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वर्तमान परिवेश में एक देश एक चुनाव कैसे संभव?

यह प्रयोग भारत में पहले ही विफल हो चुका है
डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2018-07-16 12:02 UTC
स्वतंत्रता उपरान्त देश में कई वर्षो तक लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते रहे तब आज जैसी अनेक राजनीतिक पार्टिया नहीं हुआ करती थीं। उस समय देश में सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस थी एवं अन्य छोटे - छोटे राजनीतिक दल कांग्रेस विचारधारा से अलग हटकर अवश्य थे जिनका जनाधार नहीं के बराबर रहा। इसमें जनसंघ, समाजवादी , कम्यूनिष्ट विचार धारा की भाकपा एवं माकपा पार्टिया प्रमुख रही। आज जैसे क्षेत्रिय राजनतिक दल भी उन दिनों नहीं सक्रिय रहे। देश में जैसे - जैसे सत्ता सुख बटोरने की प्रवृृति हावी होती गई, राजनीतिक दलों में माफिया वर्ग का वर्चस्व बढ़ता चला गया। देश में राजनीतिक अस्थिरता का महौल बनने लगा, कई राजनीतिक दल उभर आये जिनमें क्षेत्रीय दलों की प्रमुखता सर्वोपरि बनी रही।

ऐसे कैसे सुधरेंगे दिल्ली के हालात

उपराज्यपाल अभी भी कर रहे हैं मनमानी
योगेश कुमार गोयल - 2018-07-14 09:44 UTC
भले ही गत 4 जुलाई को देश की सर्वोच्च अदालत की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने बहुप्रतीक्षित फैसले में दिल्ली में उपराज्यपाल और निर्वाचित सरकार के बीच सरकार के गठन के बाद से चली आ रही अधिकारों की लड़ाई को लेकर दिल्ली से जुड़े कानूनों की नए सिरे से व्याख्या कर उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के अधिकारों को स्पष्ट कर दिया हो किन्तु सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद उपराज्यपाल के क्रियाकलापों में साफ नजर आ रहा मनमाना रवैया दिल्ली सरकार के साथ-साथ संविधान के जानकारों को भी रास नहीं आ रहा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में अधिकारों की नए सिरे से व्याख्या कर अपने फैसले से केजरीवाल सरकार के साथ-साथ उपराज्यपाल को भी आईना दिखाया और दोनों को उनके अधिकार तथा अधिकारों के उपयोग की सीमाएं भी बताई लेकिन लगता नहीं कि दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच की यह जंग इतनी आसानी से थम जाएगी।

बुराड़ी कांड के पीछे क्या था?

‘लगे रहो मुन्ना भाई’ के केमिकल लोचे ने फंदे पर लटकाया
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-07-13 11:59 UTC
दिल्ली की बुराड़ी में 11 लोगों की मौत की गुत्थी लगभग पूरी तरह सुलझ गई है। लोगों को दहलाने वाली इस घटना ने राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय कुख्याति पा ली। एक साथ एक संयुक्त परिवार के सभी 11 सदस्यों का फांसी पर लटक कर मर जाना अपने आप में एक दहशत भर देने वाली घटना थी। इस तरह की घटना कम से कम भारत में नहीं हुई थी कि एक ही परिवार के इतने सारे सदस्य एक साथ अपने ही घर में फांसी के फंदे पर लटकते मिले।

विज्ञान और विकास ने जीती जिंदगी की जंग

कामयाब हुआ जिंदगी को बचाने का मिशन
प्रभुनाथ शुक्ल - 2018-07-12 10:58 UTC
थाईलैंड में इंसानी जिंदगी बचाने का चमत्कारिक मिशन पूरा हो गया। थाईलैंड की थैम लुआंग गुफा में फंसे 12 जूनियर फुटबाॅलर और कोच को सुरक्षित निकाल लिया गया। मिशन पर पूरी दुनिया की निगाह टिकी थी। दुनिया भर में मासूम खिलाड़ियों के लिए दुआएं हो रहीं थीं। घटना पूरी दुनिया के लिए चुनौती बनी थी। सभ्यता के विकास और आधुनिक जीवन शैली की अकल्पनीय वारदात थी। मौत की गुफा से 18 दिन की इंसानी जद्दोजहद के बाद सभी को सुरिक्षत बाहर निकाल लिया गया। विज्ञान के साथ तकनीकी विकास की यह बड़ी जीत साबित हुई।

अमित शाह का ‘मिशन केरल’ एक फ्लॉप शो

पार्टी की राज्य ईकाई में गुटबंदी का दबदबा
पी श्रीकुमारन - 2018-07-11 09:36 UTC
तिरुअनंतपुरमः बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का बहुप्रचारित केरल मिशन निराशाजनक रूप से फ्लॉप हो गया है। राज्य में बीजेपी का संकट बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा पूर्व राज्य प्रमुख कुमानमान राजशेखरन को हटाकर उन्हें मिजोरम का गवर्नर बनाकर राज्य की राजननीति से दूर करने के कारण हुआ है, हालांकि वैसा इसलिए किया गया था ताकि पार्टी की गुटबंदी समाप्त हो।

