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पश्चिम बंगाल का ममता संकट

इसके लिए मोदी ही जिम्मेदार हैं
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-02-05 09:44 UTC
पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व स्थिति पैदा हुई, जो देश के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। इसने एक संवैधानिक संकट पैदा कर दिया और देश में राजनैतिक भूचाल खड़ा कर दिया। और यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई का लगातार राजनैतिक इस्तेमाल होता रहा है। सभी सरकारें इसका दुरुपयोग करती हैं। किसी को फंसाने के लिए इसका इस्तेमाल तो कम ही किया जाता है, लेकिन भ्रष्ट नेताओं को बचाकर इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है। यूपीए सरकार में भी यही हो रहा था और नरेन्द्र मोदी की सरकार में भी कुछ ऐसा ही हुआ।

मायावती का राहुल पर हमला

भाजपा से सहयोग का रास्ता खुला रखने का संकेत तो नहीं?
अनिल जैन - 2019-02-04 11:17 UTC
उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के बीच कुछ दिनों पहले हुए गठबंधन के बाद से लगातार भाजपा पर निशाना साध रहीं बसपा अध्यक्ष मायावती ने हाल ही में अचानक अपनी तोप का मुंह कांग्रेस की ओर कर दिया। उन्होंने ‘न्यूनतम आमदनी गारंटी’ योजना संबंधी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बयान की खिल्ली उडाते हुए सवाल किया कि उनका यह वादा भी कहीं कांग्रेस के ही पूर्व में दिए गए ‘गरीबी हटाओ’ जैसे नारे की तरह मजाक तो साबित नहीं होगा?

चुनाव को समर्पित एक बजट

पर उपलब्धियों के आंकड़े संदिग्ध हैं
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-02-01 11:28 UTC
मोदी सरकार ने अपने वर्तमान कार्यकाल का अपना अंतिम बजट पेश कर दिया है। इसे अंतरिम बजट कहा जा रहा है, क्योंकि यह पूरे साल भर के लिए नहीं है। शुरुआती 6 महीने के सरकारी खर्च का ही प्रावधान इसमें किया गया है, लेकिन राजकोष की अन्य अनेक नीतियां पूरे साल भर के लिए घोषित की गई हैं। इस साल का अंतिम बजट तो अगली सरकार ही पेश करेगी और वह सरकार मोदी की सरकार भी हो सकती है अथवा कोई अन्य सरकार भी हो सकती है।

मौसम की अति से नहीं, साधनहीनता से मरते हैं लोग

ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती का सामना कैसे करेंगे हम?
अनिल जैन - 2019-01-31 09:52 UTC
कहीं भूख और कुपोषण से होने वाली मौतें तो कहीं गरीबी और कर्ज के बोझ से त्रस्त किसानों के खुदकुशी करने के जारी सिलसिले के बीच ही हर साल सर्दी की ठिठुरन, बारिश-बाढ और गरम लू के थपेडों से भी लोग मरते है। असमय होने वाली ये मौतें नग्न सच्चाइयां हैं हमारे उस भारत की जिसके बारे में दावा किया जाता है कि वह तेजी से विकास कर रहा है और जल्द ही दुनिया की एक महाशक्ति बन जाएगा। ये सच्चाइयां सिर्फ हमारी सरकारों के 'शाइनिंग इंडिया’ और 'भारत निर्माण’ 'न्यू इंडिया’ 'स्टार्टअप इंडिया’, 'स्टैंडअप इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों और अर्थव्यवस्था के बारे में किए जाने वाले गुलाबी दावों की ही खिल्ली नहीं उडाती हैं बल्कि व्यवस्था पर काबिज लोगों की नालायकी और संवेदनहीनता को भी उजागर करती है।

फरवरी का चुनावी बजट, होगी तोहफों की बरसात

उपेन्द्र प्रसाद - 2019-01-30 11:35 UTC
फरवरी के पहले दिन पेश होने वाला केन्द्रीय बजट लेखानुदान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह एक पूर्ण बजट होगा। भाजपा नेताओं के बयान से इस बात की पुष्टि होती है। अबतक परंपरा तो यही रही थी कि लोकसभा चुनाव के ठीक पहले पेश किए बजट को लेखानुदान का ही रूप दे दिया जाता था, जिसके तहत अगली सरकार के गठन तक सरकारी खर्च का इंतजाम हो जाता था। चुनाव के बाद जो सरकार बनती थी, वह साल का पूर्ण बजट पेश करती थी।

भाजपा नेता बाबूलाल गौर को कांग्रेस से चुनाव लड़ने का आॅफर

भाजपा नेताओं ने कहा कांग्रेस के पास अपने उम्मीदवार नहीं
एल एस हरदेनिया - 2019-01-29 08:49 UTC
भोपालः कांग्रेस महासचिव के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रियंका गांधी की नियुक्ति का मध्यप्रदेश के नेताओं और आम कांग्रेस के लोगों ने स्वागत किया है। पार्टी के कई नेताओं ने उम्मीद जताई है कि यूपी के अलावा प्रियंका मध्य प्रदेश का भी दौरा करेंगी। उन्हें उम्मीद है कि उनकी यात्राओं से पार्टी के लोगों का मनोबल बढ़ेगा। सिंधिया की नियुक्ति को उन्हें राज्य के मामलों से दूर रखने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। मध्य प्रदेश की राजनीति में सिंधिया के लिए महत्वपूर्ण है। यदि उन्हें दूर रखा जाता है, तो यह राज्य की कई समस्याओं से जूझते हुए कमलनाथ को राहत दे सकता है।

