छायावाद
छायावाद हिन्दी कविता की वह शैली है जिसमें सूक्ष्म मानवतावादी आदर्शवाद की छाया कविता के साथ-साथ चलती है। सामान्य अर्थ में यह प्रस्तुत के स्थान पर उसकी अभिव्यंजना करने वाली छाया के रूप में अप्रस्तुत का कथन है। यह अभिव्यंजनावाद पूर्व प्रचलित काव्यशैली का विद्रोह है, जो सांसारिक जीवन से विद्रोह करने वाले रहस्यवाद तथा सामाजिक रूढ़ियों से विद्रोह करने वाले स्वच्छन्दतावाद से भिन्न है, परन्तु साथ ही विषयवस्तु में कविता के वाह्यस्वरूप में भी विशेष शब्दविन्यास के रूप प्रकट होती है, जिसके कारण नवीन सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति संभव हो पाती है। इसकी प्रकृति प्रतिक्रियात्मक विद्रोह नहीं बल्कि रचनात्मक है। यह स्थूल लौकिकता और जड़ता में अन्तर्निहित सूक्ष्म चेतना की अभिव्यक्ति की शैली है।छायावाद की सात प्रमुख विशेषताएं हैं जो स्वच्छन्दतावाद से आयी प्रतीत होती हैं। ये हैं - आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति; कल्पना की अतिशयता; सौन्दर्य.के प्रति अधिक आकर्षण; विस्मय की भावना; सर्वचेतनावाद अर्थात् एक ही सूक्ष्म चेतना का सर्वत्र दर्शन; सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, और साहित्यिक बंधनों और रूढ़ियों से विद्रोह; तथा उन्मुक्त लौकिक अथवा अलौकिक प्रेम की प्रवृत्ति। अन्य प्रवृत्तियां हैं - भारतीय दर्शनिक तथा आध्यात्मिक चिन्तन की विभिन्न परम्पराओं की अभिव्यक्ति, आधुनिक भारतीय सांस्कृतिक नवजागरण की अभिव्यक्ति, तथा राष्ट्रीयता की भावना।
रामचन्द्र शुक्ल ने छायावाद के नामकरण पर कहा था कि पुराने ईसाई सन्तों के छायाभास (phantasmata) तथा यूरोपीय काव्यक्षेत्र में प्रवर्तित आध्यात्मिक प्रतीकवाद (symbolism) के अनुकरण पर रची जाने के कारण बंगाल में ऐसी कविताएं छायावाद कही जने लगी थी, और इस तरह यह शब्द हिन्दी में ऐसी कविताओं के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। परन्तु हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस बात का खंडन करते हुए कहा कि बंगला में छायावाद नाम कभी चला ही नहीं। चाहे जो हो, 1920 आते-आते हिन्दी में छायावाद शब्द प्रचलित हो गया था। 'श्री शारदा' में मुकुटधर पांडेय के एक लेख उसी साल चार अंकों में छपा था जिसका शीर्षक था - 'हिन्दी में छायावाद'। परन्तु उस समय छायावाद का अर्थ वह नहीं था जो आज है। अंग्रेजी में रहस्यवाद (mysticism) के समानार्थी ही छायावाद शब्द का प्रयोग हुआ था। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1927 में इस अर्थ से भिन्न अर्थ लिया और सरस्वती नामक पत्रिका में एक लेख लिखा जिसका आशय था कि यदि किसी कविता के भावों की छाया कहीं अन्यत्र जाकर पड़े तो उसे छायावादी कविता कहना चाहिए। वह हिन्दी के छायावाद के बंगला के रहस्यवाद का अनुकरण या छायानुवाद मानते थे। उस जमाने के अधिकांश विद्वान छायावाद और रहस्यवाद को एक ही मानते थे। बाद में छायावाद के