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भारत

मोदी अंततः कट्टरवादी हिंदुत्व को ही चुनेंगे

अमितशाह ने अपना सही रूप दिखाया
अमूल्य गांगुली - 2014-04-10 01:48 UTC
जब से नरेन्द्र मोदी को यह अहसास हुआ कि उनका क्रिया और प्रतिक्रिया वाला सिद्धांत गुजरात से बाहर उनके लिए कामगार नहीं होगा, उन्होंने अपना एक नया चेहरा दिखाना शुरू कर दिया। वह नया चेहरा था उदारतावाद का। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की वे मुसलमानों के प्रति नरम रवैया रखते हैं। यह दिखाने के लिए उन्होंने सदभावना अभियान चलाया, जिसके तहत उन्होंने उपवास रखे और सद्भावना सभाओं का आयोजन किया। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि मुसलमान भी उन्हें बहुत चाहते हैं।
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लखनऊ में होगी कड़ी टक्कर: राजनाथ की जीत आसान नहीं

प्रदीप कपूर - 2014-04-08 11:42 UTC
लखनऊः भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह लखनऊ का उम्मीदवार बन तो गए हैं, लेकिन नवाबों के इस शहर में उनकी जीत आसान नहीं है।
भारत

झारखंड में सभी सीटों पर बहुकोणीय मुकाबला

जतीय समीकरण की उपेक्षा भाजपा को पड़ रही है भारी
उपेन्द्र प्रसाद - 2014-04-08 02:41 UTC
झारखंड की लगभग सभी सीटों पर बहुकोणीय मुकाबला हो रहा है। इस बहुकोणीय मुकाबले में नरेन्द्र मोदी एक बड़े चुनावी फैक्टर हैं, लेकिन टिकट वितरण में जातीय समीकरणों का ख्याल नहीं करने का खामियाजा भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों को भुगतना पड़ रहा है।
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नवीन ने चुनाव के पहले ही कांग्रेस को हाशिए पर धकेला

भाजपा बन सकती है उड़ीसा की मुख्य विपक्षी पार्टी
अशोक बी शर्मा - 2014-04-05 11:09 UTC
ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक लगातार चैथी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के लिए आश्वस्त दिख रहे हैं। विधानसभा चुनावों में इस बार उनको पहले से भी बड़ी जीत मिलने की संभावना है। इस समय उनकी पार्टी को लोकसभा में 14 सीटें मिली हुई हैं। चुनाव के बाद ये सीटें बढ़ जाने के पूरे आसार हैं।
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तमिलनाडु में जयललिता की हालत अच्छी

कर्नाटक में कांग्रेस का प्रदर्शन होगा बेहतर
कल्याणी शंकर - 2014-04-04 15:28 UTC
दक्षिण के चारों राज्यों का केन्द्र की सरकार के गठन में हमेशा महत्वपूर्ण योगदान रहा है, पर इस बार वह न तो यूपीए के लिए और न ही एनडीए को ज्यादा सीटें देने जा रहा है। इसका कारण यह है कि दोनों मोर्चे इस बार सिकुड़ गए हैं। 2004 और 2009 में केन्द्र में कांग्रेस सरकार के गठन में दक्षिण भारत के इन राज्यों को बहुत बड़ा योगदान रहा था।
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बदल रहा है पश्चिम बंगाल का मूड

भाजपा की बढ़त से परेशान हैं ममता
आशीष बिश्वास - 2014-04-03 11:37 UTC
कोलकाताः तृणमूल कांग्रेस अब पहले की तरह विश्वास के साथ यह नहीं कह रही है कि वह लोकसभा चुनाव में अपने विरोधियों का सूफड़ा साफ कर देगी। दिल्ली में अन्ना के साथ ममता की रैली की विफलता के पहले जो उत्साह तृणमूल नेताओं में देखा जा रहा था, वह अब कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।
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लोकसभा चुनाव प्रचार के केन्द्र में मोदी क्यों

