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बिहार की हार पर कांग्रेस में तकरार

समस्या कांग्रेस में नहीं, सोनिया परिवार में है
उपेन्द्र प्रसाद - 2020-11-19 11:12 UTC
इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी राजग सरकार कांग्रेस की ज्यादा से ज्यादा सीटों पर लड़ने की जिद के कारण बनी है। कांग्रेस ने जिद करके 70 सीटें गठबंधन में प्राप्त कर ली, लेकिन उसके उम्मीदवार मात्र 19 सीटों पर ही जीत सके और 51 सीटें हार गए। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आम चुनाव में भी कांग्रेस ने 100 से ज्यादा सीटें अखिलेश यादव से हासिल कर ली थी और उसके उम्मीदवार भारी संख्या में हारे।

बीएसपी अब अति पिछड़ों को देगी महत्व

मायावती सपा या कांग्रेस से समझौता नहीं करेंगी
प्रदीप कपूर - 2020-11-18 11:23 UTC
उत्तर प्रदेश बसपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भीम राजभर की नियुक्ति के साथ, मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि वह 2022 में होने वाले अगले विधानसभा चुनावों के लिए अपने समर्थन आधार का विस्तार करने के लिए अधिकांश पिछड़ी जातियों पर ध्यान केंद्रित करेगी।

कोविड-19 की जटिलता भारत सरकार को दे रही है नई चुनौतियां

बहुत कुछ वैक्सिन की सफलता और उपलब्धता पर निर्भर करता है
डॉ अरुण मित्रा - 2020-11-17 13:26 UTC
चीन के वुहान में कोविड- 19 के पहले मामले दुनिया के सामने आने को एक साल होने वाला है। इस बीच इस विषाणु के महामारी के रूप में फैलने के तरीके के बारे में बहुत शोध किया जा चुका है। अभी भी आरोप और प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं कि यह चीन में जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया जा रहा था। लेकिन यह आज तक सबूत के साथ प्रमाणित नहीं किया गया है। हमारे देश में केरल राज्य में 30 जनवरी 2020 को पहला मामला सामने आया था जब वुहान का एक छात्र भारत में अपने घर वापस आया था। उस समय सरकार की ओर से शिथिलता और उदासीनता कई समस्याओं और मामलों की संख्या में वृद्धि का कारण बनी।

बिहार में महागठबंधन की हार

कांग्रेस अब अपने सहयोगियों के लिए भी भारी पड़ रही है
उपेन्द्र प्रसाद - 2020-11-16 10:00 UTC
बिहार में एक बार फिर नीतीश की सरकार बन रही है और लालू परिवार सत्ता से बाहर रह गया है। वैसे इसे बार लालू परिवार के हाथ में बाजी आ गई थी। बिहार की नीतीश सरकार और केन्द्र की मोदी सरकार के खिलाफ लोगों में जबर्दस्त असंतोष था। चिराग पासवान का इस्तेमाल कर भारतीय जनता पार्टी खुद बिना नीतीश के सत्ता में आने की कोशिश कर रही थी। उसके समर्थकों के करीब 25 फीसदी मत चिराग की पार्टी के उम्मीदवारों को पड़े। चिराग के उम्मीदवारों के कारण, जिन्हें भाजपा के मतदाताओं का समर्थन हासिल था, नीतीश के जदयू के कम से कम 36 उम्मीदवार चुनाव हार भी गए। पर इन सबके बावजूद राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को बहुमत नहीं हासिल हुआ। वह 110 सीटों तक ही सीमित रह गया। यदि उसे 117 सीटें भी आ जातीं, तो ओवैसी की पार्टी की मदद से उसकी सरकार बन सकती थी।
नेहरुजी की जयंती पर विशेष

नेहरूजी से जुड़े कुछ दिलचस्प संस्मरण

‘मैं नेहरू की परछाई था’
एल एल हरदेनिया - 2020-11-13 17:42 UTC
यह हमारे प्रदेश के लिए सौभाग्य की बात थी कि हमारे प्रदेश के आईपीएस कैडर के अधिकारी श्री के एफ रुस्तमजी को छह वर्ष तक देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सुरक्षा करने का अवसर मिला। उन्हें 1952 में नेहरू जी की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। वे नेहरू जी के साथ बिताए गए समय के अनुभवों को अपनी डायरी में नोट करते रहे। बाद में इन्हें एक किताब के रूप में प्रकाशित किया गया। इस किताब के प्रकाशन में भी हमारे प्रदेश के दो आईपीएस अधिकारियों की प्रमुख भूमिका थी। यह दो अधिकारी थे श्री राजगोपाल और श्री के एस ढिल्लों।

