ऐसे भाषा-व्यवहार से कैसे बचेगा लोकतंत्र
भाषण का गिरता स्तर बिल्कुल नया और चिंताजनक अनुभव
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2017-02-27 10:53 UTC
’अगर गांव में कब्रस्तान बनता है तो श्मशान भी बनना चाहिए। अगर ईद पर बिजली मिलती है तो दीवाली पर भी मिलनी चाहिए।’, ’आपको अगर सरकारी नौकरी पाना है तो किसी यादव के घर में जन्म लेना होगा।’ इस तरह के चुनावी सुभाषित किसी गली-मोहल्ले या जिला स्तर के नेता के नहीं बल्कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश के सर्वोच्च नेता यानी प्रधानमंत्री यानी नरेंद्र मोदी के श्रीमुख से उत्तर प्रदेश की विभिन्न चुनावी सभाओं में निकल रहे हैं। जब प्रधानमंत्री के पद से इस तरह की भाषा का इस्तेमाल हो तो उनके अपने ही सहयोगी और विरोधी दलों के नेता भी इसी तरह के छिछले कटाक्षों और आरोपों का इस्तेमाल करने से कैसे बच सकते हैं। सो, कोई किसी गठबंधन की तुलना कसाब आतंकवादी से कर रहा है तो कोई किसी को सीधे-सीधे आतंकवादी और हत्यारा बता रहा है और कोई ’गुजराती गधों’ के हवाले से तंज कस रहा है।