ओ गंगा तुम बहती हो क्यों!
2017-08-22 16:27 -विस्तार है अपार, प्रजा दोनो पार
करे हाहाकार, निरूशब्द सदा
ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई
निर्लज्ज भाव से, बहती हो क्यों ?
ओ गंगा तुम..गंगा बहती हो क्यों !
करे हाहाकार, निरूशब्द सदा
ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई
निर्लज्ज भाव से, बहती हो क्यों ?
ओ गंगा तुम..गंगा बहती हो क्यों !