लोकपाल कानून के मसले पर केन्द्र सरकार एक बार फिर वैसी ही आक्रामकता दिखाने लग गई हैं आज जरूरत एक ऐसी कानूनी व्यवस्था के निर्माण की है, जिसमें भ्रष्टाचार को रोकने की क्षमता है और भ्रष्ट लोगों को जल्द से जल्द सजा देने का प्रावधान हो। भ्रष्टाचार को रोक पाने में वर्तमान व्यवस्था लगातार विफल हो रही है और इसके लिए एक ऐसे लोकपाल कानून के निर्माण की जरूरत है, जो एक साथ ही विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की खबर लेने में सक्षम हो। अन्ना हजारे की टीम ने एक ऐसे ही कानून के लिए विधेयक का मसौदा तैयार कर रखा है। सरकार उस मसौदे को गंभीरता से ले और उस पर राजनैतिक आम सहमति बनाने की कोशिश करे, यह आज समय की मांग है, लेकिन केन्द्र पिछले दिनों से जो कुछ कर रही है, उससे साफ लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई पुख्ता व्यवस्था तैयार करने में उसकी कोई रुचि नहीं है।
अन्ना हजारे के खिलाफ उसकी नई आक्रामकता इसका प्रमाण है। जब से लोकपाल विधेयक का मसौदा बनाने के लिए बनी समिति में अन्ना और उनके 4 सहयोगी शामिल हुए हैं, उस समय से ही सरकार की ओर से उनके खिलाफ अभियान चलाया जा रहा था। अन्ना की इसलिए आलोचना की गई, क्योंकि अपने राज्यों में विकास कार्यों के लिए उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा कर दी। शांतिभूषण और प्रशांत भूषण को पैनल का सदस्य बनाने के लिए अन्ना पर परिवारवाद की तोहमत लगा दी गई। फिर शांतिभूषण के चरित्रहनन का अभियान शुरू हुआ। एक अन्य सदस्य संतोष हेगड़े की लोकायुक्त के रूप में उनकी योग्यता पर भी सवाल खड़े किए गए। यह सब इसलिए किए गए ताकि उनके द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ उठाई जा रही आवाज की शुद्धता पर सवाल उठाया जा सके।
अब तो सरकार ने आक्रामक होने की एक नई शैली अपना ली है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले को वह अब भाजपा और आरएसएस का एजेंट बता देती है। अन्ना हजारे के साथ भी यही किया गया है। यदि कांग्रेस महासचिव इस तरह का आरोप अन्ना के खिलाफ लगाते, तो इसमें शायद ज्यादा बुरा लगने वाली बात नहीं होती, क्योंकि पिछले कुछ सप्ताहों से वे इसी तरह की बातें करते रहे हैं और देश की जनता ने शायद अब उनके बयानों को गंभीरता से लेना बंद भी कर दिया है, लेकिन केन्द्र सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी अन्ना हजारे को आरएसएस से जोड़ दिया है। उनकी इस तरह की बयानबाजी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह उस समिति के अध्यक्ष हैं, जो लोकपाल विधेयक बनाने का मसौदा तैयार कर रही है। समिति के अध्यक्ष होने के नाते समिति के सदस्यों के ऊपर उनसे एक नैतिक दबदबा रखने की उम्मीद की जाती है। लेकिन समिति के कुछ सदस्यों के खिलाफ इस तरह का अनर्गल बयान देकर उन्होंने साबित कर दिया है कि उनमें अध्यक्ष की गरिमा का भी अभाव है। कुछ दिन पहले योगगुरू रामदेव की हवाई अड्डे पर 3 अन्य मंत्रियों के साथ अगवानी कर उन्हें केन्द्र सरकार में मंत्री होने की गरिमा को भी खो दिया था और अब अन्ना के अभियान के पीछे राजनैतिक तत्वों का हाथ होने की बात कर उन्होंने मसौदा समिति के अध्यक्ष होने की गरिमा का भी अपमान कर दिया है और भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश पालने जन समुदाय की नजरों में खुद को संदिग्ध भी बना दिया है।