उपचुनावों के बाद शिवराज और मजबूत होकर उभरे

सिंधिया अब मध्यप्रदेश के अब स्थापित भगवा नेता हो गए हैं
एल एस हरदेनिया - 2020-11-12 10:22 UTC
भोपालः मध्य प्रदेश के उपचुनावों के नतीजों ने कांग्रेस के नारे “गद्दारों को हराओ” के नारे को नकार दिया है, दलबदल और दलबदलुओं को भारी समर्थन दिया है और भाजपा के तीन मंत्रियों (पूर्व कांग्रेस विधायकों) को हराने का काम भी किया है। उन तीन पराजित मंत्रियों में एक विवादास्पद दलित महिला मंत्री इमरती देवी शामिल हैं, जिन्हें कमलनाथ ने आयटम कह दिया था।

बिहार चुनाव में नीतीश जीते, मोदी हारे

चिराग की सहायता से अपनी सरकार बनाने का भाजपाई मंसूबा नाकाम
उपेन्द्र प्रसाद - 2020-11-11 08:51 UTC
बिहार चुनाव के नतीजों के बाद नीतीश कुमार एक बार फिर मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन इस बार मुख्यमंत्री वे सिर्फ विरोधी पद्वा की पार्टियों को हराकर ही नहीं बन रहे हैं, बल्कि वे अपने सहयोगी भाजपा के मंसूबों को हराकर भी सरकार का नेतृत्व करने जा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी 74 सीटें लाकर भले नीतीश की पार्टी से 31 सीटें ज्यादा जीतने का दावा करे, लेकिन उसका लक्ष्य न सिर्फ ज्यादा सीटें जीतना था, बल्कि अपने नेतृत्व में बिहार की सरकार बनाना था। इसके लिए एक जबर्दस्त योजना बनाई गई थी, जिसमें मोहरा चिराग पासवान को बनाया गया था।

लैटिन अमेरिका में समाजवाद मजबूत हो रहा है

बोलिविया में जीत के बाद इक्वेडर, चिली और ब्राजील में भी बढ़ रही उम्मीदें
नित्या चक्रवर्ती - 2020-11-10 11:20 UTC
18 अक्टूबर को आम चुनावों में समाजवाद के आंदोलन की भारी जीत के बाद 8 नवंबर को नए वामपंथी बोलीविया के राष्ट्रपति लुइस एर्स का शपथ ग्रहण दक्षिणपंथी राजनीति के लिए लैटिन अमेरिका की राजनीति में एक नई पारी के संकेत देता है, जो दक्षिणपंथी के बाद गुलाबी ज्वार की ओर है। पिछले कुछ वर्षों में प्रभुत्व।

किसानों की नाराजगी ने नीतीश की हालत खराब कर दी

एमएसपी के कार्यान्वयन के लिए एक बाजार नियामक को स्थापित करने की आवश्यकता है
अशोक बी शर्मा - 2020-11-09 11:15 UTC
हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव में किसानों का मुद्दा सामने आया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2006 में राज्य कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) अधिनियम को वापस ले लिया था। राज्य के किसानों को इस कदम से कोई लाभ नहीं हुआ, बल्कि वे असहाय अवस्था में हैं और अपनी उपज को न्यूनतम रूप से बेचने में असमर्थ हैं। नीतीश ने एपीएमसी अधिनियम को निरस्त करते हुए, उस रणनीति की योजना बनाई होगी जिसके द्वारा किसान अपनी उपज बेंचमार्क कीमतों से नीचे बेच सकते हैं जो इस मामले में एमएसपी हैं। कुछ राज्यों ने अपने कानून में पर्याप्त प्रावधान किए बिना अपने एपीएमसी अधिनियमों के दायरे से फलों और सब्जियों को हटा दिया है, जिससे किसानों को बिक्री पर पर्याप्त लाभ मिल सकता है।

बिहार विधानसभा चुनाव: नीतीश रहेंगे या जाएंगे?

उपेन्द्र प्रसाद - 2020-11-07 10:26 UTC
बिहार विधानसभा चुनावों के लिए मतदान संपन्न हो गए और अगले 10 नवंबर को परिणाम भी सामने आ जाएंगे। चुनाव प्रचार के दौरान सभाओं में उमड़ी भीड़ को देखकर कोई भी कह सकता है कि तेजस्वी के नेतृत्व वाले कथित महागठबंधन की जीत होगी, लेकिन बिहार में ऐसे उदाहरण भी हैं कि सबसे ज्यादा भीड़ जुटाने वाली पार्टी हार भी गई थी। 2015 का विधानसभा चुनाव ही इसका सबसे ताजा उदाहरण है। उस साल हुए चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभा में सबसे ज्यादा भीड़ उमड़ती थी। लालू यादव और नीतीश की सभा में कम लोग आते थे और सभाएं छोटी छोटी ही हुआ करती थी। हिलसा विधानसभा क्षेत्र में तो लालू की सभा में अपने तय समय पर 100 भी लोग एक बार नहीं जुटे थे और लालू राजद प्रत्याशी को लताड़कर बिना भाषण दिए वहां से चले गए थे, लेकिन वहां भी जीत राजद की ही हुई थी। उस चुनाव में मोदी की सभा में भारी भीड़ जुटाने वाली भाजपा की करारी हार हुई थी।