सच कहा जाए तो अटकलबाजी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बने रहने पर भी की जा रही थी। जब दिग्विजय सिंह, मोतीलाल बोरा और बीरेन्द्र सिंह जैसे कांग्रेसी नेता राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बातें करने लगे थे तो इस तरह की अफवाहों को बल मिलने लगा था। इस पर प्रधानमंत्री के निवास से एतराज किया गया, तो इस तरह की अफवाह पर लगाम लगाने की कार्रवाई तेजी से की गई। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री पद से हटने और उनकी जगह राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की अफवाह पर अब पूरी तरह से विराम लग चुका है।

आखिर मंत्रिपरिषद में फेरबदल की जरूरत ही क्यों आ पड़ी? इसका कारण तो यही है कि मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल के दो साल पूरे हो चुके हैं और इसके बाद सरकार के लिए यह जस्री हो जाता है कि मंत्रियों के कार्यो की समीक्षा के आधार पर उनके काम में बदलाव किया जाय और जिनका काम अच्छा नहीं रहा है, उन्हें हटा दिया जाय। वैसे भी सरकार की छवि बहुत खराब हो रही है। विपक्षी हमलों के कारण ही नहीं, बल्कि सरकार के मंत्रियों के आपसी विराधाभासों के कारण भी सरकार की छवि खराब हुई है। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी और गृहमंत्री पी चिदंबरम के बीच के मतभेद भी सामने आए हैं। वित्त मंत्रालय की जासूसी करवाने के आरोप भी लग रहे हैं। इस माहौल में प्रधानमंत्री के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अपनी टीम का फिर से गठन करें और यह दिखाएं की उनकी टीम के सभी सदस्य टीम भावना से काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुछ समय पहले खुद घोषणा की थी कि मानसून सत्र के पहले वे अपनी मंत्रिपरिषद में फेरबदल करेंगे।

मंत्रिमंडल का फेरबदल डीएमके और टीएमसी के कारण भी जरूरी हो गया है। डीएमके कोटे के एक मंत्री ए राजा को उनके पद से हटा दिया गया है और उनकी जगह डीएमके के किसी अन्य सांसद को मंत्री बनाया जाना है। डीएमके के ही एक मंत्री दयानिधि मारन का नाम 2 जी स्पेक्ट्रम के संचार घोटाले मे ंसामने आया है। उनके खिलाफ सीबीआई ने जांच शुरू भी कर दी है। उनकी जगह किसी और को प्रधानमंत्री अपनी टीम में ले सकते हैं। डीएमके फिर से संचार मंत्रालय अपने पास लेना चाहेगी, लेकिन इसकी संभावना ज्यादा है कि कांग्रेस इसे अपने पास रखना चाहेगी।

उधर ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गई हैं और रेल मंत्रालय प्रधानमंत्री के पास चला गया है। अपनी जगह अपनी पार्टी के किसी सांसद को ममता मंत्रिपरिषद में लाना चाहेंगी। अभी तक उनकी पार्टी से एक ही कैबिनेट मंत्री था और वह खुद थीं। अब यदि वे चाहें तो उनकी पार्टी के 4 सासंद केन्द्रीय मंत्री हो सकते हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता इस तरह की मांग रख सकती हैं। वह रेल मंत्रालय भी अपनी पार्टी के ही किसी मंत्री के पास रखना चाहेंगी।

उत्तर प्रदेश के चुनाव को लेकर की मंत्रिपरिषद में फेरबदल जरूरी हो सकता है। कांग्र्रेस अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के साथ वहां चुनावी तालमेल कर सकती है। इसके लिए अजित सिंह केन्द्र में भी सत्ता की साझेदारी का प्रस्ताव रख सकते हैं। तब यूपीए सरकार में उन्हें शामिल करना जरूरी हो जाएगा।

डीएमके और तृणमूल कांग्रेस की अपेक्षाओं को पूरा करने में मनमोहन सिंह को उतनी समस्या शायद नहीं होगी, जितनी कांग्रेस के लोगों को मंत्रिपरिषद में लाने अथवा मंत्रिपरिषद से बाहर करने में। मिल रहे संकेतों के अनुसार प्रधानमंत्री युवा चेहरों को सरकार में ला सकते हैं और अनेक लोगों को मंत्रिपरिषद से बाहर भी कर सकते हैं। विदेश मंत्री एस एम कृष्णा को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमिटी का भार दिया जा सकता है। कुछ और मंत्रियों को भी सरकार से हटाए जाने की संभावना है। नए लोगों को शामिल करने मे तो ज्यादा कठिनाई नहीं है, लेकिन पुराने लोगों को बाहर करना निश्चय ही मुश्किल में डालने वाला काम है। जाहिर है, मंत्रिमंडल का विस्तार करना और मंत्रालयों में फेरबदल करना प्रधानमंत्री के लिए एक चुनौती भरा काम है। (संवाद)