विडम्बना देखिए एक ही दिन एक ओर देश एवं उत्तराखंड के अनके नामी साधु संत बाबा रामदेव को फलों का रस पिलाकर अनशन तुड़वा रहे थे वहीं निगमाननंद अंतिम विदाई ले रहे थे, लेकिन उनके कुछ शुभेच्छुओं और मातृसदन से जुड़े लोगों के अलावा कोई उनकी चिंता करने वाला नहीं था। कहने का यह अर्थ नहीं कि रामदेव जी के प्रति जितना सम्मान और आत्मीयता दिखाई गई या उनका जितना ध्यान रखा गया वह उचित नहीं था, वह बिल्कुल उचित था, लेकिन निगमानंद जैसे लोग हमारी अमानवीय उपेक्षा के ऐसे शिकार क्यों हो गए?

लेकिन इससे किसी को आश्चर्य नहीं होेना चाहिए। हमारी यह महान सभ्यता का वारिस देश जिस अवस्था में पहुंच गया है उसमें निगमानंद जैसे लोगों की यही स्वाभाविक परिणति है। वस्तुतः स्वामी निगमानंद की त्रासदी किसी अकेले व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, देश के लिए, न्याय के लिए, सच की रक्षा के लिए, प्रकृति की धरोहर बचाने के लिए.... संघर्ष करने वालों की ऐसी लंबी कतार है। कल्पना करिए यदि स्वामी रामदेव हिमालयनन अस्पताल में भर्ती नहीं होते तब भी क्या राष्ट्रीय कहलाने वाली मीडिया के लिए निगमानंद की मृत्यु ऐसी ही सुर्खियां बनतीं? निनगमानंद की तरह न जाने कितने लोग सत्याग्रह की भेंट चढ़ काल की गाल मे समा जाते हैं और उनका नामोनिशान तक हम रहने नहीं देते। उत्तराखंड में ही गंगा को बड़े-बड़े बांधों की योजनाओं से बचाने के लिए संघर्षरत लोग जेल में हैं और उनकी सुध लेने वालों में संघर्ष के साथियों के अलावा कोई नहीं है। अगर आप किसी प्रकार सत्ता, संपत्ति और शक्ति से संपन्न हो गए, आपका समाज पर प्रभाव कायम हुआ तो आपकी आवाज का भारतीय समाज संज्ञान लेगा, अन्यथा आप चाहे अपना सर्वस्व अर्पित करके समाज के लिए ही आवाज उठाइए, ज्यादातर समय वह नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाता है। इस प्रकार निगमानंद सम्पूर्ण समाज की विडम्बनाओं का ग्रास बने।

कांग्रेस द्वारा भाजपा सरकार की आलोचना अनैतिक है, क्योंकि उसने अनशनकारियों के साथ जैसा बर्ताव किया वह भी हमारे सामने है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक अगर समाचार पत्र नहीं पढ़ते हों तो और बात है अन्यथा यह संभव ही नहीं कि निगमानंद के लंबे अनशन की उन्हें जानकारी नहीं हो। उत्तराखंड सरकार कह सकती है कि उसने निगमानंद को अस्पताल में भर्ती कराया था। लेकिन 27 अप्रैल 2011 को जब पुलिस ने उन्हें हरिद्वार के जिला चिकित्सालय में भर्ती किया, उस दिन उनके अनशन के दो महीने आठ दिन बीत चुके थे। यह बात आसानी से समझ में आनेवाली है कि उतने लंबे अनशन का शरीर पर जो घातक असर हुआ होगा उससे बाहर निकालने के लिए विशिष्ट चिकित्सा की आवश्यकता थी। निगमाननंद को विशिष्ट चिकित्सा नहीं मिली एवं 2 मई को वे कोमा में चले गए। उनके मित्रों ने इसकी सूचना मेल एवं वेबसाइट के माध्यम से देश भर में भेजी एवं लोगों ने पूछताछ आरंभ की तो उन्हें देहरादून स्थित दून अस्पताल में भेजा गया। अंततः वहां भी उनकी दशा नहीं सुधरी तो हिमालयन अस्पताल में दाखिल किया गया। काफी देर हो चुकी थी। उनके साथी आरोप लगाते हैं कि दून अस्पताल में उनके मुंह से झाग निकल रहा था और वह जहर दिए जाने का प्रमाण था। इस विवाद को भी यहीं छोड़ दीजिए, लेकिन क्या निगमानंद की परिणति हमंें आपको भयभीत नहीं करती? आखिर देश के लिए जीने वालों की, निःस्वार्थ अपने धरोहर को बचाने के लिए समर्पित ऐसे संकल्पवान महान व्यक्तित्व के प्रति हमारा देश इस प्रकार का क्रूर बर्ताव क्यों करता है?

