आगम
सगुण ब्रह्म की उपासना पर बल देने वाले शास्त्रों को आगम कहा जाता है। आगम श्रुति को ही आधार मानकर व्याख्या करते हैं तथा स्वयं को श्रुति-सम्मत सिद्ध करते हैं।भारतीय आगम शास्त्रों की रचना का काल उपनिषदों की रचनाकाल के बाद का माना जाता है। विषयवस्तु की दृष्टि से आगम शास्त्रों में सृष्टि, प्रलय, देवों की अर्चना, पुरश्चरण, सर्वसाधन, षट्कर्मसाधन तथा ध्यानयोग जैसे विषयों पर लिखा गया है। अनेक लोग आगमों को वेदों से भिन्न मानते हैं परन्तु प्राचीन ग्रंथों में कुछ आगमों को वैदिक तथा कुछ को अवैदिक भी कहा गया। उदाहरण के लिए कूर्मपुराण, उत्तरभाग, अध्याय 38 को लिया जा सकता है। कूर्मपुराण में कपाल, लाकुल, वाम, भैरव, पूर्व, पश्चिम, पांचरात्र, पाशुपात आदि को अवैदिक कहा गया है। इसमें ऐसे स्थान भी हैं जहां पाशुपात तथा लाकुल को वैदिक तथा अवैदिक दोनों कहा गया है।
इस उपासना-पद्धति में जाति, वर्ग, लिंग आदि में भेद किये बिना सबको उपासना का अवसर मिलता है जबकि इसके पूर्व की उपासना पद्धतियों में कठोर नियम थे। वैदिक आचार इतने कठोर थे कि सबके लिए उनका निर्वाह करना संभव नहीं था इसलिए उन लोगों के लिए अनेक उपासना पद्धतियां वर्जित कर दी गयी थीं।
आगम शास्त्रों में भी तामस, राजस तथा सत्व के भेद है परन्तु इसके नियम अत्यन्त कठोर नहीं हैं। शाक्त आगम में तन्त्र, यामल और डामर आदि भेद किये गये परन्तु वेदों के अधिकारी निर्णय की कठोरता नहीं थी।
अधिकांशतः सगुण उपासना के लिए सभी अधिकारी हैं, परन्तु पवित्रता पर अवश्य बल दिया गया तथा कुछ अपवित्र स्थितियों में ऐसी उपसना की वर्जना भी की गयी। निगमों की तुलना में आगमों की उपासना पद्धति सरल है।
शैवागम या शाक्त आगम में कहा गया कि सात्विक तन्त्र के लिए, राजसिक यामल के लिए, तथा तामसिक डामर उपासना पद्धति के लिए अधिकारी है। शैव मतावलम्बियों में भी श्रौत तथा अश्रौत दो प्रकार हैं। शैवागमों में कुल 28 मूल तथा 207 उप आगमों का उल्लेख है।
वैष्णव आगम को पंचरात्र या पांचरात्र के नाम से भी जाना जाता है। यही श्रीमद्भागवत का सात्तत्व तन्त्र है। पंचरात्र संहिताएं और वैखानस सूत्र वैष्णवागम के दो भेद माने जाते हैं।