Skip to main content

View Articles

सऊदी ने मुस्लिम देशों को युद्ध की ओर धकेला

अमेरिका को जिम्मेदारी लेनी होगी
अरुण श्रीवास्तव - 2016-01-14 11:58 UTC
सऊदी अरब को पता था कि यदि उसने शिया के धर्मगुरू शेख निम्र को मौत की सजा दी, तो उसका परिणाम घातक होगा। उसके बावजूद ने उसने वैसा किया, तो इसके क्या कारण हो सकते हैं? यह मानने का कोई कारण नहीं है कि सऊदी को नहीं पता था कि उसका क्या परिणाम होगा। इसका मतलब है कि उसने जानबूझकर वैसा किया और उसके पीछे उसकी एक सोची समझी रणनीति थी। सऊदी सरकार जानबूझकर धार्मिक उन्माद पैदा करना चाहता था ताकि सऊदी लोगांे के बीच सत्तारूढ़ परिवार की स्थिति मजबूत बने। इस तरह का निर्णय सत्ताधारी लोग लेते रहते हैं। खासकर ऐसा वे तब करते हैं, जब देश में सामाजिक, राजनैतिक अथवा आर्थिक उथल पुथल का दौर रहता है।

दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग ले रहा है रूप

भारत और बांग्लादेश को होगा बहुत फायदा
आशीष बिश्वास - 2016-01-08 12:07 UTC
कोलकाताः दक्षिण एशिया में धीरे धीरे क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग रूप लेने लगा है। भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच हुए समझौते अब अमल भी किए जाने लगे हैं।

आईएसआईएस की चुनौती

नाटो को रूस के साथ सहयोग करना होगा
अशोक बी शर्मा - 2015-11-30 10:31 UTC
पेरिस में हुए आतंकवादी हमले ने आतंकवादियों को अच्छे आतंकवादी और बुरे आतंकवादी में विभाजन करने के खतरे को उजागर कर दिया है। इससे कोई फायदा तो हुआ नहीं है, उलटे इससे माहौल खराब ही हुआ है। इसके कारण कुछ को अच्छे आतंकवादी बताकर संरक्षण देने की जो परंपरा बनी हुई है, उससे निजात पाने की जरूरत पेरिस के आतंकी हमले ने रेखांकित कर दी है।

चुनाव के बाद म्यान्मार में समस्याएं ही समस्याएं

भारत को उसके साथ रिश्ते को लेकर सतर्क रहना होगा
बरुण दास गुप्ता - 2015-11-25 18:47 UTC
कोलकाताः म्यान्मार में हुए चुनाव में अंग सन सू की की नेशनल लीग फाॅर डेमोक्रेसी की जीत हुई। सैनिक शासकों ने भी एक पार्टी बना रखी थी और उस पार्टी की जबर्दस्त हार हुई। संसद के नीचले सदन प्रतिनिधि सभा में 330 चुनावी सीटें हैं। उनमें 225 पर अंग की पार्टी का कब्जा हो गया और सैनिक शासकों के हाथों सिर्फ 25 सीटें ही आईं। ऊपरी सदन में अंग की पार्टी को कुल 224 में से 136 में जीत मिली और सैनिक शासकों की पार्टी को मात्र 12 सीटें ही मिलीं।

भारत को रुपया रूबल व्यापार का प्रस्ताव मान लेना चाहिए

मोदी और पुतिन की बातचीत में सुरक्षा और व्यापार पर होगा जोर
नन्तू बनर्जी - 2015-11-05 10:27 UTC
रूस ने भारत को वस्तु विनिमय व्यापार को फिर से शुरू करने का प्रस्ताव दिया है। इस वस्तु विनिमय व्यापार को रूपया- रूबल व्यापार भी कहा जाता रहा है। रूस जब सोवियत संघ का हिस्सा था, तो उसके साथ इस तरह के व्यापार का समझौता था। लेकिन बाद में वह समाप्त हो गया। उस व्यापार को शुरू करने का एक नया प्रस्ताव बहुत ही सही समय पर आया है। भारत को इसे स्वीकार कर लेना चाहिए।

