Loading...
 
Skip to main content

View Articles

प्रधानमंत्री का मेक इन इंडिया कार्यक्रम हो रहा है बाधित

पिछले 5 सालों में बहुत कम प्रगति
नंतू बनर्जी - 2020-12-22 10:18 UTC
भारत का आर्थिक विकास लक्ष्य एक नई चुनौती का सामना करता है। विनिर्माण क्षेत्र नहीं बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में विनिर्माण क्षेत्र में कोई नया बड़ा निवेश नहीं हुआ है। न ही विनिर्माण गतिविधियों का विस्तार करने के लिए मौजूदा कंपनियों और व्यावसायिक घरानों से नई पहल के संकेत हैं। यहां तक कि इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) धीमा हो गया है। हाल ही में, भारत के पांचवें सबसे बड़े यात्री वाहन निर्माता होंडा कार्स ने चुनौतीपूर्ण व्यावसायिक परिदृश्य से प्रभावित होकर उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में अपनी विनिर्माण इकाई बंद कर दी थी। प्रधान मंत्री का पसंदीदा ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम काम नहीं कर पा रहा है।

कांग्रेस की इस रात की सुबह नहीं

भारत की सबसे पुरानी पार्टी की दुर्दशा के पीछे राहुल ही हैं
उपेन्द्र प्रसाद - 2020-12-21 09:38 UTC
प्रत्येक बीतते दिन के साथ कांग्रेस का पतन होता जा रहा है और भारत की इस सबसे पुरानी पार्टी लावारिस और लाचार दिख रही है। उसके सामने उम्मीद की कोई किरण नहीं दिख रही है। यह खुद तो गर्त में जा ही रही है और अब तो अपने सहयोगियों को भी अपने साथ लेकर डूब जाती है। पिछले महीने हुए बिहार के चुनाव में वैसा ही हुआ। इसके खराब प्रदर्शन के कारण राष्ट्रीय जनता दल के हाथों में आ रही सत्ता फिसल गई। उस गठबंधन में राजद, कांग्रेस और वामदल थे। राजद के 50 फीसदी से ज्यादा उम्मीदवार जीत गए। वामदलों के भी 50 फीसदी से ज्यादा उम्मीदवार जीत गए, लेकिन कांग्रेस के कुल 70 में से मात्र 19 उम्मीदवार ही जीत पाए और गठबंधन को बहुमत से मात्र 12 सीटें कम पड़ गईं। 12 क्या, कांग्रेस ने यदि 6 और सीटें जीत ली होतीं, तो राजद की सरकार वहां बन जाती, क्योंकि तब एमआईएम के 5 और बीएसपी के एक विधायक गठबंधन को समर्थन देकर बहुमत का आंकड़ा पार कर लेते।

कॉर्पोरेट-हिन्दुत्व विमर्श के खिलाफ किसानों का आंदोलन

यह नई बन रही व्यवस्था के खिलाफ उठा विरोध है
प्रभात पटनायक - 2020-12-19 10:10 UTC
किसान आंदोलन सिर्फ एमएसपी या कृषि के निगमकरण के खिलाफ लड़ाई से अधिक है। यह एक ऐसे विमर्श के खिलाफ है जो नव-उदारवाद के तहत प्रचारित झूठी कथा का खंडन करता है। आने वाले दिनों में मोदी सरकार इस आंदोलन को तोड़ने की तेज कोशिश करेगी, लेकिन उसके साथ ही यह और तेज होती जाएगा। ‘राष्ट’ के बारे में विमर्शं का हवाला देकर मैं अपनी बात को स्पष्ट करता हूं।

पहले भी जनभावना को देखते हुए सरकार को झुकना पड़ा है

किसान आंदोलन के सामने भी मोदी को झुक जाना चाहिए
एल. एस. हरदेनिया - 2020-12-18 10:21 UTC
आजादी के बाद दो महाआंदोलन हुए, जिनके सामने तत्कालीन केंद्रीय सरकारों को झुकना पड़ा। इनमें से पहला आंदोलन 1956-57 में हुआ था और दूसरा 1965 में। पहले आंदोलन का संबंध महाराष्ट्र राज्य के निर्माण से था। आंध्र में भाषा आधारित राज्य के निर्माण की मांग को लेकर एक सामाजिक कार्यकर्ता ने आमरण अनशन प्रारंभ किया था। उनका नाम पोटटू रामुलू था। अनशन के दौरान उनकी मृत्यु हो गई जिससे बहुत हंगामा खड़ा हो गया। जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया। इस आयोग को यह जिम्मेदारी दी गई कि वह ऐसा फार्मूला बनाए जिसके आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया जाए। आयोग ने सिफारिश की कि राज्यों का निर्माण का आधार भाषा हो। तदनुसार अनेक राज्यों का गठन किया गया। परंतु मराठी और गुजराती भाषाओं के आधार पर राज्य नहीं बनाए गए।

