आखिर उसने ऐसा किया क्यों? उसे रामदेव को जरूरत से ज्यादा तवज्जो देने की जरूरत ही क्यों पड़ी? यह साफ हो गया है कि वह ऐसा करके लोकपाल विधेयक को कमजोर करना चाह रही थी। वह सिविल सोसायटी में फूट डालना चाह रही थी। वह दुनिया को बताना चाह रही थी कि अन्ना हजारे द्वारा कठोर लोकपाल विधेयक को रामदेव सहित सिविल सोसाइटी के अनेक तबकों का समर्थन हासिल नही है। सरकार जानबूझकर रामदेव के व्यक्तित्व को इतना विशाल करके दुनिया को दिखाना चाह रही थी कि उसके सामने अन्ना हजारे का व्यक्तित्व बहुत ही बौना लगे। यही वजह है कि उसने रामदेव को असामान पर चढ़ा दिया। जिस समय उन्हें रोका जाना चाहिए था, उस समय उन्हें बढ़ावा देकर आगे बढ़़ने दिया गया और योग शिविर के नाम पर अनशन के लिए लोगों को रामलीला मैदान में भारी संख्या मंे आने दिया गया। भारी संख्या जरूरी थी, क्योंेिक इससे पता चलता कि रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम के सबसे बड़े नेता हैं।
यही कारण है कि जब सरकार और रामदेव के बीच अधिकांश मसले पर सहमति हो गई, उसके बावजूद उन्हें रामलीला मैदान में अनशन करने दिया गया, जबकि इस तरह के मामले में दो पक्षो में समझौता ही इसी बात पर होता है कि आंदोलन की कार्रवाई नहीं होगी। लेकिन समझौते के बाद भी सरकार ने कहा कि अनशन शुरू कीजिए, देश भर में अनशन करवाइए और शाम चार बजे केन्द्र सरकार की जयजयकार करते हुए अनशन वापस ले लीजिए। यह किस तरह का समझौता सरकार की ओर से था, जिसमें आंदोलनकारी की मांगों को मानकर उससे आंदोलन करने को कहा जाता है?
लेकिन रामदेव ने तय समय पर अनशन समाप्त नहीं किया, तो सरकार बौखला गई। साफ है कि सरकार ने रामदेव के बारे में गलत आकलन कर लिया था। इस बीच उसकी बहुत ही थू थू हो चुकी थी। 4 मंत्रियों द्वारा हवाई अड्डा जाकर रामदेव से मिलने का उसका निर्णय बहुत ही फूहड़ था। उसके उस फूहड़ निर्णय से सोनिया कांग्रेस सहित कांग्रेस पार्टी का पूरा संगठन नाराज था। उसके बाद रामदेव को महिमामंडित करने वाले मंत्री भारी दबाव में आ गए। किसी भी तरह अनशन और सत्याग्रह तुड़वाना उनकी प्रतिष्ठा का विषय बन गया। और उसके लिए उन्होंने जो कुछ भी किया, उससे उसकी प्रतिष्ठा और भी गिर गई। उसने आघी रात को सो रहे लोगों, जिनमें भारी संख्या में महिलाएं भी थी, लाठी चलवा दिए और उन्हें वहां से खदेड. दिया। खाली करवाने का तरीका भी बहुत ही बर्बर और अमानवीय था। सरकार चाहती तो रामदेव को गिरफ्तार कर सकती थी और वहां उसे उनको हटाने के बाद लोगों को भी हठ जाने के लिए कह सकती थी। लोग धीरे धीरे वहां से खुद हट जाते। लेकिन सरकार ने बलपूर्वक उन्हें वहां से आधी रात को हटाने का जो निर्णय किया वह बहुत ही गैर जिम्मेदाराना था।
उस घटना के बाद सरकार पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। अब मामला भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि रामदेव और उनके लोगों को रामलीला मैदान से गलत तरीके से हटाया जाना है। सभ्य समाज सरेकार के उस निर्णय के खिलाफ है। पूरा विपक्ष इस मामले में एक हो गया है। भाजपा तो उस घटना की बढ़चढ़ कर निंदा कर ही रही है, वाम दल भी उसके लिए केन्द्र सरकार की आलोचना कर रहे हैं। जिस अन्ना हजारे के खिलाफ केन्द्र सरकार रामदेव को खड़ा करना चाह रही है, उन्होंने तो सरकार के उस उस बर्बरतापूर्ण निर्णय के खिलाफ देश व्यापी सत्याग्रह भी कर डाला है। मुख्य विपक्षी भाजपा को भी केन्द्र सरकार के खिलाफ हमले करने का मौका मिल गया है और वह भी देश भर में अपने कार्यकर्त्ताओं को इस मसले पर सक्रिय कर रही है।
इस प्रकरण में रामदेव की छवि भी धूमिल हुई है। सबसे पहले तो उन्होंने सरकार के मंशे के बारे में गलत आकलन करने का काम किया। वे यह सोच भी नहीं सकते थे कि सरकार उनके लोगों को हटाने के लिए इस हद तक जा सकती हैं। उन्हें अपने समर्थकों के संख्या बल पर पूरा भरोसा था। दूसरा गलत काम रामदेव ने वहां से भागकर किया। यदि वे गिरफ्तारी दे देते, तो उससे उनकी इज्जत बढ़ जाती, लेकिन वे महिला का ड्रेस पहनकर वहां से भाग रहे थे और पकड़े गए। कोई सत्याग्रही इस तरह नहीं भागता। उनकी इस बात को भी मानने का कोई आधार नहीं है कि पुलिस उनकी हत्या करना चाहती थी, इसलिए वे भाग रहे थे। आखिरकार वे गिरफ्तार हुए ही और पुलिस ने उनको सुरक्षित हरिद्वार उनके आश्रम में पहुंचा दिया। (संवाद)
केन्द्र ने रामदेव के मामले में घपलेबाजी की
विश्वास का सकट जारी है
कल्याणी शंकर - 2011-06-10 06:43
केन्द्र सरकार रामदेव संकट में फंसकर यह तय कर नहीं पा रही है कि वह इससे कैसे निकले। आज यदि केन्द्र सरकार की यह स्थिति है, तो उसके लिए वह खुद जिम्मेदार है। उसनंे इस मसले पर एक के बाद एक घपलेबाजी की और दलदल में लगातार फंसती गई। उसे लगा कि वह रामदेव को अपने हिसााब से चला पाने में सक्षम है। उसे अपने आप पर जरूरत से ज्यादा भरोसा था। इसलिए जब उसे कड़ाई करनी चाहिए थी, तो वह बेहद विनम्रता से पेश आ रही थी। बाद में जब उसे मामले को मुलायमियत से संभालना था, तो वह एकाएक कठोर हो गई।