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अरध-उरध

संस्कृत में उर्ध्व का परिवर्तित रुप है उरध। इसका अर्थ है ऊपर। सामान्य जन इसी को उरध कहते हैं। ठीक इसके विपरीत जो नीचे है उसे अरध कह दिया गया और इस प्रकार बना अरध-उरध।

संतो और योगियों की भाषा में अरध-उरध का विशेष अर्थ है जिसका प्रयोग नाथपंथियों, योगियों और संतों ने करते हुए कहा कि अरध-उरध को मिलाना ही परम कल्याण का कार्य है।

अरध को कुंडलिनी कहा गया जो मूलाधार में स्वयंभूलिंग को साढ़े तीन वलयों में घेरकर अधोमुखी अवस्था में सोयी रहती है। इसी को शक्ति माना गया।

उरध सहस्रार में रहने वाले शिव को कहा गया। गोरखनाथ इसी शक्ति को शिव से मिलाने की बात कहते हैं।

कहते हैं कि ध्यान योग से सोयी कुंडलिनी जागृत होती है तथा जो अरध स्थित यह शक्ति है वह ऊपर उरध में जाकर मिलती है।

अन्य संत भी हैं जो कहते हैं कि अरध-उरध को मिलाना ही योग है, अर्थात् प्राण (श्वास खींचना) और अपान (श्वास छोड़ना) को वे एक दूसरे में प्राणायाम के माध्यम से मिलाकर सहस्रार स्थित ब्रह्म में स्वयं का विलय करते हैं तथा ब्रह्मानंद प्राप्त करते हैं।

अरध-उरध को तो कबीर 'अरध-उरध की गंगा-यमुना' कहते हैं तथा इन दोनों के मिलन से ही परम सुख मिलता है।

मूलाधार पद्म को भी कई संत अरध कहते हैं तथा सहस्रार पद्म को उरध। कहा जाता है कि प्राण जब मूलाधार पद्म से ऊपर उठकर सहस्रार पद्म तक पहुंचता है तभी वह अखंड ज्योति जल उठती है जिसके प्राकाश में व्यक्ति परम ज्ञान प्राप्त करता है।

हठयोगियों के लिए अरध-उरध का एक और अर्थ यह है कि नीचे की ओर जाने वाले शुक्र को काम-वासना पर नियंत्रण कर उर्ध्वगामी बानाया जाये। इसमें जिसे सिद्धि मिलती है वही सिद्ध योगी होता है।


Page last modified on Monday January 13, 2014 18:35:36 GMT-0000