पूंजीवाद का बदलता चेहरा
आज का पूंजीवाद दो हिस्सों में बंट चुका है
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2022-01-08 09:31 UTC
यह घुमक्कड़ी नहीं है जिसके आकर्षण में लोग भटकते रहते हैं। आज यह आकर्षण मजबूरी बन गई है। यह मजबूरी भूख की है जिससे निजात पाना मुश्किल है। कुछ समय पहले ये मजदूर जो नौकरी से निकाले हुए थे और सड़क पर उतर आए थे, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के साथ ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते हुए ये वहां पहुंचना चाहते थे जहां रोटी थी। भूख का मंजर अभी खत्म नहीं हुआ है। नौकरियां कम से कम होती जा रही हैं, अवसर सीमित हैं और योग्यता के अनुसार तो बिल्कुल नहीं। कोई बिजनेस मैंनेजमेंट कर चुका है लेकिन माली की नौकरी में जा रहा है और जिसने पी.एच.डी. की, वह स्कूल में पियन ;चपरासी है। व्यवस्था कुशलता को अपनाने से इंकार करती है। बेरोजगारी दर दिसंबर 2014 में ही सी.एमआई.ई. के अनुसार 7.91 फीसदी पर पहुंच चुकी है। यह महामंदी के दिनों से भी अधिक है लेकिन इन स्थितियों में भी धनी और भी धनी बनते जा रहे हैं। वे लगातार अधिकाधिक धनी होते जा रहे हैं।