आखिर भ्रष्टाचार के मसले पर सरकार इतना आक्रामक क्यों हो रही है? उसे आक्रामक होना चाहिए, लेकिन यह आक्रामकता भ्रष्ट लोगों की तरफ निर्देशित होनी चाहिए, न कि उनकी तरफ जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार वास्तव में चिंतित है, तो उसे इस आंदोलन का इस्तेमाल इसके खिलाफ कठोर कानून बनाने में राजनैतिक आमसहमति बनाने में करना चाहिए। पर सरकार बिल्कुल उलटा काम कर रही है। राजनैतिक आमसहमति बनाने के नाम पर वह पुख्ता लोकपाल कानून बनाने के प्रयासों में ही पलीता लगाने की कोशिश कर रही है। इस कोशिश के तहत उसने कानून का मसौदा बनाने के पहले ही सभी राजनैतिक पार्टियों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सवाल पूछने शुरू कर दिए। विधेयक को संसद से ही पास होना है, इसलिए राजनैतिक दलों की राय तो मायने रखती ही है, लेकिन विधेयक बनाने के पहले ही उस पर राय पूछने का कोई औचित्य ही नहीं था। यह मामले को लटकाने के प्रयास के अलावा कुछ भी नहीं है। सरकार को पहले मसौदा तैयार करना चाहिए और फिर उस पर राज्यों और राजनैतिक पार्टियों से विचार करना चाहिए। पहले उन्हें यह तो पता चले कि आखिर सरकार क्या चाहती है।
जाहिर है केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग से लगातार भागने की कोशिश कर रही है। असी कोशिश के तहत उसने योगगुरू रामदेव का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। काले धन के खिलाफ उनकी मांगों पर सैद्धांतिक रूप से सहमत होने के बावजूद उनको आमरण अनशन शुरू करने और शाम को अनशन तोड़ देने को कहा गया। ऐसा कभी नहीं होता है कि सरकार किसी आंदोलनकारी संगठन की मांग मान भी ले और उस संगठन को आंदोलन करने की इजाजत भी दे। लेकिन रामदेव के मामले में केन्द्र सरकार, जिसमें प्रणब मुखर्जी सबसे बड़ी भूमिका निभा रहे थे, ने ऐसा ही किया। केन्द्र सरकार चाहती थी कि रामदेव अन्ना से भी बड़ा आंदोलन करके पहले उनको अपने सामने बौना दिखा दे और फिर सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ गंभीर बताकर आंदोलन वापस ले ले। बाद में जब रामदेव ने तय समय पर अनशन वापस लेने से मना कर दिया, तो केन्द्र सरकार ने पूरा साजिश का भंडाफोड़ कर दिया और कहा कि रामदेव रामलीला मैदान में नाटक कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने यह नहीं कहा कि उस नाटक की पटकथा किसने तैयार की थी और सरकार उस नाटक के लिए क्यों तैयार थी।
रामदेव के मामले में सरकार की रणनीति विफल हो चुकी है। उनका आगे करके अन्ना के अभियान को पीछे करने का उनका मंसूबा पूरा नहीं हुआ है। इसलिए अब वह सीधे अन्ना के अभियान का आरएसएस का अभियान बना रही है। ऐसा करके वह एक बेहद खतरनाक खेल खेल रही है, क्योंकि यह तो सरकार की ओर से आरएसएस का महिमामंडन है। सरकार को यह समझना चाहिए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे सभी लोगांे को आरएसएस से जुड़ा बताकर वह संघ को भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वाला एक मात्र संगठन बता रही है। अन्ना को नीचा दिखाने के चक्कर में वह आरएसएस को कितना ऊंचा दिखा रही है, शायद उसे इसका आभास ही नहीं है। (संवाद)
भ्रष्टाचार के खिलाफ गंभीर नहीं है केन्द्र
अन्ना को सघ परिवार से जोड़ने के मायने
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-06-14 04:44
पिछले कुछ समय से भ्रष्टाचार हमारे देश की व्यवस्था और लोकतंत्र के सामने एक सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसके खिलाफ देश में जबर्दस्त जनाक्रोश है, पर इस जनाक्रोश के सामने सरकार शुरू से ही एक के बाद एक गड़बड़ियां करती जा रही हैं। जब पूरा विपक्ष 2 जी स्पेक्ट्रम मामले पर जेपीसी जांच की मांग कर रहा था, तो सरकार ने उस मांग को साफ साफ ठुकरा दिया था और उसकी जिद के कारण संसद का पूरा शीतकालीन सत्र बर्बाद हो गया। बजट सत्र में उसने जेपीसी जांच की मांग मान ली, क्योंकि उसे बजट पास करवाने थे। सरकार को भ्रष्टाचार के मामले पर रक्षात्मक रवैया अपनाकर इसके खिलाफ कदम उठाने की गंभीरता दिखानी चाहिए थी, लेकिन उसने अपनी कार्रवाइयों से यह साबित किया कि भ्रष्टाचार को वह ज्यादा तवज्जो देना ही नहीं चाहती।