उपेन्द्र प्रसाद - 2014-04-02 14:15 UTC
सोलहवीं लोकसभा के लिए हो रहा यह चुनाव इस मायने में भी अभूतपूर्व है कि पहली बार कोई एक व्यक्ति चुनाव के केन्द्र में है, जो प्रधानमंत्री पद पर नहीं है। इसके पहले भी हमारे देश में चुनाव व्यक्ति केन्द्रित रहे हैं। 1977 में इन्दिरा गांधी लोकसभा चुनाव के दौरान गैरकांग्रेसी पार्टियों के निशाने पर थीं। लेकिन वह उस समय देश की प्रधानमंत्री थीं और उन्होंने आपातकाल लगाया था। 1980 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस का नारा था, ’’ इन्दिरा लाओ, देश बचाओ’’। कांग्रेस ने तो श्रीमती गांधी को अपनी राजनीति का मुख्य केन्द्र बना रखा था, लेकिन उस समय गैरकांग्रेसी पार्टियों ने इन्दिरा गांधी की सत्ता में फिर से वापसी को मुद्दा उस तरह नहीं बनाया था, जिस तरह आज भाजपा विरोधी पार्टियां नरेन्द्र मोदी को मुद्दा बना रही हैं।
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भोपाल के उम्मीदवार पर भाजपा में विद्रोह

कांग्रेस में भी टिकट वितरण को लेकर असंतोष
एल एस हरदेनिया - 2014-04-01 11:33 UTC
भोपालः मध्यप्रदेश के इतिहास में भारतीय जनता पार्टी को उस तरह के विरोध का सामना कभी नहीं करना पड़ा, जिस तरह के विरोध का सामना उसे भोपाल लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार तय करने के बाद करना पड़ रहा है। भाजपा नेतृत्व ने इस सीट से आलोक संजार को अपना उम्मीदवार बनाया है। जब उनकी उम्मीदवारी की घोषणा हुई, तो उसका सबसे तेज विरोध बाबूलाल गौर ने किया। श्री गौर चैहान मंत्रिमंडल के सबसे वरिष्ठ मंत्री हैं। वे एक बार मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वे भोपाल लोकसभा क्षेत्र में पड़ने वाले एक विधानसभा क्षेत्र से विधायक भी हैं। उन्होंने वहां से 1974 में पहली बार विधानसभा का एक उपचुनाव जीता था। उसके बाद वे वहां से लगातार विधायक हैं और कभी भी कोई चुनाव नहीं हारे हैं।
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राजनैतिक पार्टियों में वंशवादी बुखार जोरों पर

कांग्रेस सूची में सबसे ऊपर
हरिहर स्वरूप - 2014-03-31 17:04 UTC
जिस तरह से देश के कोने कोने में सभी पार्टियों मंे वंशवाद का प्रचलन इस तरह बढ गया है कि अब हम भारतीय लोकतंत्र को वंशवादी लोकतंत्र भी कह सकते हैं। हमारी राजनीति में वंशवाद कोई नई चीज नहीं है, लेकिन अब इसने अपनी गिरफ्त में लगभग सभी पार्टियों को ले लिया है। उत्तर प्रदेश इस वंशवादी राजनीति की राजधानी कहा जा सकता है, जहां 26 उम्मीदवार इस समय वंशवादी राजनीति के कारण टिकट पा सके हैं। कांग्रेस में वैसे 10 उम्मीदवार हैं। समाजवादी पार्टी ने 7 वैसे उम्मीदवार खड़े किए हैं। बहुजन समाज पार्टी के 6 और भारतीय जनता पार्टी के 4 उम्मीदवार भी इस श्रेणी में हैं।
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दिल्ली में त्रिकोणात्मक संघर्ष

कांग्रेस की मुख्य मुकाबले में वापसी
उपेन्द्र प्रसाद - 2014-03-29 15:19 UTC
नई दिल्लीः राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 10 अप्रैल को मतदान होंगे और उसके पहले चुनावी सरगर्मी अपने उत्कर्ष पर पहुंच गई है। परंपरागत रूप में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला होता रहा है। पिछले कई चुनावो से दिल्ली में लोकसभा चुनाव में या तो कांग्रेस का उम्मीदवार जीतता है या भारतीय जनता पार्टी का। 1989 में पिछली बार एक गैर कांग्रेसी गैर भाजपा उम्मीदवार की जीत हुई थी। जिस उम्मीदवार की जीत हुई थी, उनका नाम था राज सिंह मान। लेकिन उनकी जीत भी इसलिए हुई थी, क्यांेकि उन्हें भाजपा का समर्थन हासिल था।