Loading...
 
Skip to main content
(Cached)

उड़िया साहित्य

उड़िया भाषा में लिखे गये साहित्य को उड़िया साहित्य कहा जाता है।

उड़िया साहित्य का आदियुग 11वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी के मध्य तक माना जाता है। इसे इतिवृत्त युग या सारलादास युग भी कहा जाता है। परन्तु इसके पूर्व के 'बौद्धगान ओ दोहा' प्रचलित थे जिन्हें उड़िया साहित्य का प्रारम्भिक रूप माना जाता है। इस युग में धार्मिक तथा तन्त्र साहित्य मिलते हैं। कालिका तन्त्र के चार में से एक स्वरूप ओड्डियान या ओडियाण का भी इसमें उल्लेख किया जा सकता है। सप्तांगयोगधारणम् नाम से एक पुस्तक भी है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह गोरखनाथ द्वारा रचित है। इसमें सात वारों की स्वरसाधना है। मादलापांजि नामक पुस्तक पुरी के जगन्नाथ मंदिर में रखी है जिसमें उड़ीसा के राजवंशों तथा मंदिर के नियोगों का इतिहास है। जिस प्रकार सप्तांगयोगधारणम् के गोरखनाथ द्वारा लिखे जाने की किंवदन्ती है उसी प्रकार एक किंवदन्ती है कि गंगवंश के प्रथम राजा चोडगंगदेव ने 1042 में मादलापांजि का लेखन शुरू किया था। परन्तु कई अन्य विद्वान मानते हैं कि 16वीं शताब्दी में रामचन्द्रदेव के शासनकाल में इसे लिखवाया गया था। 13वीं-14वीं शताब्दी की एक पुस्तक रुद्रसुधानिधि भी आंशिक रूप से उपलब्ध है। नारायणानंद अवधूत नामक एक योगी ने इसे लिखा था। यह एक शैव ग्रंथ है जिसमें एक योगभ्रष्ट योगी के जीवन पर लिखा गया है। इसकी शैली पर मतभेद है। कुछ इसे वृत्तगन्धि गद्य में लिखा मानते हैं तथा कुछ दण्डिवृत्त में। उसके बाद हास्य रस में लिखा वत्सादास की पुस्तक कलशा चौतिशा है।

उसके बाद सारलादास युग का प्रारम्भ होता है जो सही अर्थों में उड़िया साहित्य के आदि काल के प्रतिनिधि लेखक हैं। वह अपने अज्ञानी और शूद्रमुनि कहते थे। उनका वास्तविक नाम था सिद्धेश्वर परिडा (खण्डायन)। उन्होंने कवि होने के बाद स्वयं को सारलादास कहना प्रारम्भ किया क्योंकि वे कटक जिले के झंकडवासिनी देवी चण्डी सारला की कृपा से कवि हुए थे। चौदहवीं-पन्द्रहवीं शताब्द के ही उनके समसामयिक कवि थे कपिलेन्द्रदेव। उनकी तीन प्रमुख कृतियां हैं - विलंका रामायण, महाभारत तथा चण्डीपुराण।

इस युग की अन्य पुस्तकों में अर्जुनदास का काव्य ग्रंथ रामविभा, चैतन्यदास की विष्णुगर्भपुराण तथा निर्गुणमाहात्म्य प्रमुख हैं। चैतन्यदास अलखपंथी निर्गुनिया सम्प्रदाय के संत थे।

16वीं शताब्दी के मध्य से 19वीं शताब्दी के मध्य तक उड़िया साहित्य का मध्ययुग रहा। इस मध्य युग का प्रथम भाग 18वीं शताब्दी तक चला जिसे पूर्वमध्ययुग कहा जाता है। इस काल को भक्तियुग या पंचसखायुग भी कहा गया है। उसके बाद के मध्ययुग को उत्तरमध्ययुग कहा गया। इसे रीतिकाल या उपेन्द्र-भंजयुग के नाम से भी जाना जाता है।

