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कश्मीर समस्या के लिए अमेरिका और ब्रिटेन जिम्मेदार

ये दोनों देश कश्मीर में अपना सैनिक अड्डा बनाना चाहते थे
एल एस हरदेनिया - 2019-03-22 08:40 UTC
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी सहित संपूर्ण संघ परिवार जवाहरलाल नेहरू को कश्मीर की समस्या के लिए उत्तरदायी मानते हैं। परंतु कश्मीर समस्या के इतिहास का बारीकी से अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि समस्या को उलझाने मंे ब्रिटेन व अमेरिका द्वारा की साजिशों की निर्णायक भूमिका थी। अमेरिका और ब्रिटेन, और विशेषकर ब्रिटेन यह चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान में विलय हो जाए।

क्या कांग्रेस का खोया हुए वैभव लौटा पाएंगी प्रियंका?

चुनावी अभियान की शुरुआत ज्यादा उम्मीद नहीं जगाती
अनिल जैन - 2019-03-22 08:35 UTC
कांग्रेस की संकट मोचक के तौर पर राजनीति के मैदान में उतारी गईं प्रियंका गांधी औपचारिक तौर पर अपनी पार्टी के लिए चुनाव अभियान पर निकल पडी हैं। कांग्रेस को प्रियंका से सबसे बडी उम्मीद यही है कि वे देश के सबसे बडे सूबे में पार्टी को उसका वह वैभव लौटाने में कामयाब होंगी, जो फिलहाल देश के राजनीतिक इतिहास की किताबों में दर्ज है या फिर पुरानी पीढी के लोगों की यादों के झरोखों में। लेकिन प्रियंका ने जिस तरह से धार्मिक प्रतीकों के सहारे अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की है वह बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं जगाता है, क्योंकि धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल करने में जो महारत भाजपा को हासिल है, उसकी बराबरी न तो कांग्रेस कर सकती है और न ही कोई अन्य पार्टी।

विपक्ष के विभाजन का लाभ भाजपा को

एकता की बात थोथी साबित हुई
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-03-20 10:11 UTC
आखिर वही हुआ जो होना था। तमाम दावों के बावजूद भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों की एकता महज एक राजनैतिक स्टंट साबित हुआ है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कुछ राज्यों में अभी भी एकता, गठबंधन और तालमेल की बात चल रही थी, लेकिन अब देर हो चुका है। गठबंधन से सिर्फ राजनैतिक दलों के वोट ही आपस मे नहीं जुड़ते, बल्कि इसके कारण जो राजनैतिक संदेश फैलते हैं उसके कारण फ्लोटिंग वोटर भी अपनी राय बनाते हैं। हार और जीत मे इन वोटरों की काफी भूमिका होती है। ये जिधर जाते हैं, जीत उन्हीं की होती है।

चुनाव की लंबी प्रक्रिया उचित नहीं

सभी क्षेत्रों में मतदान कम से कम चरणों में संपन्न होन चाहिए
नंतू बनर्जी - 2019-03-19 11:03 UTC
यह सब 1990 के दशक में मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन के समय शुरू हुआ था। चुनाव के दौरान हिंसा को रोकने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती करने वाले वह पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे। पहली बार आदर्श आचार संहिता को प्रभावी ढंग से लागू करने, चुनावों में बाहुबल और धन शक्ति पर लगाम लगाने, मामलों को दर्ज करने और मतदान नियमों का पालन नहीं करने के लिए उम्मीदवारों को गिरफ्तार करने और उम्मीदवारों के साथ नापाक गठबंधन करने के लिए अधिकारियों को निलंबित करने का श्रेय श्री शेषण को ही जाता है।

होली के विविध रंग

कहीं चलती हैं लाठियां, कहीं बरसते हैं पत्थर
योगेश कुमार गोयल - 2019-03-18 18:22 UTC
जन चेतना का जागरण पर्व होली हमें परस्पर मेल-जोल बढ़ाने और आपसी वैर भाव भुलाने की प्रेरणा देता है। रंगों के इस पर्व के प्रति युवा वर्ग व बच्चों के साथ-साथ बड़ों में भी अपार उत्साह देखा जाता है। वैसे तो यह त्यौहार देश में होलिका दहन व रंगों के त्यौहार के रूप में ही जाना जाता है लेकिन भारत के विभिन्न भागों में इस पर्व को मनाने के अलग-अलग और बड़े विचित्र तौर तरीके देखने को मिलते हैं। डालते हैं देशभर में होली के विविध रूपों पर नजर।

प्रशांत किशोर का राजनैतिक पतन

उनसे गलती कहां हुई
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-03-16 09:35 UTC
जब प्रशांत किशोर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने जनता दल(यू) का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था, तो चर्चा यह होने लगी थी कि किशोर को नीतीश अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी बनाने जा रहे हैं। वैसे उस दल में अनेक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव हैं, इसलिए एक और उपाध्यक्ष बन जाना कोई खास मायने नहीं रखता। सच तो यह है कि जनता दल (यू) के कितने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और वे कौन कौन हैं, इसकी जानकारी जनता दल(यू) के जानकार कार्यकत्र्ताओं को भी नहीं। प्रदेश स्तर पर तो उनकी संख्या सौ मे पहुंच जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर संख्या कम है, लेकिन कितने लोग उस पद पर हैं, इसकी जानकारी शायद बिहार प्रदेश जनता दल(यू) के उपाध्यक्ष पद पर बैठे सभी लोगों को नहीं होगी।

