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कश्मीर में राज्यपाल शासन

सत्ता सबको चाहिए, लोकतंत्र किसी को नहीं
अनिल जैन - 2018-11-29 10:41 UTC
अब इस हकीकत से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कश्मीर का मसला अपनी विकृति की चरम अवस्था में पहुंच गया है। मौजूदा सरकार, शासक दल और राज्यपाल के साथ ही सूबे की राजनीति को प्रभावित करने वाले तमाम राजनीतिक दलों के तेवरों को देखते हुए इस स्थिति का कोई तुरत-फुरत हल दिखाई नहीं देता। केंद्र सरकार ने पिछले साढे चार वर्षों के दौरान कश्मीर को लेकर जितने भी प्रयोग किए है, उससे तो मसला सुलझने के बजाय इतना ज्यादा उलझ गया है कि कश्मीर अब देश के लिए समस्या नहीं रहा बल्कि एक गंभीर प्रश्न बन गया है। वैसे यह प्रश्न बीज रूप में तो हमेशा ही मौजूद रहा लेकिन इसे विकसित करने का श्रेय उन नीतियों और फैसलों को है, जो अंध राष्ट्रवाद और संकुचित लोकतंत्र की देन हैं। इस सिलसिले में केंद्र में अलग-अलग समय पर रहीं अलग-अलग रंग की सरकारें ही नहीं, बल्कि सूबाई सरकारें भी बराबर की जिम्मेदार रही हैं।

उत्तर प्रदेश में विभाजित आरक्षण कार्ड

क्या हो पाएगा भाजपा को लाभ?
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-11-28 13:48 UTC
पिछले तीन दशकों से आरक्षण भारतीय राजनीति का सबसे ज्वलंत मुद्दा रहा है। इसके कारण अनेक सरकारें गिरी हैं और अनेक सरकारें गिरी हैं। राजनैतिक दल इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करते रहे हैं और उनको फायदा होता भी रहा है। उत्तर प्रदेश में यह आने वाले समय में एक बार फिर राजनीति को प्रभावित करने वाला सबसे प्रमुख मसला बनने वाला है। भले लोग कहें कि राम मंदिर सबसे बड़ा मसला होगा और भारतीय जनता पार्टी इसी मसले की राजनीति करके फिर से सत्ता हासिल करना चाहेगी, लेकिन अतीत में यह साबित हो चुका है कि राममंदिर एक स्तर तक ही भाजपा को फायदा पहुंचा पाती है और वह स्तर उसे सत्ता में नहीं पहुंचा पाता। इसलिए मंदिर के अलावा जो अन्य प्रमुख मसला उसके सामने है वह है आरक्षण।

मध्य प्रदेश चुनाव में क्षेत्रीय दलों की भी है भूमिका

योगेश कुमार गोयल - 2018-11-27 10:14 UTC
देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें सर्वाधिक महत्व मध्य प्रदेश का माना जा रहा है क्योंकि इन पांच राज्यों में सर्वाधिक 230 विधानसभा सीटें और सबसे ज्यादा 29 लोकसभा सीटें इसी राज्य में हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में पांच करोड़ मतदाता 2907 प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला करेंगे, जिनमें 1102 निर्दलीय उम्मीदवार शामिल हैं।

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावः क्या नारे से होंगे वारे-न्यारे

राजु कुमार - 2018-11-26 16:06 UTC
चुनावों में प्रचार का सबसे बड़ा महत्व है। सबसे ज्यादा खर्च प्रचार पर ही होता है, चाहे वह खर्च पार्टी करे या फिर प्रत्याशी। प्रचार के जो कंटेट होते हैं, वह चुनावोें में बहुत कारगर होते हैं। इसमें सबसे बड़ी भूमिका नारों या स्लोगन की होती है। मध्यप्रदेश में भाजपा का नारा ‘‘माफ करे महाराज, हमारे नेता शिवराज’’ और कांग्रेस का नारा ‘‘कांग्रेस के साथ - वक्त है बदलाव का’’ में से ज्यादा कारगर कौन होता है, इसका फैसला 11 दिसंबर को होगा। आम आदमी पार्टी ‘‘बदलेंगे मध्यप्रदेश’’ और ‘‘भ्रष्ट भाजपा - भ्रष्ट कांग्रेस, आओ बदलें मध्यप्रदेश’’ के साथ जनता के बीच गई है।

अंडमान में अमेरिकी नागरिक की हत्याः आखिर चूक कैसे हुई ?