पूर्वमध्ययुग ज्ञानमिश्रा तथा योगप्रधान भक्तियुग है। पुरी जगन्नाथ को ही कृष्ण और उपास्यदेव माना गया। इसके पूर्व के शून्यवाद का शून्य भी जगन्नाथ जी को ही माना गया। चैतन्य महाप्रभु बंगाल से यहां आये थे तब उस समय के वर्गीय वैष्णव उन्हें छोड़कर भाग गये थे। पांच लोगों - बलरामदास, जगन्नाथदास, यशोवन्तदास, अनन्तदास तथा अच्युतानन्ददास – ने उनसे साख्य स्थापित किया जिसके कारण ये पंचसखा के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्होंने उड़िया में अनेक ग्रंथ लिखे जिसके कारण उड़ीया साहित्य के इस काल को पंचसखा या पंचवैष्णव युग भी कहते हैं।

सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में दिवाकरदास जैसे जीवनी लेखक और कवि हुए। सत्रहवीं शताब्दी में ईश्वर दास ने चैतन्य भागवत लिखा। सालवाग नामक मुसलमान भक्त कवि ने भी काव्य रचे थे। धार्मिक साहित्य इस काल की विशेषता है परन्तु लौकिक काव्य का प्रारम्भ भी इसी काल में हुआ जिसमें प्रतापराय रचित शशिसेणा का उल्लेख किया जा सकता है।

उसके बाद रीतिकाल आया जिसमें पौराणिक तथा लौकिक दोनों तरह के साहित्य की रचनाएं हुईं। नायिकाओं के वर्णन से यह भरपूर है। उपेन्द्रभंज (1685-1725) ने श्रृंगार को एक नयी ऊंचाई दी जिसके कारण इसे उपेन्द्रभंज युग भी कहा जाता है। कहीं-कहीं उनका श्रृंगार सीमाओं का उल्लंघन कर अश्लील भी हो गया। उपेन्द्रभंज के पितामह घुमसर के राजा धनंजयभंज (1637-1701) ने भी ऐसा साहित्य रचे थे जिसमें रघुनाथविलास-काव्य, त्रिपुरसुन्दरी, मदनमंजरी और अन्य लौकिक काव्य रचे थे।

दीनकृष्णदास द्वितीय मुकुन्ददेव (1651-1668) तथा दिव्यसिंहदेव (1686-1703) ने भी अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे थे जिनका काव्य उच्चकोटि का माना जाता है। वृंदावनी दासी ने कृष्ण भक्ति पर पूर्णतम चन्द्रोदय नामक रचना की।

बाहर से आये लोगों में भूपति पंडित नामक एक सारस्वत ब्राह्मण का उल्लेख किया जा सकता है जिन्होंने उड़िया सीखी और प्रेम-पंचामृत नामक ग्रंथ लिखा जिसमें कृष्णलीला है।

लोकनाथ विद्यालंकार ने अनेक ग्रंथ लिखे जिनमें रीतिकालीन काव्य ही अधिक हैं। ब्रजनाथ बडजेना और भीम भोई के नाम भी उल्लेखनीय हैं। भीम भोई उड़ीसा के प्रख्यात लोगों में रहे जो जन्म से अंधे, निरक्षर कन्ध आदिवासी थे परन्तु उनके द्वारा रचित स्तुतिचिंतामणि में अद्भुत ब्रह्मनिरुपण मिलता है। वे कुम्भिपाटिआ या महिमा धर्म के अनुयायी थे।