आखिर निगमानंद ने अनशन क्यों किया? वे गंगा में हो रहे खनन को बंद कराना चाहते थे। निर्दयतापूर्वक खनन से हरिद्वार एवं आसपास गंगा की कैसी हालत हो गई है यह न सरकार के लिए अनजाना था न आम समाज के लिए। क्रशर गंगा की पेटी में पत्थरों के साथ गंगा को ही काट रहे थे। मातृसदन ने 1997 में क्रशर के विरुद्ध आवाज उठाई। पत्थर खोदकर उन्हें चूरा बनाना ऐसा लाभकारी व्यापार हो गया था जिसमें हर कोई हाथ डालना चाहता था। कुछ वर्ष पूर्व आपको गंगा में क्रशर ट्रैक्टरों की भरमार दिखती। बाहर से जाने वालों को तो यह समझ में ही नहीं आता कि ये सारे धार्मिक कथाओं के दुष्ट दानव के रूप हैं जो गंगा को खोखला करने के साथ पेड़ पौधों और उन पर निर्भर जीव-जंतुओं का अंत कर रहे हैं। लालची व्यापारियों और सरकारी महकमों के संरक्षण और प्रोत्साहन के कारण क्रशरों से पत्थरों की कटाई, चूरा पिसाई की आवाज तथा धूल भरा आकाश मानो गंगा और हरिद्वार की नियति हो गई थी। जब सतह के पत्थर खत्म होने लगे तो विशालकाय जेसीबी मशीनें गंगा में उतर गई। केवल आध्यात्मिक दृष्टि से गंगा के प्रति आस्थावान धार्मिक साधु संत एवं आश्रम ही नहीं, बुद्धिजीवी व आम आदमी भी इसमंें विनाश की दस्तक देख रहे थे। अनेक व्यक्तियों एवं संगठनों ने इसका विरोध आरंभ किया, मातृसदन ने इस विरोध को निरंतरता दी और साधु संतांे ने कई बार अनशन किया। ध्यान रखने की बात है कि स्वयं निगमानंद ने 2008 मेें ही 73 दिनों का अनशन किया। उनके साथ दूसरे साधु संत भी कुछ-कुछ दिन अनशन पर बैठते रहे। लेकिन एक ओर विरोध और दूसरी ओर कटाई जारी रही। हालांकि मातृसदन की संगठित लड़ाई के कारण क्रशर धीरे-धीरे बंद हुए और अंततः सरकार भी इसे बंद करने का आदेश जारी करने को विवश हुई। लेकिन यहीं पूर्ण विराम नहीं लगा।

उत्तराखंड सरकार से पूछा जाना चाहिए कि शासन में आने के पूर्व भाजपा गंगा आंदोलन के साथ थी। शासन में आते ही उसने क्रशर बंद करने का आदेश क्यों नहीं दिया? कांग्रेस का भी शासनकाल आया लेकिन गंगा की पेट काटी जाती रही। निगमानंद के अनशन के बाद जब सरकार ने आदेश जारी किया तब तो इसका अंत हो जाना चाहिए था। इसके विरुद्ध याचिका दायर करने वाली कंपनी को नैनीताल उच्च न्याालय से स्थगन आदेश मिल गया और वह बाजाब्ता गंगा की छाती खोदकर पत्थर काटने लगा। यह संघर्षरत संतों को धक्का पहुंचाने वाला था। मरता क्या न करता। निगमानंद और मातृसदन के साथियों ने तब न्यायालय के इस रवैये के विरुद्ध ही अनशन आरंभ किया। अंततः 26 मई को उच्च न्यायालय ने कंपनी की याचिका खारिज की। किंतु जो काम होना ही नहीं चाहिए था उसके विरुद्ध इतने लंबे और असहिंसक स्ंाघर्ष में न जाने कितने साधु संतों और गंगा प्रेमियों का शरीर बरबाद हो गया। सरकार का तर्क यह था कि न्यायालय के मामले में हम दखल नहीं दे सकते। ठीक है, लेकिन सरकार यदि संकल्पबद्धता दिखाती तो कंपनी को काम बंद करना पड़ता। चाहे भाजपा की सरकार हो या कांग्रेस की, गंगा को व्यापार बनाकर उससे धन निचोड़ने की नीति सर्वोपरि है और उसके विरुद्ध संघर्ष करने वालों को विकास का दुश्मन मानकर उनके साथ अपराधी की तरह व्यवहार हो रहा है। रुद्र प्रयाग के साथियों पर संगीन जूर्म के आरोप लगाए गए हैं और वे मुकदमा झेल रहे हैं। देश भर में ऐसा ही हो रहा है। शासन एवं आम समाज दोनों अहिंसक सत्याग्रहियों के साथ क्रूर संवेदनहीन व्चयवहार करते हैं। निगमानंद की त्रासदी यदि हमारी आंख खोल सके तभी उनका बलिदान सार्थक होगा। आखिर निगमानंद की मृत्यु के बाद विद्रूपताओं को ठीक करने के लिए अहिंसक संघर्ष की प्रेरणा किसे मिलेगी? लेकिन कोई निगमानंद के हस्र को न प्राप्त हो, ऐसा समाज और देश बनाना भी हमारा-आपका ही दायित्व है। इसलिए तमाम आतंक, हताशाओं, प्रतिकूलताओं के बावजूद व्यवस्था बदलाव का अहिंसक अभियान जारी रखना होगा। (संवाद)