अन्ना के आंदोलन से रामदेव तो परेशान थे ही, कांग्रेस और भाजपा को भी मलाल था। भाजपा और उसके संघ परिवार को इस बात का मलाल था कि भ्रष्टाचार का इतना बड़ा मुद्दा एक गांधी टोपी पहनने वाला साधारण गांधीवादी उठा रहा है और वह सफल भी होता जा रहा है। गांधीवाद को भाजपा और संघ परिवार अपने दर्शन के खिलाफ मानता है, हालांकि समय समय पर कभी कभी उसके नेता सार्वजनिक रूप से गांधी का नाम सम्मान के साथ ले भी लेते हैं। भाजपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेस भी अन्ना के ंआंदोलन से बेचैन थी। वह भी उनकी काट करना चाहती थी। खासकर कां्रगेस के वे लोग जो सत्ता में बैठे हैं अन्ना को कमजोर करना और देखना चाह रहे थे।
बाबा रामदेव ने एक साथ ही कांग्रेस और भाजपा दोनों को अवसर उपलब्ध करा दिया कि वे उनके द्वारा अन्ना के कद को छोटा कर सकते हैं। संयोग से बाबा रामदेव के कांग्रेस और भाजपा दोनों से अच्छे रिश्ते रहे हैं। सत्ता प्रतिष्ठान की मदद से ही बाबा रामदेव ने आज वह मुकाम प्राप्त किया है, जिस पर पहुंचकर वे 11 लाख की सेना बनाकर व्यवस्था बदलने का सपना देख रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारों के दौरान वे लगातार सफलता की सीढ़ी चढ़ते गए। भाजपा के नरेन्द्र मोदी से लेकर कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी तक ने उन्हें उपकृत किया। लालू यादव के साथ साथ नीतीश कुमार भी उनके मुरीद हुए। लालू ने तो उनकी कम्युनिस्ट नेताओं और पीएमके के नेता तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अम्बुमणि रामदास से भी उनकी रक्षा की। नीतीश कुमार ने तो उन्हें बिहार का ब्रांड एम्बेसडर ही बना दिया।
यानी बाबा रामदेव एक साथ राजनीति की विरोधी ताकतों को खुश करने की क्षमता रखते थे। भले नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी का अछूत समझें और उनके साथ किसी मंच पर दिखना भी नहीं चाहें, लेकिन बाबा रामदेव के आश्रम में दोनों एक साथ मंच पर देखे गए। हमारे देश में योगियों के बारे मं कहा जाता है कि सच्चा योगी वह है, जिसके आश्रम से लगे घाट पर एक साथ बाघ और बकरी पानी पी सके। पातंजलि के योगसूत्र के अनुसार अहिंसक वह है, जिसकी संगति में हिंसक प्राणी भी अहिंसक हो जाए। यानी यदि आप अहिंसक है, तो आपके घर पर एक साथ बाध और बकरी रह सकता है और बाघ बकरी को नहीं मारेगा।
इस तरह बाबा ने एक साथ बाध बकरी को अपने साथ कर रखा था। इसलिए जब उन्होंने अपनी तरफ से भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना से भी बड़ा सत्याग्रह करने का इरादा जताया, तो कांग्रेस और भाजपा दोनों खुश हो गई। भाजपा को लगा कि रामदेव को आगे कर वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को अपनी लड़ाई के रूप में वह जनता के सामने पेश कर सकेगी और उसका चुनावी फायदा उठा सकेगी। इस बीच वह बाबा रामदेव को अपनी राजनैतिक पार्टी नहीं बनाने के लिए समझाने में सफल हो गई थी। दूसरी और कांग्रेस को लगा कि बाबा रामदेव के आंदोलन को महिमा मंडित कर वह देश और दुनिया को दिखा देगी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले सिविल सोसायटी के नेता अकेले अन्ना नहीं हैं, बल्कि रामदेव तो उनसे भी बड़े नेता हैं। वह रामदेव की छाया में आकर अन्ना की धूप से बचना चाह रही थी। अन्ना की मांग ठोस है और वह एक कानून बनाने की मांग कर रहे हैं, जो कि सरकार के मान लेने पर अगले दो या तीन महीने में ही संभव है। उनकी नजर भ्रष्टाचार के किसी खास बिन्दु पर है। भ्रष्टाचार के खिलाफ वे एक सांवैधानिक कानूनी व्यवस्था खड़ा करने की मांग कर रहे हैं और उस व्यवस्था का ब्लू प्रिंट उनके पास है। जाहिर है अन्ना को बरगलाना और उनके साथ टालमटोल करना सरकार के वश में नहीं है।
