वह नब्बे सशस्त्र सिपाहियों के साथ बाग में घुसा और उसने बिना किसी चेतावनी के फायर करने का हुक्म दे दिया। वह दरअसल स्वतंत्रता संघर्ष की कमर तोड़ना चाहता था। वह रौलट एक्ट से उपजे देशव्यापी असंतोष को अपने इस कदम से कुचल देना चाहता था।

रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के आह्वान पर जो पचासेक हजार लोग जुटे हुए थे, वे सरकार के किसी कदम का विरोध नहीं कर रहे थे। वे रामदेव की इस मांग की हिमायत करने आए थे कि विदेशों में जमा काले धन को भारत लाओ और उस पैसे को गरीब जनता की तकलीफों को दूर करने में लगाओ। यह एक सकारात्मक मांग थी। सरकार भी इसके पक्ष में है और समय-समय पर इस बारे में उचित कार्रवाई करने का भरोसा भी दिलाती रही है। बाबा के प्रतिनिधि आचार्य बालकृष्ण के साथ जो लिखित सहमति हुई थी, उसमें भी यह आश्वासन था। देश भर के लोग बाबा की इस मांग का समर्थन करते हैं। इस तरह, सैद्धांतिक रूप से देखा जाए, तो काला धन के प्रति दृष्टिकोण के मामले में रामदेव, सरकार और देश के बीच किसी तरह की मौलिक असहमति नहीं है। उच्चतम न्यायालय भी सरकार को फटकार चुका है कि वह विदेश में जमा काला धन को वापस क्यों नहीं ला रही है?

फिर दिल्ली पुलिस ने डायर जैसी कार्रवाई क्यों की? कारण वही था जिसने डायर को उस बर्बर कार्रवाई के लिए प्रेरित किया था। जलियावाला बाग की जनसभा में डायर देशव्यापी गदर की संभावना देख रहा था। यह उसका अपना आकलन था। इस मूल्यांकन में उसके पास ब्रिटिश सरकार की सहमति नहीं थी। इसके विपरीत दिल्ली पुलिस को अपना आकलन करने की स्वतंत्रता नहीं है। वह कोई भी बड़ा कदम केंद्र सरकार के आदेश से ही उठाती है। रामलीला मैदान में जुटी जनता से देश को खतरा नहीं था। बल्कि देश की सहानुभूति इस सत्याग्रह के साथ थी। लेकिन केंद्र सरकार अपने ऊपर खतरा महसूस कर रही थी। इसलिए सत्याग्रह खत्म करवाने की उसकी साजिश सफल नहीं हुई, तो वह सत्याग्रहियों को बलवाई मान कर उन पर टूट पड़ी।

खतरे का यह एहसास केंद्र को क्यों होने लगा था? इसके पीछे अन्ना हजारे के अनशन का उसका अनुभव था। अब भी मेरा मत यही है कि अन्ना ने अपना आमरण अनशन तोड़ने में बहुत जल्दी कर दी। अगर वे अपनी मूल मांग पर अड़े रहते, तो उन्हें निश्चय ही सफलता मिलती। पूरा देश उनके समर्थन में उमड़ पड़ा था। मीडिया अकंप रूप से और प्रतिक्षण उनका साथ दे रहा था। अखबारों का रुख अन्ना के पक्ष में और सरकार के खिलाफ था। भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा मजबूत वातावरण एक अभूतपूर्व घटना थी। सरकार पूरी तरह से घबराई हुई थी। इसीलिए उसने जैसे-तैसे समझौता कर खतरे से अपने को बचा लिया।

अब बाबा रामदेव के रूप में उससे भी बड़ा खतरा सरकार की ओर बढ़ रहा था। यही वजह है कि जब बाबा का विमान दिल्ली की जमीन पर उतरा, तो एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, चार-चार मंत्री उनकी अगवानी के लिए दौड़ पड़े। इमरजेंसी के बाद यह भारत की राजसत्ता के नर्वस होने का सबसे बड़ा उदाहरण था। वह सोच रही थी कि बाबा से मान-मनुहार कर आसन्न संकट को टाल देगी। यह असंभव नहीं था, क्योंकि रामदेव कोई राजनीतिक आदमी नहीं हैं। उन्हें कायल कर दिया जाता कि सरकार इस मामले में वाकई चिंतित हैं और हर संभव कदम उठाने के लिए तैयार है, तो वे जरूर मान जाते।

