आचार
व्यक्ति जिस प्रकार का व्यवहार करता है वही उसका आचार कहलाता है।धर्म तथा आध्यात्म में आचार पर विशेष बल दिया गया है तथा अलग-अलग पंथों के लोगों के लिए अलग-अलग आचारों की बात कही जाती है। तंत्र में तो आचार साधक का क्रमिक विकास है जो वैदिकाचार से प्रारम्भ होकर स्वेच्छाचार तक पहुंचता है।
भारतीय दर्शन परम्परा में आचार कितने प्रकार के हैं इसपर विद्वानों में मतभेद हैं। कोई दो आचार बताते हैं तो कोई चार, छह, सात तथा आठ। ऐसा प्रतीत होता है कि संख्या में ये अन्तर एक ही आचार के भेद-प्रभेद के कारण हैं। इसी एक आचार को दो भागों में बांटकर दक्षिणाचार तथा वामाचार कहा गया है। इस प्रकार प्रवृत्तिमार्गी आचार (दक्षिणाचार) कहा जाता है जिसके उत्तरवर्ती निवृत्तिमार्गी तीन आचार होते हैं जिन्हें वामाचार की श्रेणी में रखा जाता है। वामा स्त्री को कहते हैं तथा इन साधनाओं में स्त्री की आवश्यकता होती है इसलिए इसका नाम वामाचार है। यह बाएं चलने वाला आचार नहीं है और न ही दक्षिणाचार दाएं चलने वाला आचार है।
तन्त्र शास्त्रों में कुलार्णव तन्त्र एवं ज्ञानदीप तन्त्र जैसे महत्वपूर्ण तन्त्र शास्त्रों में आचार सात प्रकार के बताये गये हैं। ये हैं - वैदिकाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, दक्षिणाचार, वामाचार, सिद्धान्ताचार तथा कौलाचार।
इन सातों आचारों से बड़ा एक स्वेच्छाचार भी है।
सच्चिदानन्द स्वामी रचित तन्त्ररहस्य में इन सातों आचारों - वैदिकाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, दक्षिणाचार, वामाचार, सिद्धान्ताचार तथा कौलाचार - का उल्लेख तो है ही, दो अन्य आचारों - अघोराचार तथा योगाचार की भी चर्चा की गयी है। परन्तु इन दोनों को तन्त्ररहस्य में वामाचार के बाद तथा सिद्धान्ताचार एवं कौलाचार के पहले की अवस्था माना गया है।
आचारों के वर्गीकरण में वैदिकाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, तथा दक्षिणाचार को पश्वाचार कहा जाता है। इसे पश्वाचार इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये पशु भाव वाले साधकों के लिए निर्धारित हैं।
वामाचार, सिद्धांताचार एवं कौलाचार, इन तीनों को वामाचार कहा जाता है।
जहां तक तन्त्र का सवाल है वैदिकाचार को सबसे नीचा तथा कौलाचार को सबसे ऊंचा माना जाता है। परन्तु तन्त्र से इतर ऐसा नहीं माना जाता। अलग-अलग मतों में ऊंच नीच के अपने-अपने मानदंड हैं तथा उनकी मान्यताएं भी अलग-अलग हैं।
कौलाचार तक पहुंचकर साधक पूर्ण ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है। उसके बाद वह स्वेच्छाचार का साधक हो जाता है। उसके पश्चात् वह साधक कुछ भी करे सबकुछ पवित्र माना जाता है। स्व इच्छा ही उसका आचार हो जाता है। यहां तक कि खान-पान तथा मैथुनादि के सम्बंध में भी वह स्वेच्छाचारी ही है। उसके लिए सभी वर्जनाएं, सभी विधि-विधान आदि कुछ नहीं हैं।
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