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बहुदलीय व्यवस्था पर आधारित भारत की लोकतांत्रिक नींव खतरे में

सत्तारूढ़ भाजपा देश की राजनीति से विपक्ष को समाप्त करने पर आमादा
नीलोत्पल बसु - 2026-06-20 11:24 UTC
ब्रिटिश राजनेता सर एंथनी ईडन ने भारत की संविधान निर्माण प्रक्रिया को अभूतपूर्व पैमाने पर लोकतांत्रिक अभ्यास का एक “विशाल और अद्भुत प्रयास” माना था। उन्होंने इसे पश्चिमी मॉडल की मात्र नकल नहीं, बल्कि एक साहसिक लोकतांत्रिक प्रयोग के रूप में देखा, जिसका वैश्विक प्रभाव दूरगामी हो सकता था। उन्होंने कहा था कि भारतीय प्रयास “हमारे यहां की व्यवस्था की फीकी नकल नहीं, बल्कि उसका कहीं अधिक व्यापक और विस्तृत रूप है, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी।” यह कहते हुए उन्होंने इतनी विविधताओं से भरी विशाल आबादी को एकजुट करने की चुनौती को भी स्वीकार किया और माना कि “यदि यह सफल होता है, तो एशिया पर इसका सकारात्मक प्रभाव असीमित होगा।” ईडन ने भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने वालों की मंशा के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया था।

क्या निजीकरण से सुधरेगी स्वास्थ्य व्यवस्था?

मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य केंद्रों के निजीकरण पर सवाल
राजु कुमार - 2026-06-20 11:20 UTC
मध्यप्रदेश सरकार ने रीवा, देवास और गुना जिलों में कुछ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के संचालन के लिए आउटसोर्स प्रणाली पर आधारित एक पायलट परियोजना को मंजूरी दी है। मंत्रि-परिषद के अनुसार यह व्यवस्था उन स्वास्थ्य केंद्रों में लागू की जाएगी जहां चिकित्सकों के अधिकांश पद लंबे समय से रिक्त हैं। सरकार का दावा है कि इससे आम लोगों को स्थानीय स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकेंगी और छोटी-मोटी बीमारियों के उपचार के लिए जिला अस्पतालों पर निर्भरता कम होगी।सरकार ने इस व्यवस्था को पांच वर्ष की पायलट परियोजना के रूप में लागू करने का निर्णय लिया है। इसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाएगा और अनुभव सकारात्मक रहने पर इसे प्रदेश के अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक विस्तारित किया जा सकता है।

अमेरिका-ईरान शांति समझौता : दशकों के अविश्वास के बीच बड़ी परीक्षा

अमेरिका-ईरान समझौता : शांति या अस्थायी विराम?
असद मिर्जा - 2026-06-17 17:10 UTC
अमेरिका और ईरान के बीच हुआ प्रारूप शांति समझौता पश्चिम एशिया में व्यापक युद्ध के तत्काल खतरे को कम करने में सफल रहा है। कई महीनों तक चले सैन्य टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को प्रभावित किया, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को खतरे में डाला और पूरे क्षेत्र में बड़े संघर्ष की आशंकाएं पैदा कर दी थीं। ऐसे माहौल में वाशिंगटन और तेहरान का बातचीत का रास्ता चुनना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन इतिहास बताता है कि शांति समझौते पर हस्ताक्षर करना और उसे लंबे समय तक कायम रखना दो अलग बातें हैं।

भारत में रसोई गैस की कीमतों पर नियंत्रण जरूरी

सऊदी अरब जैसे देश भी तेल और गैस पर देते हैं सब्सिडी
नन्तू बनर्जी - 2026-06-17 11:29 UTC
घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतों में बार-बार बढ़ोतरी चिंतनीय है। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ तेल कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए घरेलू रसोई गैस की कीमतें बढ़ाने का रास्ता चुना है, जबकि इसका सीधा बोझ देश के लगभग 33.7 करोड़ सक्रिय घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। यह तब है जब वित्त वर्ष 2025-26 में सरकारी तेल कंपनियों ने संयुक्त रूप से 77,280.65 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 130 प्रतिशत अधिक है। अकेले इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) ने 36,802 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड लाभ दर्ज किया।

‘बड़ा समझौता’ जो ईरान युद्ध की कीमत तय कर सकता है जिसे दुनिया चुकाएगी

होर्मुज के लगातार बंद होने का मतलब होगा $150 प्रति बैरल तेल और तबाही
के रवींद्रन - 2026-06-15 10:57 UTC
राष्ट्रपति ट्रंप का ‘ग्रेट सेटलमेंट’ का वादा तेल की कीमतों को नीचे लाने, शेयर बाजार को शांत करने और होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य परिवहन लौटने की उम्मीद जगाने के लिए काफी रहा है। फिर भी यह दिखाता है कि राहत कितनी नाजुक बनी हुई है। एक राजनयिक शुरुआत कीमतों को तुरंत बदल सकती है, लेकिन एक टिकाऊ समझौता अभी भी शब्दों से नहीं, बल्कि टैंकरों की आवाजाही, बीमा दर, सैन्य नियंत्रण और दुश्मनों की उन शर्तों को मानने की इच्छा से मापा जाता है जिन्हें हर देश अपनी जनता के सामने लाभप्रद के रूप में रख सकता है।

नटराजन की न्याय की गुहार को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज करना अहम

