहती थी। इसके पीछे उसका एक और आकलन था। अन्ना को रास्ते पर लाना सरकार के लिए इसलिए कठिन था कि वे गांधीवादी जीवन शैली अपना रहे हैं और उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। किसी चीज का डर दिखाकर सरकार उनको ब्लैकमेल नहीं कर सकती। यही उनकी टीम के अन्य सदस्यों पर भी शायद लागू होता है, हालांकि शांति भूषण से संबंधित कथित सीडी के द्वारा उसने उनके और उनके बेटे प्रशांत भूषण पर दबाव डाला और अन्ना टीम की भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रतिबद्धता पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया, लेकिन बाप- बेटों ने सरकार द्वारा फैलाए गए उन दुष्प्रचारों का माकूल जवाब दिया और अपने खिलाफ हो रहे दुष्प्रचार का सामना किया। मसौदा समिति की बैठकों में अभी भी बाप बेटे सरकारी सदस्यों को परेशान करते हैं। शांति भूषण का अपना कद भी सरकार के वरिष्ठतम सदस्य प्रणब मुखर्जी से भी ऊंचा है। श्री भूषण 1977 की पहली गैर कांग्रेसी सरकार में कानून मंत्री रह चुके हैं। उसके पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट में उस मुकदमे में वे राजनाराण के वकील थे, जिसमें इन्दिरा गांधी मुकदमा हार गई थीं और उस हार के कारण ही देश में आपातकाल लगा था।
जाहिर अन्ना टीम सभी तरह से सरकारी ठीम पर भारी पड़ रही है। इसलिए सरकार ने रामदेव को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाला सबसे बड़ा योद्धा अन्ना टीम को नीचा दिखाने के लिए ही प्रोजेक्ट किया। लेकिन बड़ा योद्धा बनाना ही काफी नहीं था। उसके बाद उस बड़े योद्धे से अपने लिए प्रमाणपत्र भी सरकार चाहती थी। सरकार चाहती थी कि रामदेव देश को बता दें कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ वास्तव में बहुत गंभीर है। उनसे यह प्रमाणपत्र पाकर सरकार अन्ना टीम कोे पछाड़ना चाहती थी। सरकार समझ रही थी कि रामदेव के पास खोने के लिए बहुत कुछ है। उनके पास करोड़ों की संपत्ति है, जो उन्होंने बहुत ही कम समय में बना ली है। सरकार को लग रहा था कि वैसा करने में उन्होंने देश के अनेक कानूनों का उल्लंघन किया होगा। इसलिए वे दबाव में लाए जा सकते हैं। सुबोध कांत सहाय ने रांची मे खाद्य संस्करण मंत्री की हैसियत से एक फूड पार्क बनवाया है। उसमें बाबा रामदेव को भी जमीन आबंटित की गई है। श्री सहाय को लगा होगा कि उस उपकार के दबाव में अथवा जमीन के आबंटन के रद्द होने के डर से बाबा दबाव में रहेंगे और वे सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ गंभीर होने का सर्टीफिकेट देते रहेंगे। इसके कारण कुछ किए बिना ही सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मूछ पर ताव देती रहेगी। इसकी शुरुआत बाबा को रामलीला मैदान के अपने अनशन को शुरू होने के बाद जल्द ही समाप्त करने से होती।
लेकिन सरकार का रामदेव के बारे में आकलन गलत साबित हो गया। सरकार ने जो वादे किए थे, उससे वे संतुष्ट नहीं थे। फिर अन्ना हजारे ने कह रखा था कि वे 5 जून को बाबा के अनशन के समय कुछ घंटों के लिए उनके साथ होंगे। गौरतलब है कि अपने इस आंदोलन से बाबा ने अन्ना को पूरी तरह अलग रखा था, लेकिन वे उन्हें अपने मंच पर आने से रोक नहीं सकते थे। और सरकार चाहती थी कि अन्ना मंत्र के पास फटके तक नहीं। बाबा खुद कह चुके हैं कि कपिल सिब्बल ने उनसे कह रखा था कि यदि अन्ना उनके साथ मंच पर दिखाई पड़े तो