लेकिन दूसरी ओर बाबा रामदेव की मांग व्यापक किस्म की है। दन मांगों को जल्दी अमल में लाया ही नहीं जा सकता। उस पर सरकार की सैद्धांतिक सहमति ही काफी है और इस तरह की सहमति देने के लिए तो सरकार हमेशा प्रस्तुत रहती है। भ्रष्टाचार खत्म हो, विदेशों में जमा काला धन वापस आए, काले धन के मालिको को कड़ी सजा मिले और इसी तरह की हवाई मांगों को मानने में, जिसे वर्तमान व्यवस्था के तहत अमल मे लाया ही नहीं जा सकता, सरकार को कोई दिक्कत नहीं होती है। यही कारण है कि जब बाबा ने 4 जून से अन्ना से भी बड़ा अनशन करने की घोषणा की तो कांग्रेस और केन्द्र सरकार ने भी राहत की सांस ली। उनका आकलन था कि रामदेव को वश में करना आसान है, क्योंकि उनका पूरा योग प्रतिष्ठान ही देश के सत्ता प्रतिष्ठान के सहयोग से खड़ा हुआ है और उसे बचाने के लिए वे सत्ताधारी लोगों के दबाव में आ जाएंगे, लेकिन अन्ना हजारें के पास तो खोने के लिए कुछ है ही नहीं, इसलिए उन पर सरकार का दबाव काम नहीं करता।
आज केन्द्र सरकार कह रही है कि रामदेव भाजपा के मुखौटा हैं। भाजपा से उनका क्या संबंध है, यह कांग्रेस और सरकार को पहले से ही पता है, लेकिन इसके बावजूद भी वह बाबा रामदेव को पसंद करती है। भाजपा का मुखोटा होना केन्द्र सरकार के हित में ही माना गया, क्योंकि भ्रष्टाचार के मामले मंे भाजपा कोई दूध की धुली हुई नहीं है। जिन राज्यों में उनकी सरकारें हैं, वहां भी भ्रष्टाचार होते हैं और जब केन्द्र में भाजपा सरकार में थी, उस समय भी केन्द्र सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले उठाए गए थे। इसलिए भाजपा से बाबा रामदेव का संबंध केन्द्र सरकार के लिए सहुलियत वाली बात ही थी। यही कारण है कि जितना हो सकता था, केन्द्र सरकार ने रामदेव को महत्व दिया। उनके व्यक्तित्व को विराट बनाने में केन्द्र सरकार ने कोई कोर कसर नहीं छोडी, क्योंकि उनका उपयोग किया जाना था। उनकी सहायता से भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की चल रही ठोस और केन्द्रित मुहिम से लोगों का ध्यान हटाकर भष्टाचार के खिलाफ थोथी प्रतिबद्धता की ओर ले जाना था।
जाहिर है कांग्रेस और भाजपा दोनों उनका उपयोग कर रही थी और दोनों की ताकतों का फायदा उठाकर बाबा अपने व्यक्तित्व को विराट बना रहे थे। लेकिन एक साथ बाध और बकरी को पानी पिलाने वाले बाबा कांग्रेस और भाजपा को जून के पहले 5 दिनों में एक साथ संतृष्ट नहीं कर सके। कांग्रेस नेताओं की पलकें पहले झपकीं और बाबा के खिलाफ सरकार की कार्रवाई हो गई। अब बाबा पूरी तरह भाजपा के खेमे में हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए अभी भी उनकी उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। (संवाद)
स्वामी रामदेव का उपयोग
बाघ और बकरी को एक साथ पानी नहीं पिला पाए बाबा
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-06-09 10:13
अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान ठीकठाक चल रहा था। 4 दिनों के अनशन के दबाव में केन्द्र सरकार कठोर लोकपाल विधेयक लाने को तैयार हो गई थी और अन्ना सहित 4 अन्य लोगांे को विधेयक का मसौदा बनाने वाली समिति में शामिल भी कर लिया था। पर उसके बाद बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक और मोर्चा खोल दिया। प्रभावी लोकपाल कानून बनाने के अन्ना के आंदोलन के दौरान बाबा रामदेव ने अपने आपको उपेक्षित पाया और उनकी प्रतिक्रियों में यह साफ देखा जा सकता था कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में अन्ना को मुख्य भूमिका में आते देख विचलित थे। इसके कारण ही उन्होंने भ्रष्टाचार के व्यापक पहलुओं पर अपनी तरफ से एक बड़ा सत्याग्रह करने की घोषणा कर दी।