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रक्षाबंधन महज कलाई पर एक धागा बांधने की रस्म नहीं

स्नेह की डोर में बंधा प्यारा रिश्ता
योगेश कुमार गोयल - 2018-08-24 11:44 UTC
श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले रक्षाबंधन पर्व की भारतीय समाज और संस्कृति में कितनी महत्ता है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बहनों के हाथ अपने भाईयों की कलाईयों पर राखियां बांधने के लिए मचल उठते हैं और कलाई पर बांधे जाने वाले मामूली से दिखने पड़ने वाले इन्हीं कच्चे धागों से पक्के रिश्ते बनते हैं। पवित्रता तथा स्नेह का सूचक यह पर्व भाई-बहन को पवित्र स्नेह के बंधन में बांधने का पवित्र एवं यादगार दिवस है। इस पर्व को भारत के कई हिस्सों में श्रावणी के नाम से जाना जाता है। पश्चिम बंगाल में ‘गुरू महापूर्णिमा’, दक्षिण भारत में ‘नारियल पूर्णिमा’ तथा नेपाल में इसे ‘जनेऊ पूर्णिमा’ के नाम से जाना जाता है।

लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव की प्रासंगिकता

इसका कोई औचित्य नहीं
डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2018-08-23 11:24 UTC
देश के बदलते राजनीतिक हालात में जहां देशभर में राजनीतिक छोटे दलों की बहुतायत है, जहां आज भी आया राम गया राम की राजनीतिक प्रक्रिया हावी है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता बने रहने की संभावनाएं सदैव बनी रहती है, लोकसभा के साथ विधान सभा के चुनाव कराने का कोई औचित्य ही नहीं बनता। इस तथ्य को प्रायः सभी जानते है। देश में आज आम चुनाव कराना कितना कठिन हो गया जहां विधानसभा के चुनावों में प्रशासनिक व्यवस्था के चलते पूरे माह का समय लग जाता है। इस तरह के हालात भी देशभर में लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने के सकरात्मक परिवेश नहीं उभार सकते फिर सत्ता पक्ष की ओर से एक देश एक चुनाव के तहत लोकसभा के साथ विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की प्रांसगिकता बनाने के प्रयास बार - बार किये जा रहे है। जहां सत्ता पक्ष के प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा के राष्टीªय अध्यक्ष अमीत शाह ने विधि आयोग को चुनाव खर्च कम करने के हवाला देते हुए लोकसभा के साथ 14 राज्यों के विधानसभा चुनाव करने हेतु पत्र लिखा है ।

अटल की मौत और उसके बाद

किसी की कथित महानता को समाज पर थोपा नहीं जा सकता
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-08-21 12:12 UTC
अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद उनकी महानता केे चर्चे स्वाभाविक हैं। राजनीतिज्ञों की छवि आमतौर पर खराब होती है, लेकिन अटलजी इसके अपवाद थे। उनकी छवि एक अच्छे राजनीतिज्ञ की थी और उनके विरोधी भी उनपर निजी हमला करने से बचा करते थे, हालांकि बलराज मधोक और सुब्रह्मण्यन स्वामी जैसे अपवाद भी थे, जो उनके बारे में खराब राय रखते थे और सार्वजनिक रूप से उसका उल्लेख भी किया करते थे। लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो अटल बिहारी वाजपेयी शायद ऐसे नेता थे, जिन्हें अपने विरोधियों के बीच भी सम्मान मिलता था और वे एक ऐसे नेता रहे हैं, जिनकी सबसे कम आलोचना राजनेता वर्ग में हुई है।