फिर सरकार अपना कोई वादा पूरा नहीं करेगी। बाबा के सामने साफ जाहिर हो गया था कि सरकार की मंशा अन्ना के खिलाफ उनका इस्तेमाल करना है, लेकिन सरकार का दुर्भाग्य यह था कि बाबा कोई राजनीतिज्ञ नहीं हैं, जो अपनी राजनीति के लिए समझोते करने लगें। वे मंत्रियों के सामने भले ही कुछ कमजोर पड़ जाते हों, लेकिन उनसे दूर होने के बाद वे अपने रौ में आ जाते थे। यही कारण है कि भारी दबाव में उन्होंने बालकृष्ण से एक सहमति पत्र लिखवा डाला, लेकिन मंत्रियों से दूर जाने के बाद उन्हें लग गया कि उनके साथ वह पत्र लिखवाकर छल किया गया है। राजनेताओं के दबावों से बचने की कला बाबा नहीं जानते हैं, इसलिए वे दबाव में आ गए। यदि किसी शांतिभूषण जैसे व्यक्ति को वे अपने साथ रखते तब उनको चकमा देने में मंत्री सफल नहीं हो पाते।
बहरहाल, बाबा ने उस पत्र को छलावा मानकर उसे मानने से इनकार कर दिया और रामलीला मैदान में डटे रहे। साघ्वी रितंभरा और अशोक सिंघल की उपस्थिति से सरकार को डर नहीं था। लेकिन 5 जून को अन्ना के भी उस मंच पर आ जाने का डर प्रणब और कपिल सिब्बल को जरूर सता रहा होगा, क्योंकि वे उस मंच पर आकर लोकपाल विधेयक मसौदा समिति में सरकारी रुख का कच्चा चिट्ठा खोलते और खुद भी बाबा के साथ हो जाते। इसलिए सरकार के लिए जरूरी हो गया था कि अन्ना के वहां आने के पहले ही सत्याग्रह खत्म हो। बाबा सत्याग्रह से पीछे हट नहीं रहे थे। सरकार ने जो बाबा का जो भव्य स्वागत किया था, वह उसके काम नहीं आ रहा था। इसलिए अब सरकार ने सत्याग्रहियों को ही वहां से बलपूर्वक हटाने का फैसला किया और उसके लिए रात का समय चुना, ताकि वह आपरेशन बिना किसी खास बाधा के समाप्त हों।
सरकार ने रामलीला मैदान से सत्याग्रहियों को तो हटा दिया है, लेकिन इससे उसकी प्रतिष्ठा और भी गिर गई है। यह कहकर कि वहां सत्याग्रह की नहीं, बल्कि योग करने की इजाजत सरकार ने दी थी, सरकार अपनी उस कार्रवाई को सही नहीं बता सकती, क्योंकि उसे पहले ही पता था कि वहां क्या होने वाला है। जो लोग वहां आ रहे थे, वे सत्याग्रह करने के लिए ही आ रहे थे। इसलिए सरकार को यदि वहां से हटाना था, तो पहले उन्हें वहां से खुद हट जाने का समय दिया जाना चाहिए था और उन्हें बता देना चाहिए था कि वे वहां अवैध तरीके से एकत्रित है। लेकिन सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया और रामलीला मैदान वे वह हुआ, जो शायद वहां पहले कभी भी नहीं हुआ होगा। इसके कारण कांग्रेस नेतृत्व की छवि भी खराब देश भे खराब हुई है। भट्टा पारसौल में पुलिस जवानों पर गोली चलने के बाद हुई कार्रवाई का विरोध करने वाले राहुल गांधी रामलीला मैदान मे ंशांतिपूर्वक सो रहे लोगों के ऊपर आंसू गैस के गोले चलाने पर चुप रहकर अपनी छवि खराब कर रहे हैं। जाहिर है कांग्रेस ने अपनी राजनैतिक मुश्किले बढ़ा ली है। (संवाद)
सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज
कांग्रेस ने अपनी मुश्किलें बढ़ा ली हैं
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-06-06 09:37
काले धन के खिलाफ बाबा रामदेव के अभियान से निबटने की जो रणनीति कांग्रेस ने बनाई, वह शुरू से ही दोषपूर्ण थी। सरकार काले धन के खिलाफ अपनी गंभीरता दिखाकर ही बाबा के अभियान से सफलतापूर्वक निबट सकती थी, लेकिन उसने बाबा को अन्ना कैंप के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, जो उसकी बहुत बड़ी भूल थी।