रहस्यवाद से भिन्न रोमांटिसिज्म माना जाने लगा। अनेक लोग इसे स्वच्छन्दतावाद भी मानने लगे थे परन्तु रामचन्द्र शुक्ल ने इसे स्वच्छन्दतावाद से भिन्न बताया। उनके छायावाद में रहस्यवाद का सीमित अर्थ तथा प्रतीकवाद का व्यापक अर्थ समाहित था। लेकिन विश्वनाथ प्रसास मिश्र ने इसे रहस्यवाद तथा स्वच्छन्दतावाद से भिन्न एक विशेष नयी अभिव्यंजना शैली माना। चूंकि अभिव्यंजना या प्रतीक शैली एवं विषयवस्तु को अलग नहीं किया जा सकता इसलिए स्वाभाविक रूप से इसका असर कविता के वाह्य स्वरूप पर भी हड़ता ही है, और इसी आधार पर जयशंकर प्रसाद ने कहा कि जब वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्त होने लगी तब हिन्दी में उसे छायावाद नाम से अभिहित किया गया। इसमें वाह्य स्वरूप से अधिक प्रधानता सूक्ष्म आन्तरिक भावों की थी। उनके कथन के अनुसार छायावाद की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं - स्वानुभूति की विवृति या आत्मव्यंजकता, सौन्दर्यप्रेम तथा अभिव्यक्ति की भंगिमा या सांकेतिकता।
नगेन्द्र ने कहा था कि छायावाद स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का विद्रोह है। नन्द दुलारे वाजपेयी ने कहा कि नयी छायावादी काव्यधारा का भी एक आध्यात्मिक पक्ष है, किन्तु उसकी मुख्य प्रेरणा धार्मिक न होकर मानवीय और सांस्कृतिक है।... छायावाद मानव जीवन सौंदर्य और प्रकृति को आत्मा का अभिन्न स्वरूप मानता है।
हिन्दी कविता की यह धारा 1918 ई के आसपास की काव्य प्रवृत्तियों के विद्रोह के रूप में निकली। उस समय द्विवेदी युग था तथा कविताओं में रीतिकालीन नीरसता, उपदेशात्मकता, इतिवृत्तात्मकता तथा स्थूल आदर्शवाद हुआ करते थे। प्रारम्भ में छायावादी कविताएं अंग्रेजी के रोमांटिक कवियों तथा बंगला के रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं के ढंग की हुआ करती थीं।
छायावाद का काल 1918 से 1942 तक माना जाता है। यह प्रथम विश्व युद्ध से दूसरे विश्व युद्ध के बीच की एक विशेष काव्य शैली है। 1930 से पहले के पूर्वार्ध तथा उसके बाद उत्तरार्ध के काल की कविताओं की अलग-अलग विशिष्टताएं हैं इसलिए इसकी दो धाराएं मानी जाती हैं।
पहले दौर में छायावाद विकासोन्मुख था और उसमें वैयक्तिक स्वतंत्रता के भाव का प्रभुत्व था। वह आदर्श का स्वप्नलोक था। परन्तु दूसरे दौर में यह स्वप्नलोक बिखर गया और दो धाराएं निकलीं। पहली धारा सामाजिकता की थी और दूसरी वैयक्तिकता की। पहली धारा के प्रमुख कवि थे सुमित्रानंदन पंत, दिनकर, निराला, केदारनाथ अग्रवाल आदि। दूसरी धारा के प्रमुख कवि थे बच्चन, नरेन्द्र शर्मा, अंचल, भगवती चरण वर्मा आदि।
दूसरे दौर में छायावाद का पतन हो गया। नितान्त व्यक्तिवादी और असामाजिक प्रवृत्तियां छायावादी रचनाओं में घुस गयीं। इस संक्रमणकाल में प्रगतिवाद और प्रयोगवाद धीरे-धीरे सामने आने लगा, परन्तु मूल-भावना और शैली छायावादी रहने के कारण वैसी कविताओं को बहुधा छायावादी की श्रेणी में ही रखा जाता है।