बिहार में महागठबंधनः मंजिल पर पहुंचना आसान नहीं

उपेन्द्र प्रसाद - 2019-01-28 11:21 UTC
उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन तो हुआ, लेकिन महागठबधन नहीं हो सका। कांग्रेस उससे बाहर ही रही और बिना कांग्रेस के शामिल हुए माया और अखिलेश के उस गठबंधन को महागठबंधन कहा ही नहीं जा सकता। उत्तर प्रदेश के बाद बिहार पर सबकी नजरे लगी हुई है, क्योंकि वहां भी अभी तक महागठबंधन पर कुछ ठोस फैसला न हो सका है। वैसा बिहार में 2015 के विधानसभा चुनाव के पहले एक महागठबंधन बना था, जिसमें कांग्रेस भी शामिल थी और कहने को वह महागठबंधन अभी भी अस्तित्व में है, क्योंकि जनता दल(यू) के बाहर जाने के बाद भी राष्ट्रीय जनता दल के साथ कांग्रेस उसमें बनी हुई है। लेकिन उसमें छोटे छोटे कुछ और दलों के आ जाने के बाद उस महागठबंधन के अस्तित्व पर ही खतरा पैदा हो गया है। इसका कारण छोटी छोटी पार्टियों की बड़ी बड़ी मांगे हैं और उन्हें मानने के लिए कांग्रेस कुर्बानी करने को तैयार नहीं है।

सक्रिय राजनीति में प्रियंका

क्या उत्तर प्रदेश मे चलेगा उनका सिक्का?
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-01-25 11:32 UTC
प्रियंका गांधी आखिरकार कांग्रेस की सक्रिय राजनीति मे खुलकर सामने आ ही गई। सक्रिय तो वह पहले भी थी, लेकिन उनकी चुनावी सक्रियता अमेठी और रायबरेली तक ही सीमित थी। पर्दे के पीछे से भी वह निर्णय प्रक्रिया में हिस्सा लेती थी। पिछले दिनों तीन राज्यों के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के नाम तय करने में वह शामिल थीं, लेकिन उनकी यह सक्रियता एकतरफा ही थीं। चूंकि वह घोषित रूप से राजनीति मंे सक्रिय नहीं थीं, इसलिए उनका कांग्रेस के नेताओं और कार्यकत्र्ताओं से कोई सीधा संबंध नहीं था। अब चूंकि वे कांग्रेस की एक महासचिव बन गई हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश में पार्टी को संभालने की जिम्मेदारी मिल गई है, तो वह सबकुछ एकतरफा तरीके से नहीं कर पाएंगी, बल्कि उन्हें कांग्रेस नेताओं और कार्यकत्र्ताओं की पहुंच के अन्दर अपने आपको रखना होगा।

मुकम्मल कामयाबी से दूर है हमारा गणतंत्र

फिर भी यह कहना उचित नहीं कि गणतंत्र पूरी तरह विफल
अनिल जैन - 2019-01-24 09:42 UTC
अपने गणतंत्र के 70 वें वर्ष में प्रवेश करते वक्त हमारे लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यही हो सकती है कि क्या वाकई तंत्र और गण के बीच उस तरह का सहज और संवेदनशील रिश्ता बन पाया है जैसा कि एक व्यक्ति का अपने परिवार से होता है? आखिर आजादी और फिर संविधान के पीछे मूल भावना तो यही थी। महात्मा गांधी ने इस संदर्भ में कहा था- ‘मैं ऐसे संविधान के लिए प्रयत्न करुंगा जिसमें छोटे से छोटे व्यक्ति को भी यह अहसास हो कि यह देश उसका है, इसके निर्माण में उनका योगदान है और उसकी आवाज का यहां महत्व है। मैं ऐसे संविधान के लिए प्रयत्न करुंगा जहां ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं होगा, जहां स्त्री-पुरुष के बीच समानता होगी और इसमें नशे जैसी बुराइयों के लिए कोई जगह नहीं होगी।’ दरअसल, भारतीय गणतंत्र के मूल्यांकन की यही सबसे बड़ी कसौटी हो सकती है।

ईवीएम पर एक बार फिर बवाल

वीवीपीएटी जुड़ने के बाद इस पर सवाल उठाना अनुचित
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-01-23 16:15 UTC
ईवीएम पर एक बार फिर सवाल उठाए जा रहे हैं। कोलकाता में ममता बनर्जी द्वारा आयोजित रैली में विपक्ष के अनेक नेताओं ने ईवीएम के खिलाफ आग उगली और देश को एक बार फिर बैलट पेपर के युग में ले जाने की मांग की। उस रैली के चंद दिनों बाद ही लंडन में एक प्रेस कान्फ्रेंस में किसी सैयद शुजा ने दावा कर दिया कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है और उन्हें हैक कर न केवल 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे बदले गए, बल्कि दिल्ली विधानसभा के 2015 में हुए चुनाव के नतीजे भी बदले गए। उसने दावा किया कि 2014 में उसने 12 लोगों की टीम के साथ यह काम खुद किया था। उसकी टीम के 11 लोग मार डाले गए और वह अपनी जान बचाकर खुद अमेरिका में रह रहा है।