Skip to main content

View Articles

ट्रंप के अत्यधिक टैरिफ़ काल में भारत में जापानी निवेश फिर से बढ़ा

टोक्यो ने चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया को पीछे छोड़ते हुए भारत में भारी निवेश किया
सुब्रत मजूमदार - 2026-08-28 10:39 UTC
जापानी येन की कीमत बढ़ने के बाद के दौर में, जापानी विदेशी निवेश कम लागत वाले विनिर्माण के लिए चीन और आसियान की ओर चला गया था, जिससे भारत पीछे छूट गया था। अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के ऊंचे जवाबी टैरिफ़ की वजह से यह रूझान उलटी दिशा में चल पड़ा है। भारत में जापानी निवेश तेज़ी से बढ़ा है और इसने चीन और आसियान को पीछे छोड़ दिया है। जहां 2025 में भारत में जापानी निवेश 37.1 प्रतिशत बढ़ा, वहीं चीन और आसियान में इसमें क्रमशः 29.1 प्रतिशत और 48.9 प्रतिशत की गिरावट आई।

रणनीतिगत अंतरिक्ष क्षमता निजी क्षेत्र को सौंपना खतरनाक

अनचाहे हस्तांतरण के खिलाफ संस्थागत व्यवस्था की कमी चिंता की बात
के रवींद्रन - 2026-08-27 11:17 UTC
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के भविष्य पर बहस अब इस जानी-पहचानी बहस से बहुत आगे निकल गई है कि क्या निजी उपक्रमों को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में कोई भूमिका मिलनी चाहिए। निजी भागीदारी अब कोई मनगढ़ंत बात नहीं है। यह सरकार की नीति, जिसे कानून, विनियामक बदलाव, विदेशी निवेश उदारीकरण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और स्टार्ट-अप के बढ़ते इकोसिस्टम का समर्थन है। असली सवाल यह है कि क्या भारत इसरो के आस-पास एक बड़ी राष्ट्रीय अंतरिक्ष क्षमता बना रहा है या धीरे-धीरे सार्वजनिक क्षेत्र में बनाई गई क्षमता को इसरो से बाहर हस्तांतरित कर रहा है, बिना काफी मजबूत सुरक्षा उपाय बनाए।

जन-विरोधी है केंद्र की चीनी नीति, गरीबों के लिए इसे खरीदना मुश्किल

25 अगस्त को खुदरा बाज़ार में चीनी की कीमतें ₹65 से ₹80 के बीच पहुंच गईं
ज्ञान पाठक - 2026-08-26 11:15 UTC
भारत में चीनी की कीमतों में हालिया भारी बढ़ोतरी पर केंद्र सरकार के बयानों पर एक नज़र डालने से ही यह साफ़ हो जाता है कि केंद्र की चीनी नीति में गंभीर खामियां हैं और यह जन-विरोधी है, जिससे गरीबों के लिए इसे खरीदना मुश्किल हो गया है। साथ ही, कीमतों को नियंत्रित करने में भी कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। कीमतों को नियंत्रित करने के सरकारी दावों के बावजूद, 25 अगस्त, 2026 को पूरे भारत में निजी बाज़ार में खुदरा चीनी की कीमतें ₹65 से ₹80 के बीच पहुंच गईं, जबकि 'प्राइस मॉनिटरिंग सिस्टम' के आधिकारिक सरकारी आंकड़ों में 24-25 अगस्त को राष्ट्रीय औसत कीमत ₹63.05 प्रति किलोग्राम दर्ज की गई। 20 जुलाई को कीमत ₹48.18 प्रति किलोग्राम थी, जहां से इसमें भारी बढ़ोतरी हुई है।

नयी परियोजनाएं शुरू करने से पहले पुराने को पूरे करें

अधूरी परियोजनाओं में समय और लागत में भारी बढ़ोतरी हो रही है
नन्तू बनर्जी - 2026-08-25 11:13 UTC
केंद्रीय कैबिनेट ने पांच नयी अवसंरचना परियोजनाओं को मंज़ूरी दी है, जिनकी कुल अनुमानित लागत 13,041 करोड़ रुपये है। ये परियोजनाएं विकास के लिए बहुत ज़रूरी लगते हैं। लेकिन, पिछले अनुभव को देखते हुए इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे अपने मकसद को पूरा करने के लिए समय पर पूरे हो जाएंगे। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्यवन मंत्रालय के सरकारी आंकड़े से पता चलता है कि 150 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाले 1,847 बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं की कुल लागत में 4.92 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है क्योंकि वे कई कारणों से समय पर शुरू नहीं हो सके। लागत में यह भारी बढ़ोतरी समय में भारी बढ़ोतरी के कारण हुई है। इन परियोजनाओं की मूल लागत अब लगभग बेमतलब हो गई है। बेहतर होगा कि सरकार को नयी परियोजनाओं को शुरू करने से पहले इन लंबित परियोजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करने की कोशिश की जाए।

मक्का समझौते में शामिल होने की ओर बढ़ सकता है बांग्लादेश

ढाका और अंकारा को दुष्प्रचार का कोई मौका न दे भारत
असद मिर्ज़ा - 2026-08-24 11:22 UTC
कूटनीति में शब्दों का बहुत महत्व होता है, और बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने बहुत सोच-समझकर अपने शब्दों का चुनाव किया, जब उनसे पूछा गया कि क्या ढाका मक्का संयुक्त रक्षा समझौता में शामिल होगा? कबीर ने इनकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश "अपने हितों को ध्यान में रखते हुए" इस विकल्प पर विचार करेगा। यह उस देश की भाषा है जो दरवाज़ा खुला रखता है, न कि उसे बंद करने वाले देश की।

भूराजनीति में भारत की गिरती स्थिति: हम कहां चूक गए?