एशियाई खेलों का जन्मदाता है भारत

इसका पहला आयोजन दिल्ली में हुआ था
योगेश कुमार गोयल - 2018-08-20 12:01 UTC
18 अगस्त से 2 सितम्बर तक इंडोनेशिया के दो शहरों जकार्ता, जो इंडोनेशिया की राजधानी है और पालेमबंग, जो दक्षिण सुमात्रा की राजधानी है, में आयोजित हो रहे एशियाई खेलों का इतिहास बेहद दिलचस्प है। एशियाई खेलों के इतिहास में यह पहला अवसर है, जब इनका आयोजन एक साथ दो शहरों में हो रहा है। हालांकि इस आयोजन के लिए वियतनाम के हनोई की चर्चा हुई थी किन्तु 2014 में वियतनाम द्वारा मेजबानी से नाम वापस ले लिए जाने के बाद इंडोनेशिया को यह मौका मिला और जकार्ता 1962 के बाद अब दूसरी बार इन खेलों की मेजबानी कर रहा है। इंडोनेशिया ने मेजबानी के लिए 15.7 अरब रुपये खर्च किए हैं। प्रथम एशियाई खेलों का आयोजन दिल्ली में हुआ था।

भाजपा को हराने की कांग्रेस की इच्छाशक्ति मर चुकी है

सिद्धू की पाकिस्तान यात्रा
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-08-18 11:04 UTC
क्रिकेटर इमरान खान के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के दौरान भारत के पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू वहां उपस्थित थे। उन्हें इमरान ने अपने शपथग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था। उनके अलावा पूर्व क्रिकेटर सुनीन गावस्कर और कपिलदेव को भी आमंत्रित किया गया था। ये दोनों क्रिकेटर तो भारतीय टीम के कप्तान भी रह चुके हैं और क्रिकेटर के रूप में इन दोनों का कद सिद्धू के कद की अपेक्षा बहुत ऊंचा है। लेकिन इन दोनों ने वहां जाने से इनकार कर दिया। सुनील गावस्कर ने अपनी व्यस्तता बताकर आमंत्रण ठुकराया, तो कपिलदेव ने निजी कारणों से वहां जाने से मना कर दिया। लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू वहां गए और बहुत ही धूम धड़ाके से गए।

भारतीय लोकतंत्र में अटल का युग अटल

अटल सत्ता के नहीं सत्ता उनकी सारथी बनी
प्रभुनाथ शुक्ल - 2018-08-17 18:47 UTC
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी आखिरकार काल से रार नहीं ठान पाए और 93 साल की जीवन यात्रा में अंतिम सांस ली। नई दिल्ली के एम्स में 11 जून को उन्हें भर्ती कराया गया था। 65 दिनों तक नई दिल्ली के एम्स में जीवन और मौत से संघर्ष करते हुए लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया था। राजनीति में एक ऐसी रिक्तता एंव शून्यता छोड़ चले गए जिसकी भराई भारतीय राजनीति के वर्तमान एवं इतिहास में संभव नहीं। वह प्रमुख राष्टवादी अधिनायक थे। राजनीति में उन्होंने कभी जाति, धर्म और संप्रदाय को हावी नहीं होने दिया। अयोध्या में ढांचा गिराए जाने के बाद भी उन्होंने बेहद अफसोस जाहिर किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल और राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ प्रतिपक्ष के राजनेता भी एम्स उन्हें देखने पहुंचे। भारत के राजनीतिक इतिहास में शायद ही उनका कोई विरोधी रहा हो। बाजपेयी का देश के लिए जो योगदान रहा उसे भूलाया नहीं जा सकता।

भारतीय राजनीति के आकाश का ध्रुवतारा थे वाजपेयी

योगेश कुमार गोयल - 2018-08-17 18:44 UTC
तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने 93 वर्ष की आयु में 16 अगस्त को दिल्ली के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे पिछले नौ वर्षों से अस्वस्थ थे और पिछली 11 जून से एम्स में भर्ती थे। तीन वर्ष पूर्व उनकी अंतिम तस्वीर उस समय सामने आई थी, जब 27 मार्च 2015 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी प्रोटोकाॅल तोड़ते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने स्वयं उनके आवास पर गए थे। अटल जी तीन बार प्रधानमंत्री, दो बार राज्यसभा सदस्य तथा दस बार लोकसभा सदस्य रहे। अटल जी भले ही भाजपा के शीर्ष नेता रहे लेकिन वो देश के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक थे। सही मायने में अटल जी भारतीय राजनीति के आकाश का ध्रुवतारा थे। हर राजनीतिक दल में उनकी कितनी स्वीकार्यता रही, इसका आभास इसी से हो जाता है कि एम्स में उनका हालचाल जानने सत्ता पक्ष के अलावा लगभग सभी विपक्षी दलों के प्रमुख नेता भी पहुंचे।

