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छायावाद युग

हिन्दी कविता के इतिहास में छायावाद युग 1918 से 1942 तक माना जाता है जिस दौरान छायावादी कविताओं का प्रभुत्व रहा।

यह अलग बाद है कि रामचन्दॅ शुक्ल छायावाद का जन्म 1905 के लगभग, इलाचन्द्र जोशी तथा शिवनाथ 1913-14 में, तथा नन्द दुलारे वाजपेयी 1920 में मानते हैं।

छायावाद के जनक कौन थे इस विषय पर भी मतभेद हैं। रामचन्द्र शुक्ल ने मैथिलीशरण गुप्त तथा मुकुटधर पाण्डेय के, इलाचन्द्र जोशी तथा शिवनाथ जयशंकर प्रसाद को तथा नन्द दुलारे वाजपेयी सुमित्रानंदन पंत को मानते हैं। विनयमोहन शर्मा एवं प्रभाकर माचवे जैसे विद्वान माखनलाल चतुर्वेदी को इसका प्रवर्तक मानते हैं।

छायावाद युग को दो चरणों में विभक्त किया गया है। पहला चरण 1930 से पूर्व तथा दूसरा चरण उसके बाद का है।

छायावाद के चार महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं - जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत, तथा महादेवी वर्मा। अन्य प्रमुख कवियों में हैं - रामकुमार वर्मा, भगवती चरण वर्मा, जयशंकर भट्ट, नरेन्द्र शर्मा, अंचल, हरिकृष्ण 'प्रेमी', मोहनलाल महतो 'वियोगी', जानकी वल्लभ शास्त्री, सुमित्राकुमारी सिन्हा, विद्यावति 'कोकिल' आदि।

जयशंकर प्रसाद की कामायनी छायावाद युग का महाकाव्य है।

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छेकानुप्रास, छेकोक्ति, जगतानुबोध, जंगमभेस, जच्चा, जड़ता

Page last modified on Tuesday June 27, 2023 13:16:04 GMT-0000