19वीं शताब्दी के मध्य से उड़िया साहित्य के आधुनिक युग का प्रारम्भ हुआ। मुगलकाल और मरहट्टा काल की समाप्ति के बाद अंग्रेजी शासन आया जिसका प्रभाव उड़िया साहित्य पर भी पड़ा। इस काल के एक प्रमुख कवि हैं राधानाथ राय, जो एक स्कूल इंस्पेक्टर थे, और उनपर अंग्रेजी साहित्य का प्रभाव था, जो उनके काव्य में आया। उनके महापात्र नामक काव्य में जॉन मिल्टन का प्रभाव देखा जा सकता है। इस काल में गद्य और अनुवाद लेखन भी काफी हुए।

इसी राधानाथ युग में एक विवाद खड़ा हो गया कि उड़िया स्वतंत्र भाषा है या नहीं। बंगाल के विद्वान राजेन्द्रलाल मित्र आदि आन्दोलन चला रहे थे कि उड़िया एस स्वतंत्र भाषा नहीं है। इसके विरोध में फकीरमोहन सेनापाति आदि ने प्रति-आन्दोलन चलाया और कहा कि यह एक स्वतंत्र भाषा है। फकीरमोहन ने उत्कृष्ठ गद्य उपन्यास लिखकर उसकी भाषा और शैली को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने पद्य भी रचे और रामायण, महाभारत तथा छान्दोग्योपनिषद् का उड़िया में पद्यानुवाद भी किया।

एक अन्य स्कूल इंस्पेक्टर थे मधुसूदन राय। वे इस काल के प्रमुख उड़िया कवियों में एक हैं। वे एक भक्त कवि थे।

इस काल में उड़िया नाटकों का उद्भव हुआ। रमाशंकर राय उस काल के एक प्रमुख नाटककार थे।

प्रकृति के कवि गंगाधर मेदेर, पल्लीकवि नन्दकिशोरवल, प्राबंधिक और सम्पादक विश्वनात कर, व्यंग्यकार गोपालचन्द प्रहराज भी प्रमुख उड़िया साहित्यकारों में गिने जाते हैं।

उसके बाद उड़िया साहित्य का सत्यवादी युग प्रारम्भ हुआ। स्वतंत्रता आन्दोलन, महात्मा गांधी और कांग्रेस राजनीति का प्रभाव उड़िया साहित्य पर पड़ा। सत्यवादी युग के प्रवर्तक हैं गोपबन्धु दास। अनेक साहित्यकारों का मानना था कि पूर्व के अनेक काव्यों ने उड़िया इतिहास और उसके जातीय चरित्र को कलंकित किया है। इसलिए इस युग के रचनाकारों ने इतिहास और जातीय सत्य को प्रतिष्ठित करने का काम किया जिसके कारण इस युग का नाम सत्यवादी युग पड़ा। इस युग के अन्य प्रमुख साहित्यकारों में थे नीलकंठ दास, गोदावरीश मित्र, पद्मचरण पट्टनायक, हास्यरसिक लक्ष्मीकान्त महापात्र और नारी कवि कुन्तला कुमारी।

उसके बाद रोमांटिक युग आया। मायाधर मान सिंह इस युग के प्रधान कवि हैं।

उसके बाद पांच रचनाकारों - कालिन्दीचरण पाणिग्रही, वैकुण्ठनाथ पट्टनायक, हरिहर महापात्र, शरच्चन्द्र मुखर्जी तथा अन्नदाशंकर राय – ने सबुज युग का प्रारम्भ किया। वाद में ये बिखर गये और अलग-अलग हो गये।

उड़िया साहित्य का प्रगति युग उसके बाद आया। इस युग के प्रमुख रचनाकार हैं - सच्चिदानन्द राउत राय, गोपीनाथ मोहन्ती, कान्दुचरण मोहन्ती, नित्यानन्द महापात्र, राधामोहन गडनायक, क्षुद्र गालिक, और गोदावरीश महापात्र।

आसपास के पृष्ठ
उत्कंठिता, उत्तमा, उत्तर, उत्तरमध्य काल, उत्पाद्य वस्तु, उत्प्रेक्षा

Page last modified on Monday June 26, 2023 07:07:41 GMT-0000