अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान जया ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की। इसके अलावा दिल्ली में बैठे अनेक नेताओं ने उनसे मुलाकात की और उन्हांेने किसी से भी मुलाकात करने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने उनसे मिलना चाहा। वे उनसे भी मिली। भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने मिलने की इच्छा जताई, तो उनको भी निराश नहीं किया। सीपीआई के नेता भी उनसे आकर मिले। उन्होंने सबको मिलने का समय दिया।
दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उन्होंने मुलाकात नहीं की। जब उनसे पूछा गया कि उनसे वह क्यों नहीं मिलीं, तो उनका कहना था कि राज्य की राजनीति में उनकी प्रतिद्वंद्वी डीएमके जिस यूपीए का हिस्सा है, उसकी श्रीमति गांधी अध्यक्ष है, इसलिए उनसे मिलना उन्हें उचित नहीं लगा।
जया की दिल्ली यात्रा पर डीएमके की नजर लगी हुई थी। डीएमके की दिलचस्पी यह देखने में है कि कांग्रेस के साथ जया का कैसा रिश्ता रहता है। यह जानने की दिलचस्पी और लोगों को भी है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के पहले जया ने कांग्रेस और यूपीए सरकार को वायदा किया था कि यदि डीएमके ने उनका साथ छोड़ा तो वे समर्थन में आकर सरकार को स्थिरता प्रदान करेंगी। क्या उनका यह प्रस्ताव अभी भी अपनी जगह कायम है? जब यह सवाल पूछा गया तो जया ने कहा कि उनका प्रस्ताव कुछ विशेष परिस्थितियों में आया था। अब वे परिस्थितियां बदल गई हैं। इसलिए यदि कांग्रेस के साथ उनकी पार्टी का कोई संबंध होना भी है तो इसकी पहल उनकी ओर से नहीं बल्कि कांग्रेस की ओर से ही होगी।
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री की दिल्ली यात्रा का मुख्य मकसद केन्द्र सरकार से संवाद स्थापित करने का था। सत्ता में आने के बाद ही उन्होने कहा था कि राज्य सरकार का खजाना खाली पड़ा है। जाहिर है कि राज्य को केन्द्र की वित्तीय सहायता की जरूरत पड़ेगी और इसके कारण वह केन्द्र के साथ बेहतर संबंध बनाकर रखना चाहती हैं। अपने इस उद्दश्य में जया कामयाब भी हुई, क्योकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ उनकी मुलाकात बहुत ही अच्छे माहौल में हुई।
जयललिता की दिल्ली यात्रा का एक अन्य उद्देश्य दिल्ली की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रभावी उपस्थिति भी दर्ज कराना था। इसमें भी वह सफल रहीं। अनेक पार्टियों के नेता उनसे आकर मिले और उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे एक ऐसी नेता हैं, जिनसे एक साथ दक्षिणपंथी और वामपंथी नेता आकर मिल सकते हैं। केन्द्र की राजनीत में एक दूसरे की कट्टर विरोधी कांग्रेस और भाजपा के नेता उनसे मिले और भाजपा से अलग सुर अलापने वाले वामपंथी नेता भी जया से मिले। इस तरह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वीकार्यता को उन्होंने दिल्ली की इस यात्रा के दौरान रेखांकित किया।
अपने राजनैतिक जीवन मे जयललिता ने लगभग सभी पार्टियों के साथ गठबंधन, तालमेल अथवा मोर्चाबंदी की है। वे भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ भी रही हैं और तमिलनाडु में कांग्रेस के साथ मिलकर भी चुनाव लड़ चुकी हैं। वामपंथी दलों के साथ तो उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में ही गठबंधन कर रखा था। अपने शपथग्रहण समारोह में उन्होंने गुजराम के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू को भी आमंत्रित किया था। उस समय नरेन्द्र मोदी के साथ वामपंकी नेता भी उनके शपथग्रहण समारोह में उपस्थित थे।
जाहिर है जयललिता ने अपने सारे राजनैतिक विकल्प खुले रख छोड़े हैं। राजनैतिक रूप से उनके लिए कोई भी अछूत नहीं है और वह भी किसी के लिए राजनैतिक रूप से अछूत नहीं। अपनी इस छवि को उन्होंने अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान और भी मजबूत किया। (संवाद)
जयललिता की दिल्ली यात्रा
सारे विकल्प खुले होने का सफल संदेश
कल्याणी शंकर - 2011-06-17 05:31
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता चेन्नई में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद दिल्ली आई और आकर वापस भी हो गईं। इस बीच उन्होंने एक संदेश जाहिर कर दिया है और वह यह है कि राष्ट्र की राजनीति में भी वह दखल देना चाहती है। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री खुद देश की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखती हैं। यह बात किसी से पहले भी नहीं छिपी हुई थीं। इस बार दिल्ली आकर उन्होंने इसे और भी स्पष्ट कर दिया है।