उपेन्द्र प्रसाद - 2018-11-26 09:45 UTC
अमेरिकन नागरिक जाॅन एलन चाउ अंडमान निकोबार की एक टापू पर मारा गया। सच कहा जाय, तो उसकी हत्या नहीं हुई, बल्कि उसने आत्महत्या कर ली। उसे पूरी तरह से पता था कि जो कुछ वह करने जा रहा है, उसका अंजाम उसकी मौत भी हो सकती है। उसने अपने परिवार वालों को यह संदेश भी छोड़ दिया था कि यदि वह वहां से वापस नहीं लौटता है और मारा जाता है, तो इसके लिए वे उस टापू के लोगों यानी उसके हत्यारों को जिम्मेदार न समझें और उन्हें माफ कर दें।

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में मां और मामा बन रहे हैं मुद्दे

कांग्रेसी चक्रव्यूह को तोड़ने की भाजपाई कोशिश
राजु कुमार - 2018-11-24 12:18 UTC
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार कांग्रेस शुरुआत से ही भाजपा पर भारी पड़ रही है। बीच में ऐसा लगने लगा था कि भाजपा की रणनीति के आगे कांग्रेस पिछड़ रही है, लेकिन भाजपा जिस तरीके से इमोेशनल कार्ड खेलने लगी है, उससे लगता है कि वह कांग्रेसी चक्रव्यूह को भेद नहीं पाई है। यद्यपि यह कहना मुश्किल है कि किसकी रणनीति कारगर साबित होगी और किसकी सरकार बनेगी, लेकिन चुनाव के आखिरी दिनों में मां और मामा मुद्दे बनने लगे हैं।

अयोध्या विवाद पर तनातनी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार क्यों नहीं कर लेते?
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-11-24 11:31 UTC
उधर मामला सुप्रीम कोर्ट में लटका हुआ है और इधर अयोध्या में अभूतपूर्व स्थिति बन गई है। मंदिरवादी अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने को भी तैयार नहीं और वे किसी भी सूरत में मंदिर के निर्माण का काम शुरू करने पर उतावला हो रहे हैं। इसमें सबसे गंभीर बात तो यह है कि मंदिर निर्माण की धमकियों के बीच न तो केन्द्र की मोदी सरकार और न ही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की ओर से कुछ भी कहा जा रहा है, हालांकि विवादित स्थल की सुरक्षा के लिए वहां पुलिस की भारी पैमाने पर तैनाती की जा रही है। पर सवाल यह है कि पुलिस वहां क्या कर लेगी? फैसला तो सरकार के राजनैतिक नेतृत्व यानी नरेन्द्र मोदी को करना है और वे क्या करेंगे, इसके बारे में वे किसी प्रकार का संकेत नहीं दे रहे हैं।

गठबंधन न करने के लिए सपा और बसपा का कांग्रेस पर हमला

सत्ता विरोधी लहर से भाजपा मुश्किल में
एल एस हरदेनिया - 2018-11-23 11:00 UTC
भोपालः कांग्रेस को तीन-तरफा हमले का सामना करना पड़ रहा है। बीजेपी के अलावा, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने भी कांग्रेस की कड़ी आलोचना की है। दोनों पक्षों ने कांग्रेस पर राज्य के 15 साल के भगवा शासन को समाप्त करने के लिए भाजपा विरोधी मतदाताओं को एकजुट होने से रोकने का आरोप लगाया है।
मध्यप्रदेश विधान सभा चुनाव

माइक्रो मैनेजमेंट और इमोशन पर जोर दे रही कांग्रेस और भाजपा

आप, बसपा, सपा किंगमेकर बनने की राह पर
राजु कुमार - 2018-11-22 16:10 UTC
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में महज चंद दिन रह गए हैं। मध्यप्रदेश में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में ही है, लेकिन बसपा, सपा और आम आदमी पार्टी को भी उम्मीद है कि इस बार विधानसभा में उनकी उपस्थिति होगी। राजस्थान की तरह मध्यप्रदेश को लेकर कोई स्पष्ट कहने को तैयार नहीं है कि अगली सरकार किसकी होगी? मध्यप्रदेश में कई सारे फैक्टर एक साथ काम कर रहे हैं, जिसकी वजह से अंदाजा लगाना मुश्किल है कि जनता का रूख क्या होगा? पिछले तीन विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत को लेकर बहुत कम संशय रहा है। सीटों की संख्या को लेकर ही अटकलें लगती रही थीं। लेकिन 2018 की परिस्थितियां पहले की तरह नहीं है। कांग्रेस आश्वस्त है कि इस बार जनता उसे ही सत्ता सौंपेगी, तो दूसरी ओर भाजपा को अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे पर भरोसा है।

सभी धर्मों में सम्माननीय हैं गुरू नानक

योगेश कुमार गोयल - 2018-11-22 10:22 UTC
गुरू नानक जयंती प्रतिवर्ष कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है लेकिन यह कारण अभी तक ज्ञात नहीं है कि उनकी जयंती किसी एक निर्धारित तिथि को न मनाकर कार्तिक मास की पूर्णिमा को ही क्यों मनाई जाती है? सिख धर्म के आदि संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म तलवंडी (जो भारत-पाक बंटवारे के समय पाकिस्तान में चला गया) में सन् 1469 में हुआ था। गुरू नानक देव सिखों के पहले गुरू हुए हैं और वे न केवल सिखों में बल्कि अन्य धर्मों के लोगों में भी उतने ही सम्माननीय रहे हैं।