किसी नाटक के दो अंकों के बीट आने वाले क्षेपक को अंकावतार कहा जाता है जो वस्तुत: अर्थोपक्षेपक का ही एक भेद है। इसमें पहले अंक की विषयवस्तु को समाप्त किये बिना ही दूसरे अंक की विषयवस्तु की योजना का संकेत दिया जाता है। यह कार्य स्वयं पहले अंक के पात्रों द्वारा किया जाता है जो पहले अंक को बिना विच्छिन्न किये ही दूसरे अंक में दिखायी देते हैं।