वैक्सिन आ रहा है, कोविड जा रहा है

यदि हर्ड इम्युनिटी बन रही है, तो फिर वैक्सिन क्यों?
उपेन्द्र प्रसाद - 2020-12-17 11:03 UTC
अमेरिका और यूरोप कोरोना के कहर का सामना कर रहा है, तो भारत में कोरोना का बुखार लगातार उतरता जा रहा है। यूरोपीय देशों और अमेरिकी महादेशों के संयुक्त राज्य अमेरिका में मौसम ठंढा होने के साथ जब कोरोना के मामले बढ़ रहे थे, तब भारत को भी यह सोच कर कंपकंपी लग रही थी कि कहीं दिसंबर और जनवरी की शीतलहरी में यहां भी करोना की दूसरी लहर न आ जाय। प्रथम लहर में प्रतिदिन कोरोना के मामले 98 हजार के आसपास पहुंच गए थे। फिर नये मामले में गिरावट भी आ रही थी, लेकिन उस गिरावट से न तो यहां के लोगों को और न ही नीति निर्माताओं को सुकून मिल रहा था, क्योंकि शरद ऋतु का डर सता रहा था। लेकिन यह डर भी गलत साबित होता दिख रहा है।

लव जिहाद के नाम पर बने कानून के खिलाफ संघर्ष करेगा विपक्ष

अल्पसंख्यकों का प्रताड़ित करने के लिए कृतसंकल्प दिखते हैं योगी
प्रदीप कपूर - 2020-12-16 10:25 UTC
लखनऊः उत्तर प्रदेश में विपक्षी दल योगी सरकार द्वारा लव जिहाद के नाम पर राज्य में लोगों के उत्पीड़न का विरोध कर रहे हैं।

बीटीसी चुनावों में भाजपा की बढ़त

असम में कांग्रेस का फिर से उभरना कठिन
सागरनील सिन्हा - 2020-12-15 10:18 UTC
बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) चुनाव को आगामी असम चुनावों से पहले एक सेमीफाइनल कहा जा रहा था। असम विधानसभा के चुनावों के अब पांच महीने भी नहीं रह गए हैं। इस क्षेत्र में बीटीसी की 46 सीटें हैं, जिनमें 40 को चुनाव से और 6 को राज्यपाल के मनोनयन से भरा जाता है। वहीं इस इलाके में 12 विधानसभा सीटें हैं। वर्तमान में, ये सभी विधानसभा सीटें बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के पास हैं। उसने एनडीए के सदस्य के रूप में पिछला चुनाव लड़ा था और वर्तमान में मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व वाली असम की एनडीए सरकार में भी यह भागीदार है।

मध्यप्रदेश में स्थानीय निकायों के चुनावों की सरगर्मी शुरू

भाजपा की प्रदेश कमिटी के गठन में शिवराज सिंह चौहान और सिंधिया में ठनी
एल एस हरदेनिया - 2020-12-14 10:05 UTC
भोपालः 28 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों के नतीजों के ऐलान के एक महीने बाद ही राज्य फिर से चुनावी मोड में जाने लगा है। इस बार स्थानीय निकायों विशेषकर नगर निगमों के चुनाव की बारी है। मेयर के पदों के लिए आरक्षण की प्रक्रिया शुरू होते ही इन पदो ंके लिए लॉबिंग भी शुरू हो गई है।

किसानों और मजदूरों का संयुक्त संघर्ष ही सरकार पर असर डाल सकता है

क्षेत्रीय दलों का सहयोग सफलता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है
प्रकाश कारत - 2020-12-12 11:07 UTC
8 दिसंबर को किसान संगठनों द्वारा बुलाए गए भारत बंद की बड़ी सफलता किसानों के समर्थन के लिए लोगों के समर्थन और सहानुभूति का प्रदर्शन था।

सरकार स्वामीनाथन समिति की सिफारिशें लागू करे

न्यूनतम समर्थन मूल्य को विस्तारित किया जाये
नंतू बनर्जी - 2020-12-11 08:59 UTC
लगता है सरकार ने किसानों का भरोसा खो दिया है। कृषि उपज की ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ प्रणाली के तहत कृषि उत्पादों की सूची का विस्तार करने के अपने वादे को निभाने के बजाय, नए कृषि कानूनों ने उस प्रथा को खत्म करने की समस्या पैदा कर दी है। उसके कारण ही आज चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खाद्य उत्पादक भारत है। 2018 के कर्नाटक विधान सभा चुनाव से पहले, प्रधान मंत्री ने मूल्य समर्थन के लिए तीन और कृषि उत्पादों को टॉप कहकर उस सूची में सूचीबद्ध किया। टीओपी से उनका तात्पर्य टमाटर, प्याज और आलू से है, जो साल-दर-साल उनके उत्पादकों द्वारा कम कीमत पर बेच दिए जाते हैं, जबकि उनके बाजार की कीमतें ऑफ सीजन में कई हजार फीसदी ज्यादा हो जाती है और व्यापारियों द्वारा भारी मुनाफाखोरी होती है।