इस लड़ाई में योगगुरू बाबा रामदेव भी पूरे दल बल के साथ २शामिल हो गए थे। सच कहा जाए तो भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल तैयार करने में उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका बनाई थी। अपने योग शिविरों में आए लोगों को योग के अलावा वे राजनैतिक मसलों पर भी प्रवचन दिया करते थे। उसमें उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ भी अलख जगाना शुरू कर दिया था। अपने सम्मोहक संवाद से उन्होंने योग शिविरों में आने वालों के ही नहीं, बल्कि योग शिविरों के उनके प्रवचनों की रिकार्डिंग देखने वालों के दिमाग में भी उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ नफरत पैदा करना प्रारंभ कर दिया था। यदि देश में आज भ्रष्टाचार के खिलाफ जबर्दस्त माहौल है, तो उसका एक कारण बाबा रामदेव द्वारा इसके खिलाफ अपने योग शिविरों और उसके बाहर उगली गई आग भी जिम्मेदार है।
पर बाबा अब पिछले कुछ दिनों से चुप हैं और उनकी चुप्पी पर तरह तरह से अनुमान लगाए जा रहे हैं। 8 दिनों से भी ज्यादा चली उनकी भूख हड़ताल के कारण उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ा है। एक कारण तो उनका खराब स्वास्थ्य हो सकता है, जिसके कारण वे चुप हैं। लेकिन योग गुरू का स्वास्थ्य इतने दिनों तक इतना खराब नहीं रह सकता कि वे सार्वजनिक रूप से आकर कुछ बोल ही नहीं सकें। इसलिए कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि बाबा सरकार से अब डर गए हैं। उन्हें लगता है कि सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है और उन्होंने योग और आयुर्वेद से संबंधित जो प्रतिष्ठान खड़े कर रखे हैं, उनको सरकार नुकसान पहुंचा सकती है। इसे भी उनके चुप रहने की एक वजह बताई जा रही है।
क्या बाबा सरकार से वाकई डर रहे हैं? जब उन्होंने भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ आमरण अनशन पर जाने का फैसला किया था और दुनिया का सबसे बड़ा सत्याग्रह करने की घोषणा की थी, उस समय भी उन्हें उनके प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचाने की धमकी संकेतों ही संकेतों में मिल रही थीं। दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसी नेता तो खुद बाबा रामदेव पर कालेधन को दान के रूप में प्राप्त करने का आरोप लगा रहा थे। जाहिर है, आमरण अनशन पर जाने के पहले ही बाबा रामदेव को इस बात का अहसास हो गया होगा कि केन्द्र सरकार उनके खिलाफ जांच करवा सकती है और जांच के नतीजें चाहे जो भी हों, उसके दौरान उन्हें परेशान तो किया ही जा सकता है। यह सब जानने और समझने के बावजूद भी यदि वे नही डरे और भ्रष्टाचार के खिलाफ आगे बढ़ते हुए अनशन पर चले गए तो यह मानना पड़ेगा कि बाबा को डरने के लिए कुछ नहीं था।
सवाल उठता है कि बाबा यदि सरकार से डरते नहीं हैं, तो फिर वे इस तरह चुप क्यांे हैं? भ्रष्टाचार को नियंत्रण में लाने के लिए प्रभावी लोकपाल कानून पर तनातनी बनी हुई है। केन्द्र सरकार मजबूत और प्रभावी लोकपाल बनाने में दिलचस्पी नहीं ले रही है। विपक्षी पार्टियां भी मजबूत लोकपाल बनाने की बात करने की बजाय इस मसले पर राजनीति करके केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टियों को सिर्फ कमजोर करने में रुचि ले रही है। वैसी स्थिति में बाबा रामदेवा को अन्ना हजारें के साथ होना चाहिए, क्योंकि अन्ना ने जो जन लोकपाल बिल का मसौदा प्रस्तावित किया है, वह बहुत हद तक भ्रष्टाचार को नियंत्रण करने में सफल हो सकता है। उसमें लोकपाल को दिल्ली में स्थित एक कार्यालय तक सीमित नहीं रखकर एक राष्ट्रव्यापी तंत्र के रूप में प्रस्तावित किया गया है, जिसके दफ्तर देश के सभी जिलों में रह सकेंगे और जिसके द्वारा केन्द्र