अब तक डाकघरों में किए गए निवेश से हुई आय पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ता था। छोटे और खासकर ग्रामीण और कस्बाई निवेशकर्त्ताओं के लिए डाकघरों की बचत योजनाएं शुरू की गई थीं। बैंकों के विस्तार के बावजूद अभी भी ग्रामीण इलाकों में डाकघर की बचत योजनाएं ज्यादा लोकप्रिय हैं। आयकर विभाग अभी भी कह रहा है कि टैक्स के दायरे में इ बचत योजना को लाने के बावजूद वह छोटे बचतकर्त्ताओं के हितों का ध्यान रख रही है, क्योंकि साल में जिसकी बचत राशि सेे 3500 रुपए की ब्याज आय होती है, उस पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। गौरतलब है कि वहां ब्याज दन 3 दशमलव 5 फीसदी है। यानी 1 लाख रुपए की बचत खाता रखने वालों को कोई टैक्स नहीं लगेगा।
पर यदि हम श्यामला गोपीनाथ कमिटी की सिफारिशो पर नजर दौड़़ाएं तो पाते हैं कि उसमें तो ब्याज दर बढ़ाकर 4 फीसदी करने को कहा गया है। कमिटी चाहती है कि डाकघर भी उसी दरां से लोगों को ब्याज दे जिस दर से बैंक देते हैं। अब यदि नई दर लागुू की जाती है, तो फिर एक लाख का बचत खाता रखने वाले लोगों को भी अपने ब्याज पर टैक्स देना होगा। जाहिर है डाकघरों मंे जमा करने के जो अतिरिक्त फायदे होते थे, वे समाप्त हो जाएंगे।
सवाल उठता है कि क्या केन्द्र सरकार अब डाकघरों में चल रही अचत योजनाओं से ऊब गई है़? डाकघर की क्यों अन्य छोटी बचत योजनाओं का भविष्य भी अब ठीक नहीं दिख रहा है। गोपीनाथ कमिटी ने जो सिफारिशें दी हैं, वह बहुत कुछ कहती है और बहुत कुछ नहीं भी कहती है। वह जो नहीं कहती है वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। दरअसल उस कमिटी का गठन ही छोटी बचत योजनाओं के खिलाफ हो रहे माहौल के बीच में किया गया था। कहने को ता कहा गया कि इन योजनाओं को आ रही समस्याओं को हल करने के सुझाव के लिए वह कमिटी बन रही है, लेकिन एक सुझाव तो किसान बचत पत्र को ही समाप्त कर देने का आ गया है। यह बचत पत्र निवेशकों को लंबे समय तक निवेश करने का विकल्प प्रदान करता है। वह विकल्प अब समाप्त हो सकता है।
कुल राष्ट्रीय बचत किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के विकास के लिए जरूरी होता है। आज यदि हम विकास की उच्च दर को बरकरार रखने में सफल हैं, तो इसका एक बड़ा कारण हमारे देश की राष्ट्रीय बचत का संतोषजनक होना है। इस मामले में हम अनेक अमीर देशों को पीछे छोड़ चुके हैं। भारत के लोगों में बचत करने की प्रवृत्ति है और यह बचत वित्तीय उपकरण के रूप में ज्यादा से ज्यादा हो इसके लिए हमारी सरकार कोशिश भी करती रही है। भारत की आबादी की आय और बचत का जो पैटर्न से उसके अंदर छोटे निवेशकों की संख्या बहुत ज्यादा है। हमारें देश के निम्न मध्य वर्ग के लोगांे की छोटी बचतों को आकर्षित करने में डाकघरों की भूमिका बैंको से भी ज्यादा महत्वपूर्ण रही है, हालांकि अब बैंकिंग व्यवस्था के विस्तार के साथ डाकधरों की भूमिका में कुछ कमी भी आई है।
केन्द्र सरकार ने 1999 में छोटी बचत योजनाओं को सफल बनाने के लिए एक राष्ट्रीय लघु बचत कोष का निर्माण किया था। इस कोष में डाकघरों की बचत के अलावा किसान विकास पत्र, पब्लिक प्रोविडंेट फंड (पीपीएफ), नेशलन सेविंग्स सर्टिफिकेट (एनएससी) जैसे बचत उपकरण रखे। इन उनकरणों को बढ़ावा मिलने के कारण भी डाकघरों की बचत योजनाओं को झटका लगा, क्यांेंकि ये उपकरण ज्यादा आकर्षक थे। इसके अलावा कमीशन एजेंटों की भूमिका इन्हें लोकप्रिय बनाने में रही। अब गोपीनाथ कमिटी ने कहा है कि कमीशन एजेंटों के कमीशन को ही लगातार कर कर दिया जाए और अंततः उनकी भूमिका ही समाप्त कर दी जाए।
इस सिफारिश का क्या मतलब है? एक आकलन के अनुसार लधु बचत योजनाआंे के कमीशन एजेंट को सालाना 2000 करोड़ रुपए की आय होती है। 20 अरब की यह राशि गोपीनाथ कमिटी को शायद बहुत ज्यादा लगी हो, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि आज लघु बचत योजनाओं के तहत 8 लाख करोड़ रुपए जमा हैं और इतनी बड़ी राशि जमा होने में कमीशन एजेंटों की भूमिका महतवपूर्ण रही है। पेंशन जैसी योजनाआंे को यदि आज सफलता नहीं मिली है, तो उसका एक बड़ा कारण कमीशन एजेंटों का उन योजनओं में अभाव रहा है। तो क्या यह माना जाए कि कमीशन एजेंटों की भूमिका को क्रमशः समाप्त करके सरकार छोटी बचत योजनाओं को ही समाप्त करना चाहती है?