जयपुर में प्रधानमंत्री का लाभार्थियों से जनसंवाद

राजस्थान में भाजपा का चुनावी शंखनाद
डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2018-07-10 09:54 UTC
राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर के अमरूदों के बाग से भाजपा ने प्रधानमंत्री लाभार्थी जनसंवाद के माध्यम से चुनावी शंखनाद करके प्रदेश के जनमानस को इस वर्ष के अंतराल में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी ओर आकर्षित करने का भरपूर प्रयास किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी यह अच्छी तरह मालूम है कि वर्तमान में राजस्थान की हवा भाजपा सरकार के विपरीत बह रही है और इस वर्ष के अंतराल में तीन बड़े हिन्दी प्रदेश राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव जहां भाजपा की सरकार कार्यरत है वर्ष 2019 के प्रारम्भ में होने वाले लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में काफी महत्वपूर्ण है।

लोकसभा और विधानसभाओं के साथ-साथ चुनाव

इस पर की जा रही चर्चा समय की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-07-09 09:51 UTC
लोकसभा और राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ होने को लेकर चल रही चर्चा रुकने का नाम नहीं ले रही है, जबकि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक साथ चुनाव हमेशा हो पाना संभव ही नहीं। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद इसकी चर्चा शुरू की थी। निर्वाचन आयोग से पूछा गया था। निर्वाचन आयोग ने कहा कि उसे एक साथ चुनाव कराने में कोई समस्या नहीं होगी, लेकिन इसका फैसला वह नहीं ले सकता।

अदालत के फैसले के बाद केजरी सरकार की अग्निपरीक्षा

उपराज्यपाल को मुख्यमंत्री की सलाह पर ही चलना होगा
योगेश कुमार गोयल - 2018-07-07 08:50 UTC
दिल्ली में निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल के बीच लंबे समय से चली आ रही अधिकारों की जंग को लेकर गत 4 जुलाई को आए देश की सर्वोच्च अदालत की पांच सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले की हालांकि हर राजनीतिक दल अपने-अपने नफा-नुकसान के हिसाब से व्याख्या कर रहा है, कोई इसे अपनी सरकार की जीत बता रहा है तो कोई दिल्ली सरकार की अराजकता की हार लेकिन अदालती फैसले को ध्यान से देखें तो यह न किसी की हार है और न किसी की जीत बल्कि दिल्ली में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अधिकारों की लड़ाई को लेकर जो अजीबोगरीब स्थिति बन गई थी, अदालत ने दिल्ली से जुड़े कानूनों की नए सिरे से व्याख्या कर उन्हीं अधिकारों को स्पष्ट किया है।

सेना की गोपीनियता का भंग होना राष्ट्रहित में कदापि नहीं

सेना का हर एक जवान देश की शान है
डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2018-07-06 15:40 UTC
सेना देश की शान होती है जो हर संकट व मुसीबतों के समय देशवासियों की रक्षा करती है। देश की बाहरीे एवं आंतरिक विरोधी शक्तियों का मुकाबला कर देश की प्रतिष्ठा को बचाती है। आज हम सभी अपनी सेना के बल पर ही अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहे है। सेना को अधिकार है कि देश की रक्षा में जो उचित लगे, दुश्मनों के खिलाफ कार्यवाही करे। इस दिशा में वह हर तरह से स्वतंत्र है। जब भी उसकी इस स्वतंत्रता पर किसी भी तरह अकुंश लगाने की राजनीतिक कोशिश की गई, देश विरोधी ताकतों का मनोबल बढ़ा है। आंतकवादी गतिविधियों में विस्तार हुआ है। सेना के कीमती जवानों सहित कई निर्दोशों की जान बेवजह गई है, जिसकी शहादत को किसी भी कीमत पर भुलाया नहीं जा सकता ।

दुनिया में बढ़ती भूख की चुनौती

भूखमरी हमारे लिए एक सामाजिक कलंक है
प्रभुनाथ शुक्ल - 2018-07-05 16:45 UTC
घर के ठंडे चूल्हे पर खाली पतीली है, बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन सी नशीली है, मशहूर शायर अदम गोंडवी की भूख से सराबोर यह शेर हमें सोचने पर मजबूर करता है। जबकि सपने बेंच कर सिंहासन हासिल करने वाली जमात सिर्फ भाषण बेंचती है। भारत और दुनिया भर में भूख आम समस्या बन गयी है। राजनीति गरीबी और भूखमरी मिटाने में सालों से लगी है, लेकिन भूखे लोगों की भूख नहीं मिट पायी।