बराक ओबामा की मध्यपूर्व नीति को झटका

पुतिन ने अमेरिका की धाक वहां समाप्त कर दी
अरुण श्रीवास्तव - 2015-11-05 10:26 UTC
सीरिया में अमेरिकी वर्चस्व को उस समय बहुत बड़ा झटका लगा, जब रूस ने वहां उग्रवादियों के खिलाफ जमकर बमबारी शुरू कर दी। उसके बाद ओबामा प्रशासन ने अपना चेहरा बचाने के लिए आईएसआईएस के खिलाफ अपने सैनिकों की तैनाती शुरू कर दी है।

मध्यपूर्व में एक बड़ा खिलाड़ी बन गया है रूस

ईरान, इराक और सीरिया के साथ उसकी दोस्ती अमेरिका को खटकी
अरुण श्रीवास्तव - 2015-10-28 11:52 UTC
अमेरिका की दादागीरी समाप्त हो गई है। किसी ने भी यह नहीं सोचा होगा कि विश्व पर अमेरिका का वर्चस्व इस तरह समाप्त हो जाएगा। रूस ने 30 सितंबर को सीरिया मे सशस्त्र हस्तक्षेप किया। वैसा वहां की सरकार के अनुरोध पर किया गया। उस हस्तक्षेप के साथ ही वहां अमेरिका की दादागीरी समाप्त हो गई।

सीरिया संकट को जटिल बना रही है अमेरिका की महत्वाकांक्षा

ग्रामीण ओबामा को पुतिन के साथ मिलकर इसे सुलझाना चाहिए
अरुण श्रीवास्तव - 2015-10-03 11:13 UTC
असद की सत्ता को समाप्त होने से बचाने के लिए रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने वहां सेना भेज दी है। इससे सीरिया के गृहयुद्ध का एक नया अध्याय शुरू हो गया है। यदि रूस ने अपने इस कदम के बाद सही और सफल राजनय नहीं किया, तो उसकी हालत वही हो सकती है, जो एक बार सोवियत संघ की अफगानिस्तान में हो चुकी है। बराक ओबामा और पुतिन आपसी बातचीत के द्वारा और मिलजुलकर मामले को सुलझा सकते हैं, लेकिन दोनों मिलकर क्या करेंगे और सीरिया सत्ता प्रमुख बशर अल असद का क्या होगा, अभी यह साफ नहीं है।

शास्त्री की वाशिंगटन यात्रा को दो बार टाला गया

प्रदेश में भारत पाक संबंध द्विपक्षीय एजेंडे में सबसे ऊपर था
कल्याणी शंकर - 2015-09-04 11:04 UTC
ताशकंद समझौते के बाद तब के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की वाशिंगटन यात्रा तय की गई थी, पर यात्रा हो न सकी। सच कहा जाय तो उनके प्रधानमंत्रित्वकाल में वाशिंगटन की यात्रा दो बार हुई थी। पहली यात्रा जून 1965 के लिए तय की गई थी। पर उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जाॅनसन ने उसे स्थगित कर दिया। वह शास्त्रीजी के लिए बहुत ही निराशाजनक था। दूसरी यात्रा 31 जनवरी, 1966 से 5 फरवरी, 1966 के लिए तय हुई थी। यदि शास्त्री जी जिंदा रहते, तो वे एक विजयी राजनेता के रूप में वाशिंगटन की यात्रा करते।

राजपक्षे की हार से दिल्ली को राहत

श्रीसेना के कार्यकाल में भारत-श्रीलंका संबंध सुधरेंगे
बरुण दास गुप्ता - 2015-08-24 11:57 UTC
श्रीलंका संसदीय चुनाव के नतीजे भारत के लिए राहत की सांस लेने का कारण बनकर आए हैं और दूसरी तरफ वे चीन के लिए दुहरा झटका हैं। इस चुनाव में महिंदा राजपक्षे की पार्टी की हार हुई। गौरतलब हो कि राजपक्षे राष्ट्रपति के रूप में श्रीलंका की सत्ता पर 9 सालों से काबिज थे। इसी साल जनवरी महीने में राष्ट्रपति के लिए हुए चुनाव में उनकी मैत्रीपाल सिरीसेना के हाथों हार हो गई थीं। उस हार के बाद महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में एक बार फिर आने के लिए संसदीय चुनाव में गंभीर प्रयास कर रहे थे।
Collapse/expand modules below