सरकार के 35 से 40 लाख कर्मचारियों में से किसी के खिलाफ भी भ्रष्टाचार की शिकायत की जा सकती है। अन्ना टीम ने यह साबित कर दिया है कि सरकारी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का पर्याप्त उपाय हमारे देश में अनुपस्थ्ति है। उल्टें भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा और संरक्षण दिए गए हैं। उनके खिलाफ शिकायत उन्हीें के विभाग में की जा सकती है और उनके अपने ही दोस्त मित्र उनके खिलाफ शिकायत की जांच करते हैं। और कभी कभी तो जिसके खिलाफ शिकायत की जाती है उसी के पास वह शिकायत जांच के लिए चली जाती है। कुछ मामलों में तो जिसके खिलाफ शिकायत की जाती है, उसके मातहत कर्मचारी के पास वह शिकायत जांच के लिए चली जाती है। इस तरह से हमारे देश के सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार फल फूल रहा है। उसमें जो भ्रष्ट नहीं है, वह टिक नहीं सकता। उस व्यवस्था का अंग बने रहने के लिए भ्रष्ट होना आवश्यक हो जाता है।
इसलिए लोकपाल के एक कार्यालय नहीं, बल्कि एक तंत्र की जरूरत है, जो सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रख सके। लेकिन अन्ना की टीम ने भ्रष्टाचार के जिस मूल को पकड़ा है और जिसके इलाज के लिए एक राष्ट्रव्यापी तंत्र का प्रस्ताव किया है, उसके बारे में लोगों की जागरुकता का स्तर कम है। यहीं बाबा रामदेव उनकी सहायता कर सकते हैं। बाबा रामदेव लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में अन्य लोगों से ज्यादा सफल हैं। उनके पास संवाद की वह शैली है, जो लोगांें को जटिल बात भी आसानी से समझा देती है। देश में बाबा के उभार का राज उनकी यह शक्तिशाली संवाद शैली ही है। उनके पास अपना एक मंच भी है जिससे वे करोड़ों लोगों तक अपनी आवाज पहुंचा देते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार की लड़ाई में बाबा की जो भूमिका रही है, उसकी कोई भी बराबरी नहीे कर सकता।
पर आज बाबा चुप हैं और उनकी चुप्पी रहस्यमय है। लोकपाल पैनल बनने के तुरंत बाद काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ एकाएक बड़ा युद्ध छेड़ देने का बाबा का फैसला उचित नहीं था। उनके उस फेसले से यही संदेश गया कि वे अन्ना और उनके लोगों को अपनी ताकत दिखाने के लिए वह सब कर रहे थे। अब तो यह भी जाहिर हो गया है कि केन्द्र सरकार बाबा का इस्तेमाल अन्ना के अभियान को कमजोर करने के लिए कर रही थी और उसमें विफल होने के कारण ही उसने सोते हुए लोगों पर रामलीला मैदान में लाठी चलवा दी। आरएसएस के लोग भी बाबा का इस्तेमाल कर रहे थे, क्योंकि अन्ना की गांधी टोपी उन्हें पसंद नही थी। जाहिर है, बाबा अपनी रणनीति की विफलता का जायजा ले रहे होंगे। लेकिन उनकी ज्यादा दिनों तक चुप्पी उनके खिलाफ ही जाएगी। (संवाद)
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई
चुप क्यों हैं बाबा रामदेव
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-06-21 05:48
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारें की लड़ाई जारी है। वे 16 अगस्त से फिर आमरण अनशन पर जाने की चेतावनी जारी कर रहे हैं, हालांकि उनके कुछ समर्थक उन्हें अनशन करने से पहले राष्ट्रव्यापी दौरे पर जाने की सलाह भी दे रहे हैं। केन्द्र सरकार के मंत्रियों के जो बयान आ रहे हैं, उससे साफ लग रहा है कि केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए गंभीर नहीं है। एक मजबूत लोकपाल बनाने का उसका इरादा नहीं है। एक कमजोर सीवीसी की तरह एक कमजोर लोकपाल बनाकर केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने संकल्प का दिखावा कर रही है। जाहिर है भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अभी लंबी खिंचेगी।