लेकिन अब कांग्रेस और केन्द्र सरकार कुछ आक्रामक मुद्रा में आ गई है और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को निहित स्वार्थी तत्वांे का खेल बता रही है। इसके लिए मौका रामदेव ने ही उन्हे दे दिया है। रामलीला मैदान में रामदेव के मंच पर साध्वी रितंभरा दिखाई पड़ गईं। वे बहुत दिनों के बाद सार्वजनिक रूप से दिखाई पड़ीं। इसके कारण सिविल सोसाइटी में ही दरार हो गई। स्वामी अग्निवेश ने इसके लिए बाबा रामदेव की आलोचना भी कर दी और कहा कि वे उस मंच पर नहीं जाएंगे, जहां साध्वी रितंभरा और अशोक सिंघल जैसे लोग बैठते हों। दूसरी तरफ लोकपाल मसविदा समिति के सदस्य संतोष हेगड़े ने कहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
आरएसएस ने पहले ही बाबा रामदेव के अभियान का खुला समर्थन कर दिया था। उसने अपने स्वयंसेवकों को उसमें भाग लेने की सलाह तक दे डाली थी। इसलिए साध्वी का उस मंच पर आना कोई अप्रत्याशित घटना नहीं थी। भगवा ब्रिगेड पर अभी आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के आरोप लग रहे हैं। उनके कारण कारण संघ के नेता रक्षात्मक मुद्रा में हैं। अब भ्रष्टाचार के मसले को उठाकर वे अपने ऊपर आतंकवाद के आरोपों से उबरना चाहते हैं। भाजपा भी यही रास्ता अपना रही है।
सिविल सोसाइटी के लोग राजनीतिज्ञों को अपने अभियान से अलग रखना चाह रहे थे। अन्ना का जब जंतर मंतर पर अनशन चल रहा था तो किसी भी पार्टी से जुड़े नेता को मंच पर आने की इजाजत नहीं दी गई थी। ओम प्रकाश चौटाला, अजित सिंह और उमा भारती को वहां से खदेड़ दिया गया था। अनशन की समाप्ति के बाद अपने रौ में अन्ना हजारे ने नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार की प्रशंसा भी कर दी थी। बाद में उन्होंने गुजरात में जाकर वहां के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाकर अपने आपको नरेन्द्र मोदी से अलग भी कर लिया।
लेकिन अन्ना हजारे के रास्ते पर बाबा रामदेव नहीं चल सके। उन्होंने राजनीतिज्ञों को भी अपने अभियान से जोड़ लिया। उनका एजेंडा भी राजनैतिक है और वे सोनिया गांधी के विदेशी मूल का जिक्र करना कभी नहीं भूलते। यह अभी साफ नहीं है कि भाजपा को रामदेव के अभियान से कितना फायदा होगा। भाजपा अपने आपको एक आधुनिक पार्टी के रूप में दिखाना चाहती है, जो खुलेपन की समर्थक है, लेकिन बाबा रामदेव का विदेशी कंपनियों और विदेशी ब्रांडों के खिलाफ बयान लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है। बाबा हिंदी के पक्ष में भी खूब बोलते हैं और क्रिकेट के खिलाफ बोलने मंे भी कभी नहीं चूकते। यानी भाजपा और बाबा रामदेव की सोच में काफी फर्क है।
अब भाजपा कांग्रेस और केन्द्र सरकार के खिलाफ काफी आक्रामक हो गई है। उसने बाबा रामदेव और उनके समर्थकों से रात में रामलीला मैदान खाली कराने की कार्रवाई के खिलाफ आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है और उस पर चर्चा के लिए संसद के विशेष सत्र बुलाने की मांग भी कर रही है। अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कमजोर कहने के अपने पुराने थीम पर भाजपा फिर जाती हुई दिखाई पड़ रह है। उसने रामलीला मैदान में शनिवार और रविवार के बीच वाली रात को हुई घटना की तुलना जालियांवाला बाग से करना शुरू कर दिया है।
कांग्रेस बाबा रामदेव के खिलाफ आक्रामक हो गई है। दिग्विजय सिंह बाबा को फ्रॉड और ठग कह रहे हैं। पर सवाल उठता है कि यदि बाबा ठग और फ्रॉड हैं, तो फिर केन्द्र सरकार ने उनको उतना ज्यादा महत्व क्यों दिया और हवाई अड़डे पर जाकर 4 मंत्रियांे ने उनकी प्रतीक्षा में पलक पांवड़े क्यों बिछाए?
बाबा रामदेव के अभियान के बाद मच रही अफरातफरी में सबसे बड़ा खतरा यह है कि कहीं एक मजबूत लोकपाल कानून का प्रयास खटाई में नहीं पड़ जाए। (संवाद)
भ्रष्टाचार विरोधी अभियान पर राजनीति का साया
लोकपाल विधेयक हो सकता है इसका शिकार
अमूल्य गांगुली - 2011-06-08 10:47
फजीहत के बाद कांग्रेस को अब कुछ राहत मिल रही है। इसका कारण यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी अभियान अब राजनैतिक रंग ले रहा है। जब तक यह गैर राजनैतिक लोगों के हाथों में था, तो केन्द्र सरकार और कांग्रेस के लिए उससे निबटना कठिन हो रहा था। इसके सामने देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी अपने आपको लाचार पा रही थी। जब केन्द्र सरकार के 4 मंत्रियों ने एक योगी संन्यासी को हवाई अड्डे पर रिसीब किया, तो इस सरकार की प्रतिष्ठा काफी धूमिल हो चुकी थी और इससे उसकी लाचारी का पता चलता था। उस अशालीन कदम की अपनी मूर्खता को छिपाने के लिए केन्द्र सरकार ने रामदेव और उनके समर्थकांे को रामलीला मैदान से ही रातों रात खदेड़ दिया। भाग रहे रामदेव को पकड़कर हरिद्वार भेज दिया गया।