जब यशवंत सिन्हा केन्द्र सरकार में वित्त मंत्री थे, तो राष्ट्रीय लघु बचत कोष का निर्माण किया गया था। इस कोष का निर्माण चाहे जिस उद्देश्य से किया गया हो, सच्चाई यही है कि इस कोष को सफल नहीं माना जा सकता है। इसका घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है और अब तो इसका कुल जमा घाटा इसकी अपनी कुल परिसंपत्ति से भी ज्यादा हो गया है। कोष सरकारी खजाने पर बोझ बन गया है और इसके भार से दबी सरकार ने ही श्यामला गोपीनाथ कमिटी का गठन किया था। कमिटी की सिफारिशें यदि मान भी ली जाए तो कोष की समस्या का अंत कैसे होगा, य िसमझ पाना कठिन है।
1999 में राष्ट्रीय लघु बचत कोष का निर्माण किया गया था। उसके पहले लघु बचत योजनाओं में निवेशित राशि की विकास दर बैंकों में निवशित राशि की दर से बहुत ज्यादा हुआ करती थी, लेकिन कोष के निर्माण के साथ ही विकास दर का अतर कम होने लगा और 2005-6 में तो बैंक आगे बढ़ गए। इसके लिए अनेक कारण जिम्मेदार थे, उन कारणों की तह में कमिटी को जाना चाहिए था, लेकिन तह में जाए बिना जो सिफारिशें की गई हैं, उनसे राष्ट्रीय लघु बचत कोष का उद्धार तो नहीं ही होगा, चल रही अनेक लघु बचत योजनाएं बुरी तरह प्रभावित होंगी।
इन योजनाआंे का कर रियायतों का लाभ भी मिलता रहा है। उनमें निवेश पर टैक्स छूट मिलती है। पर आने वाले दिनों में जल्द ही प्रत्यक्ष करों की व्यवस्था बदलने वाली है। आयकर कानून, 1961 की जगह डायरेक्ट टैक्स कोड लागू हो जाएगा और उसके तहत अनेक प्रकार की आयकर छूट योजनाआंे को ही समाप्त कर दिया जाएगा। इन योजनाओं की छांव में चल रही छोटी बचत योजनाओं का भविष्य क्या होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। डायरेक्ट टैकस कोड के अस्तित्व में आने के पहले ही डाकघरो की बचत योजनाओं पर होने वाली आय को टैक्स के दायरे में लाकर सरकार ने जाहिर कर दिया है कि उसका इरादा क्या है। (संवाद)
श्यामला गोपीनाथ कमिटी की सिफारिशें
क्या लघु बचत योजनाओं का भविष्य धूमिल है?
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-06-22 04:55
छोटी बचत योजनाओं पर श्यामला गोपीनाथ कमिटी की रिपार्ट आने के 10 दिनों के अंदर ही आयकर विभाग ने देश के डाकघरों में अपनी बचत का निवेश करने वाल बचतकर्त्ताओं की ब्याज पर होने वाली आय को टैक्स के दायरे मं लाने की घोषणा कर दी। आयकर विभाग के इस निर्णय के क्या संकेत हो सकते हैं?