ग्लोबल आतंकवाद को बढ़ावा देने में लगा चालबाज चीन

वैश्विक आतंकवाद पर कब साफ होगी नीति और नीयत
प्रभुनाथ शुक्ल - 2019-03-15 10:39 UTC
वैश्विक आतंकवाद पर दुनिया कितनी संजीदा है इसका अंदाजा संयुक्त राष्ट सुरक्षा परिषद में चीन की चालों से चल गया है। परिषद के स्थायी स्दस्य देशों अमेरिका, ब्रिेटेन, फ्रांस और रसिया को ठंेगा दिखाते हुए चालबाज चीन ने यह बता दिया कि ग्लोबल आतंकवाद पर दुनिया के आंसू सिर्फ घड़ियाली हैं, जमींनी हकीकत दूसरी है। चीन चैथी बार वीटो का इस्तेमाल करते हुए भारत की कूटनीति पर पानी फेर दिया। भारत और उसका मित्र राष्ट अमेरिका चाह कर भी पाकिस्तानी आतंकी एंव जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक अजहर मसूद को अंतरराष्टीय आतंकवादी घोषित कराने में नाकामयाब रहे। हालांकि भारत चीन की फितरत से पूर्व परिचित था। आतंकी मसूद पर सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पास हो जाता तो उसकी मुश्किलें बढ़ जाती। वह किसी देश की यात्रा नहीं कर पाता। हथियार नहीं खरीद सकता था। उसकी संपत्तियां जब्त हो जाती। पुलवामा हमले के बाद भारत को पूरा भरोसा था कि वह अपनी कूटनीति के जरिए दुनिया के देशों को वैश्विक आतंकवाद की भयावहता समझाने में कामयाब होगा और मसूद को अंतर राष्टीय आतंकी घोषित करवा पाएगा, चालाबाज चीन खुद मसूद से डर गया और चैथी बार इस पर तकनीकी अडंगा लगा दिया। जबकि पूरी दुनिया इस्लामिक आतंकवाद से त्रस्त है। जिसमें परिषद से जुड़े सभी स्थाई और अस्थाई देश शामिल हैं।

कांग्रेस से मायावती क्यों डरती है?

अपने राजनैतिक अंत की ओर बढ़ रही हैं बसपा सुप्रीमो
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-03-14 07:51 UTC
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सपा-बसपा गठबंधन का हिस्सा नहीं है, क्योंकि मायावती नहीं चाहती थीं कि कांग्रेस उनके गठबंधन के साथ आए। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने साथ कांग्रेस को भी रखना चाहते थे और इसके लिए त्याग करने को भी तैयार थे। त्याग से उनका मतलब समाजवादी पार्टी का कम सीटों पर लड़ने से था। वैसे उन्होंने त्याग तो मायावती की बसपा के साथ गठबंधन करके भी किया। समाजवादी पार्टी बसपा से बड़ी पार्टी है। चुनाव में उसे बसपा से ज्यादा वोट भी मिले हैं और ज्यादा सीटें भी। लोकसभा चुनाव में बसपा का एक उम्मीदवार भी नहीं जीत पाया था, जबकि समाजवादी पार्टी के पांच उम्मीदवार जीत गए। उसके बाद दो उपचुनावों में भी सपा की जीत हुई। विधानसभा के आम चुनाव में बसपा के मात्र 19 विधायक विधानसभा मे आए, तो समाजवादी पार्टी 47 विधायक सदन के सदस्य बने।

2019 के चुनाव में कांग्रेस को सोनिया की जरूरत

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा के सेवानिवृत होने का यह सही समय नहीं
कल्याणी शंकर - 2019-03-13 19:40 UTC
अपना छठा लोकसभा चुनाव जीतने के लिए पूरी तरह तैयार, 72 वर्षीय कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांधी के एक बार फिर चुनाव लड़ने पर चल रही अटकलबाजी से समाप्त हो गई है। पिछले एक साल से अफवाहें चल रही थीं कि सोनिया गांधी अपनी अस्वस्थता के कारण सक्रिय राजनीति से हट गई हैं और अपना चार्ज अपने बेटे को पूरी तरह दे चुकी हैं। यह भी कहा जा रहा था कि अपने बेटे राहुल को तो उन्होंने अध्यक्ष पद दे ही दिया है और अब उनकी बेटी प्रियंका गांधी भी सक्रिय राजनीति मंे आ गइ्र हैं, तो फिर अब सोनिया राजनीति को अलविदा कह देंगी।

घोषित हुई चुनाव की तारीखें

पर विपक्षी एकता अभी भी दूर की कौड़ी
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-03-12 10:00 UTC
निर्वाचन आयोग ने चुनाव की तारीखें घोषित कर दी हैं और चुनाव में भाजपा को पराजित कर सत्ता से बाहर करने के लिए ताल ठोकने वाले विपक्षी पार्टियों के नेता अभी भी सिर्फ ताल ही ठोंक रहे हैं। इस बात को उनको अहसास बहुत पहले हो चुका है कि बिना विपक्षी एकता के नरेन्द्र मोदी और उनकी भाजपा को सत्ता से बाहर नहीं किया जा सकता, क्योंकि अभी भी देश में नरेन्द्र मोदी सबसे लोकप्रिय नेता हैं। यह सच है कि 2014 जैसी लोकप्रियता अब उनकी नहीं रही और उस चुनाव की सफलता को वे बहुत संभव है कि दुहरा भी नहीं पाएं, लेकिन यह भी सच है कि फिर से सरकार बनाने के लिए 2014 जैसी सफलता जरूरी भी नहीं है। यदि भाजपा को दो सौ सीटें आ गईं और उनके सहयोगी दलों को 40 सीटें भी आ गईं, तो सरकार बनाकर उसे स्थायित्व देने में नरेन्द्र मोदी को बहुत मशक्कत का सामना नहीं करना पड़ेगा।