वैश्विक नीति के नेतृत्व से बाहर होता जा रहा भारत
डॉ. अरुण मित्रा - 2026-08-22 10:30 UTC
दुनिया एक बड़े भूराजनीति बदलाव से गुज़र रही है। उभरता हुआ अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली तेज़ी से बहुध्रुवीय होता जा रहा है, जिसमें शक्ति और असर कई केन्द्रों में बंटे हुए हैं। यह उस दो-ध्रुवीय बंटवारे से एक बड़ा बदलाव है जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की पहचान थी, जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने पश्चिमी और साम्राज्यवादी खेमे का नेतृत्व किया था जबकि सोवियत यूनियन ने समाजवादी खेमे का।

जवाबदेही का मुद्दा फिर से एजेंडे पर

प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए बड़े पैमाने पर निगरानी की तैयारी
नीलोत्पल बसु - 2026-08-21 11:19 UTC
यह एक अजीब स्थिति थी। संसद के मॉनसून सत्र के आखिरी दिन से ठीक एक दिन पहले बेहद ताकतवर गृह मंत्री अमित शाह मीडिया चैनलों से बात करते हुए निराश दिखे। उन्होंने कहा, 'लोकसभा के अंदर जाने का क्या मतलब है!' संदर्भ के लिए बता दें कि मॉनसून सत्र का लगभग पूरा समय बिना किसी खास कामकाज के बीत गया, क्योंकि शाह जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए शांतिपूर्ण छात्र विरोध प्रदर्शन से निपटने में दिल्ली पुलिस की भूमिका के बारे में बताने से इनकार कर रहे थे।

'पीएम केयर्स' फंड का ज़्यादातर हिस्सा बैंकों में फिक्स्ड डिपॉज़िट में रखा गया

ऑडिट से पता चला कि ज़रूरतमंदों को पैसे देने को कम प्राथमिकता दी गई
डॉ. ज्ञान पाठक - 2026-08-20 10:43 UTC
यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि मार्च 2020 में कोविड-19 संकट के दौरान अपनी सार्वजनिक छवि को बेहतर बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद "पीएम केयर्स " नाम का प्रचार-प्रसार वाला शब्द गढ़ा था, ताकि लोगों को बताया जा सके कि वह लोगों का ध्यान रखते हैं। इस शब्दावली को विस्तारित कर इसका नाम रखा गया "प्राइम मिनिस्टर्स सिटिजन एसिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमर्जेंसी सिचुएशन " (आपातकालीन स्थिति में प्रधानमंत्री की नागरिक सहायता और राहत) रखा गया और इसे 27 मार्च 2020 को लॉन्च किया गया, ठीक 24 मार्च 2020 की शाम को लॉकडाउन की घोषणा के बाद। विपक्ष का आरोप था कि इसे प्रधान मंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से अलग इसलिए बनाया गया था ताकि फंड की सार्वजनिक जांच से बचा जा सके। अब छह साल बाद हमें एहसास हो रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करने के बजाय दान का पैसा बैंकों में फिक्स्ड डिपॉज़िट में रखना ज़्यादा पसंद था।

मौत की सज़ा बरकरार, लेकिन पूरी तरह खुला है इसे खत्म करने का रास्ता

सरकार के मारने के अधिकार पर फिर से सोचने पर मजबूर कर सकता है विज्ञान
के रवींद्रन - 2026-08-19 10:31 UTC
भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फांसी देकर मौत की सजा देने को चुनौती देने वाली याचिका को बड़ी संविधान पीठ को भेजने से इनकार करना, पहली नज़र में मौत की सज़ा की कानूनी नींव को मज़बूत करने जैसा लग सकता है। परन्तु करीब से देखने पर यह ज़्यादा मुश्किल दिशा की ओर इशारा करता है। बेंच ने मौजूदा कानून को तो बचाए रखा है, लेकिन जानबूझकर इसे वैज्ञानिक या संवैधानिक रूप से नहीं बदलने लायक मानने से इनकार कर दिया है। यह मानकर कि औषधि विज्ञान, तंत्रिका विज्ञान (मस्तिष्क विज्ञान), और प्रत्यक्ष शोध में तरक्की पहले के फैसले के पीछे की सोच को बदल सकती है, इसने एक ऐसी बहस में एक ज़रूरी रास्ता खोला है जो फांसी की यांत्रिकी से कहीं आगे तक जाती है।

झारखंड के सामाजिक, राजनीतिक माहौल में छात्र आन्दोलन एक मील का पत्थर

और तेज़ हो रहा है जंतर मंतर से प्रेरित होकर शुरु हुआ आन्दोलन
कल्याणी शंकर - 2026-08-18 10:40 UTC
हाल के वर्षों में झारखंड में सामाजिक मुद्दों के बारे में बढ़ती जागरूकता और बेहतर प्रतिनिधित्व की ज़रूरत महसूस किए जाने के कारण छात्रों में सक्रियतावाद में बढ़ोतरी देखी गई है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के पूरे भारत में उभरने के बाद हुए छात्र आन्दोलन ने झारखंड की सामाजिक-राजनीतिक कहानी में एक अहम मोड़ ला दिया।
  • «
  • 1 (current)
  • 2
  • 3