आत्मप्रत्यक्ष
आत्मप्रत्यक्ष दर्शनशास्त्र में आने वाली एक अवधारणा है।इसके अनुसार साधक साधना के क्रम में अपरिमित आत्मतत्व का प्रत्यक्षीकरण करता है। यह प्रत्यक्षीकरण इन्द्रियों द्वारा किये जाने वाले परिमित के प्रत्यक्षीकरण से भिन्न होता है।
आत्मा सच्चिदानंद स्वरूप है। सत्, चित् तथा आनन्द इसके गुण हैं। यह अनादि और अनन्त है। यह क्षेत्र तथा काल की परिधि से परे है। साधक इस 'स्व' रूप के जितना निकट पहुंचता है उतना ही अधिक चैतन्य और आनन्द में रहता है। उसे इससे जो सुख मिलता है वह इन्द्रियों से मिलने वाले सुख से अलग होता है।
आत्मप्रत्यक्षीकरण की उच्च अवस्था में आत्मा के वृहत् स्वरूप का प्रत्यक्षीकरण होता है। इसी को ब्रह्मानंद के नाम से जाना जाता है। इस आनन्द रस का आस्वादन न तो इन्द्रियों में होता है और न ही इन्द्रियों से होता है।
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