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लोकगाथागीत

लोकगाथागीत

लोकगाथागीत वह लोक प्रिय रोचक गीत है जिसमें किसी प्रचीन या अर्वाचीन आख्यान को गाया जाता है। इसमें कहानियों को गीत के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।
इसकी मौखिक परम्पराएं होती हैं। यह अलग बात है कि इन गीतों को लिपिबद्ध भी किया जाता है। इसमें कथा तथा गेयता दोनों प्रमुख होते हैं।
डा. बलदेव उपाध्याय ने इनको तीन वर्गों में बांटा है - प्रेम कथात्मक, वीर कथात्मक तथा रोमांचक कथात्मक।
प्रो गूमर ने इन्हें छह वर्गों में बांटा है - प्राचीनतम, कौटुंबिक, शोकपूर्ण एवं अलौकिक, पौराणिक, सीमांत, तथा आरण्यक।
अनेक पश्चिमी विद्वान इसके चार वर्ग मानते हैं - परंपरानुगत, चारण द्वारा प्रस्तुत, प्रकाशित, तथा साहित्यिक।
कुछ अन्य इसके छह भेद करते हैं - वीर कथात्मक, भक्ति कथात्मक, पौराणिक कथात्मक, प्रेम कथात्मक, अतिमानवीय कथात्मक, तथा सिद्ध संतों की परंपरात्मक लोकगाथाएं।

भारत में तीन प्रकार की लोकगाथागीत प्रचलन में हैं। कुछ पौराणिक आख्यानों पर आधारित हैं, कुछ ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हैं तथा कुछ संदिग्ध पौराणिकता या ऐतिहासिकता वाले हैं।

इतिहास
लोकगाथागीत संभवतः अत्यन्त प्राचीन काल से गाये जाते हैं। ऋग्वेद काल से भी पूर्व से इनका गायन होता रहा है जिसका उल्लेख स्वयं ऋग्वेद में है। ऐतरेय ब्राह्मण में तो ऋक् तथा गाथा शब्दों में अन्तर तक बताया गया और कहा गया कि ऋक् दैवी हैं तथा गाथाएं मनुष्य के उपयोग के फल।
प्राचीन काल में राजाओं या ऋषियों के गुणों का वर्णन करने वाले गीतों को गाथा कहा गया, जो प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में भी मिलती हैं। संस्कृत से यह पालि में, फिर प्राकृत में, और उसके बाद अन्य भाषाओं में गयी।

संसार भर की सभी भाषाओं और बोलियों में सम्भवतः लोकगाथागीत की परम्पराएं रही हैं। ये अंग्रजी में बैलेड नाम से प्रसिद्ध है।

परम्परा में ये लोकगाथागीत अब भी उपलब्ध हैं परन्तु धीरे-धीरे इनका गायन करने वाले लोगों की संख्या घटती जा रही है। कई भाषाओं और बोलियों में शायद इनके गाने वाले लोग भी न बचे हों।

भारत में तो कुछ जातियां या समुदाय पारम्परिक रुप से इसका गायन करते हैं - जैसे बसदेवा, देवार, परधान, पारधी, भिम्मा, भोपानायक, चारण आदि।

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