संवैधानिक रोक का हवाला दिया, लेकिन चुनाव याचिका दायर करने की इजाज़त दी
डॉ. ज्ञान पाठक - 2026-06-13 11:04 UTC
मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन द्वारा दायर रिट याचिका को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज करना एक अहम घटनाक्रम है। यह याचिका निर्वाचन अधिकारी द्वारा उनके नामांकन पत्रों को कथित तौर पर गलत तरीके से खारिज किए जाने के खिलाफ थी। 11 जून को, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन अधिकारी के खारिज करने के आदेश की वैधता की जांच के लिए 12 जून को सुनवाई हेतु याचिका स्वीकार की थी। हालांकि, जब मामला न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एएस चंडुरकर की पीठ के सामने सुनवाई के लिए आया, तो उन्होंने संवैधानिक रोक का हवाला देते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। निर्वाचन अधिकारी के फैसले की वैधता के मुद्दे पर कोई सुनवाई नहीं हुई, और पीठ ने उन्हें जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव याचिका दायर करके इस फैसले को चुनौती देने की छूट दी।

क्या स्कूली शिक्षा में बदलाव ला पाएंगे सांदीपनि विद्यालय

सांदीपनि विद्यालय : उम्मीदें, निवेश और चुनौतियां
राजु कुमार - 2026-06-12 12:28 UTC
मध्यप्रदेश में स्कूली शिक्षा को लेकर लगातार प्रयोग होते रहे हैं। सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने और उन्हें निजी स्कूलों के मुकाबले अधिक आकर्षक बनाने के लिए समय-समय पर कई पहलें की गई हैं। इनमें कुछ योजनाएं केंद्र सरकार के सहयोग से शुरू हुईं, जबकि कुछ राज्य सरकार की अपनी पहल रहीं। उत्कृष्ट (एक्सीलेंस) विद्यालय, मॉडल स्कूल, कन्या शिक्षा परिसर और उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जैसे प्रयोग इसी प्रयास का हिस्सा रहे हैं। सीएम राइज स्कूल और बाद में सांदीपनि विद्यालय इसी यात्रा का नवीनतम चरण हैं। इन विद्यालयों की तुलना अक्सर केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों से की जाती है। भले ही यह तुलना पूरी तरह उचित न हो, लेकिन इतना जरूर दिखाई देता है कि जिन सरकारी विद्यालयों पर अधिक संसाधन लगाए गए हैं,बेहतर अधोसंरचना विकसित की गई है और जहाँ विशेष निगरानी रही है, वहां बदलाव के संकेत भी अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।

पंजाब में 2027 के चुनावों से पहले भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश

धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ताकतों को इस चाल को नाकाम करने के लिए एकजुट होना चाहिए
डॉ. अरुण मित्रा - 2026-06-12 10:46 UTC
जैसे-जैसे 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राज्य का राजनीतिक माहौल तेजी से बदल रहा है। सभी राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए रणनीतियां बना रहे हैं और संभावित राजनीतिक गठबंधनों पर भी चर्चा शुरू हो गई है, हालांकि ये अभी शुरुआती दौर में हैं।

क्या टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी वर्तमान मुश्किल से उबर पाएंगी?

कई लड़ाइयों में लड़ने वाली ममता बनर्जी क्या बागियों से हार गई?
टी एन अशोक - 2026-06-11 10:33 UTC
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), जिसे कभी भारत की सबसे मज़बूत क्षेत्रीय राजनीतिक मशीन माना जाता था, अपने 28 साल के इतिहास में सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। 2026 के पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों में पार्टी की ज़बरदस्त हार के बाद पार्टी के अन्दर जो नाराज़गी की आवाज़ों के तौर पर शुरू हुई थी, वह तेज़ी से पश्चिम बंगाल विधान सभा से लेकर नई दिल्ली में संसद के गलियारों तक फैली एक बड़ी अंदरूनी बगावत में बदल गई है।

उत्पादक मूल्य सूचकांक का स्वागत, पर थोक मूल्य सूचकांक हटाने की जरुरत नहीं

थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर मुद्रास्फीति पर नजर रखने के भी हैं लाभ
नन्तू बनर्जी - 2026-06-10 10:36 UTC
भारत सरकार ने आखिरकार थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) की तुलना में ज़्यादा भरोसेमंद मुद्रास्फीति निगरानी उपकरण के तौर पर उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) शुरू करने का फैसला किया है। हालांकि, अगले पांच सालों के बाद डब्ल्यूपीआई को पूरी तरह से हटाना शायद सही न हो। भारत जैसे देश में मुद्रस्फीति का अंदाज़ा लगाने के लिए थोक मूल्य के स्तर बहुत कीमती बने हुए हैं। उदाहरण के लिए, भारत में पेट्रोलियम और फार्मास्यूटिकल्स जैसी चीज़ों के घरेलू उत्पादक मूल्य का उनके बाजार मूल्य से बहुत कम सम्बंध होता है। कई देशों में केन्द्रीय बैंक इन दोनों सूचकांकों का इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि लागत और उत्पादन मूल्य (जो फैक्टरियां देती हैं) में बदलाव आम तौर पर उपभोक्ता खुदरा मूल्य (जो आप देते हैं) में आते हैं, इसलिए अर्थशास्त्री इस आंकड़े का इस्तेमाल भविष्य के उपभोक्ता मुद्रास्फीति रूझान का अनुमान लगाने के लिए करते हैं।