क्या चार राज्यों के साथ होंगे लोकसभा के चुनाव?

मोदी अटल वाली गलती नहीं दुहराना चाहेंगे
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-08-16 12:52 UTC
भारत के निर्वाचन आयोग ने कहा है कि वह राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के साथ इस साल के दिसंबर में लोकसभा चुनाव करवाने को तैयार है। यह कुछ अटपटा लगता है, क्यांेकि अभी तक सरकार ने आयोग से आधिकारिक तौर पर लोकसभा चुनाव समय से पहले करवाने को नहीं कहा है और जब उसने नहीं कहा है, तो फिर इस तरह की खबर आयोग से औपचारिक या अनौपचारिक तौर से जारी किया जाना न केवल गैरजरूरी है, बल्कि आपत्तिजनक भी है। लोकसभा के चुनाव समय से पहले हो या नहीं, इसका निर्णय पहले केन्द्र सरकार को करना है और उसकी इच्छा सामने आने के बाद ही आयोग को इस तरह की टिप्पणी करनी चाहिए।

शहीदों के सपनों के भारत की काया आज बदल गई है

आज राजनीति सिर्फ सत्ता हथियाने की राह बन गई है
भरत मिश्र प्राची - 2018-08-14 13:27 UTC
सन् 1857 से लेकर आजादी तक छिड़ी आजादी के जंग पर एक नजर डालें जहां देश की आजादी के लिये अनोखी जंग छिड़ गई थी। एक तरफ अंग्रेजों को छक्के छुड़ाने वाली प्रथम भारतीय नारी लक्ष्मी बाई तो दुसरी ओर जीवन के अंतिम पड़ाव पर पड़े बूढ़े शेर बाबू कुंवर सिंह की बाजुओं की ताकत के आगे निढ़ाल पड़े अंग्रेजी हुकूमत । साथ ही साथ देशभक्ति में सराबोर हुए आजादी के दिवानों का जत्था जिनकी कुर्बानियों के आगे अंग्रेजी हुकूमत को यहां से बिदा होना पड़ा।

सख्त कानून से भी ज्यादा जरूरी है सख्त व्यवस्था तंत्र

जहां-तहां देवरिया और मुजफ्फरपुर
अनिल जैन - 2018-08-13 13:26 UTC
बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका संरक्षण गृह की 34 बच्चियों के यौन शोषण के दिल दहला देने वाले कांड को लेकर उठा बवंडर अभी थमा भी नहीं था कि उत्तर प्रदेश से देवरिया के शेल्टर होम से जुडी त्रासदी की खबर आ गई। ये दोनों खबरें इस संदेह को यकीन में बदलने वाली है कि बेसहारा बच्चियों और महिलाओं को आश्रय या संरक्षण के नाम पर नरक में झोंकने की प्रवृत्ति एक या दो बुरे अपवादों तक ही सीमित नहीं है। ये दोनों ही मामले हमारे समाज के सभ्य होने पर सवाल खडे करते हुए बताते हैं कि अगर सरपरस्त ही सौदागर बन कर अपनी दुष्ट इच्छाओं की पूर्ति के लिए किसी भी हद गिरने को तत्पर हो जाएं और ऐसे लोगों को हमारे व्यवस्था-तंत्र का पूरा संरक्षण हासिल हो तो फिर किसी शेल्टर होम या आश्रय केंद्र में बच्चियां और महिलाएं सुरक्षित नहीं मानी जा सकतीं।