लेकिन सरकार का इरादा शुरू से ही संदिग्ध था। वह काले धन के खिलाफ कार्रवाई को भविष्य में जितनी दूर धकेल सकती थी, उतनी दूर धकेलने पर आमादा थी। अन्ना के साथ धोखाधड़ी कर ही चुकी थी। अब बाबा को फंसाने का खेल खेला जा रहा था। बाबा सतर्क थे और किसी हवाई आश्वासन की कीमत पर अपना सत्याग्रह वापस लेने को तैयार नहीं थे। अन्ना के साथ समझौता आसान था, क्योंकि मामला लोकपाल बिल का था। बाबा का मामला गंभीर था, क्योंकि मामला काले धन का था। काले धन के बिना देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था चल नहीं सकती।

इसीलिए सरकार ने रामदेव और उनके अहिंसक समर्थकों पर अचानक हमला बोल दिया। हम जिससे तर्क में पार नहीं पा सकते, उसे पाशविक बल से दबाने की कोशिश करते हैं। जलियावाला बाग में भी यही हुआ था, रामलीला मैदान में भी यही हुआ था। उस समय सिपाहियों के पास बंदूकें थीं, इस समय लाठियां और आंसू गैस के शेल थे, इससे मूल स्थिति बदल नहीं जाती। मुख्य बात यह है कि डायर ने भी चेतावनी नहीं दी थी और दिल्ली पुलिस ने भी चेतावनी नहीं दी। चेतावनी दिए बिना टूट पड़ना मनुष्यता के किसी भी तर्क से बाहर है। इसे सिर्फ लोकतंत्र पर कुठाराघात बतलाना पहाड़ को राई बताना है। यह मानवता के विरुद्ध गंभीर अपराध है। डायर के पास भी विकल्प थे। वह चाहता तो बहुत कम हिंसा से जलियावाला बाग को खाली करा सकता था। दिल्ली पुलिस के पास भी विकल्प थे। लेकिन केंद्र का आदेश था कि जैसे भी हो, रामलीला मैदान को तुरंत खाली कराओ। नौकरी बचाने के लिए आदमी क्या-क्या नहीं करता है। न डायर के किसी सैनिक ने निहत्थे लोगों पर गोली चलाने से इनकार किया न दिल्ली पुलिस के किसी सदस्य ने।

लेकिन यह अपराध क्या आकस्मिक था? बिलकुल नहीं। डायर को यह अपराध करने से पहले सोचने की जरूरत इसलिए नहीं थी कि वह रोज देखता था कि ब्रिटिश पुलिस और फौज दमन करने में किसी भी हद तक जा रही है। दिल्ली पुलिस को भी कुछ सोचने की जरूरत इसलिए नहीं थी कि पूरे देश की पुलिस रोज-ब-रोज ऐसी बर्बरता दिखाती ही रहती है। दिल्ली की पुलिस इसका अपवाद नहीं है। यहां की हिरासतों से भी लोग टूटी टांगें ले कर बाहर निकलते रहे हैं। यहां भी हिरासत में बलात्कार और हत्या होती है। इसीलिए लोग पुलिस को अपना मित्र नहीं, दुश्मन मानते हैं।

एक अहम फर्क जरूर है। जलियावाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने जांच बैठाई थी। जांच समिति ने डायर को दोषी ठहराया था। लेफ्टिनेंट-जनरल सर हेवेलॉक ने डायर से कहा कि तुम्हें सेवामुक्त किया जाता है। बाद में भारत के कमांडर-इन-चीफ चार्ल्स कार्लमाइकल ने डायर को कहा कि वह इस्तीफा दे दे और उसकी पुनर्नियुक्ति नहीं होगी।

आज उस बात की उम्मीद नहीं की जा सकती। क्योंकि लाल किला मैदान में जो कुछ हुआ, वह दिल्ली पुलिस की अपनी या स्वतंत्र कार्रवाई नहीं थी। आदेश ऊपर से था। अब कोई राजा अपने ही खिलाफ जांच समिति कैसे बैठा सकता है?

इसीलिए देश को स्वतंत्र और शक्तिशाली लोकपाल की जरूरत है।