वाम मोर्चा सरकार पिछले कुछ समय से शहरी मध्यवर्ग को ध्यान में रखकर अपनी नीतियां बना रही थीं। राज्य में औद्योगिकरण को बढ़ावा देने के लिए ही तो उस सरकार ने नंदीग्राम और सिंगूर को मुद्दा बना दिया था। राज्य सरकार राज्य में निवेश को बढ़ावा देना चाहती थी, ताकि मध्यवर्ग की आकांक्षाओं को पूरा किया जा सके। पर इसके कारण मोर्चे को ही नुकसान उठाना पड़ा। दोनों जगह भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जबर्दस्त आंदोलन हुए और उन आंदोलनों के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा अपनाई गई सख्ती मोर्चे के खिलाफ गई।

अब ममता बनर्जी कुछ ऐसे कदम उठा रही हैं, जो शहरी मध्यवर्ग को शायद पसंद नहीं आए, लेकिन वह चुनाव के पहले किए गए वायदों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध दिखना चाहती हैं, इसलिए अपने वायदों को वह पूरा करने को पहली प्राथमिकता दे रही है। इसका क्या प्रभाव लोगों के बीच उसकी छवि पर पड़ेगा, इसकी वह परवाह नहीं कर रही है।

सिंगूर में किसानों की जमीन वापस करने का उनका चुनावी वादा था। उस वादे को पूरा करने के लिए उन्होंने जो कदम उठाए, उनसे उनकी प्रतिबद्धता का तो पता चला ही, इससे उनकी प्राशसनिक अपरिपक्वता का भी पता चला।

विधानसभा का सत्र चल रहा था। उस बीच सिंगूर की जमीन पर टाटा के साथ किए गए करार को रद्द करने के लिए विधेयक विधानसभा में पेश कर कानून बनाए जाने चाहिए थे, लेकिन उन्होंने अध्यादेश जारी करने का रास्ता अख्तियार कर लिया। अध्यादेश जारी करने के लिए स्वीकृत प्रक्रिया का इस्तेमाल तक नहीं किया गया। उस पर मंत्रिपरिषद की बैठक भी नहीं की गई। मुख्य सचिव से भी कोर्इ्र परामर्श नहीं किया गया। अध्यादेश की प्रति तैयार करके उसे राज्यपाल के पास दस्तखत के लिए भेज दिया गया।

राज्यपाल आर के नारायण एक पुराने नौकरशाह रहे हैं। उन्हें मुख्यमंत्री की अध्यादेश वाली वह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने मुख्यमंत्री को प्रशासन के कुछ पाठ भी पढ़ा दिए और कहा कि मुख्यमंत्री को मुख्य सचिव के साथ परामर्श करके ही अपना काम करना चाहिए। उन्होंने अध्यादेश के प्रस्ताव को वापस कर दिया। फिर तो सरकार को विधानसभा में सिंगूर की भूमि पर टाटा के साथ हुए करार को रदद करने के लिए विधेयक पेश करना पड़़ा। वह विधेयक भी पास हो चुका है।

सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री प्रशासन को ठीक करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है। अस्पतालों में काम ठीकठाक ढंग से हो, इसके लिए वे अस्पतालों को औचक निरीक्षण भी कर रही हैं। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों में उसके बाद जिम्मेदारी का भाव भी पनपा है। अन्य विभागों के अधिकारी भी अब समय पर दफ्तर जाने लगे हैं, पर समय पर दफ्तर जाने और समय पर लौट आने के बात नहीं बनती। अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अस्पतालों को ही लें, तो वहां जितनी संख्या में मरीज आते हैं, उन्हें देखने के लिए वहां पर्याप्त सुविधाएं ही नहीं हैं। जाहिर है अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। (संवाद)