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ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से

जेल और अपराध ...

System Administrator - 2007-10-20 06:51 UTC
इस समय दुनिया एक विशेष तरह की वीभत्स पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही है जिसमें जीवन के अधिकांश पक्षों की योग्यता, श्रेष्ठता और वांछनीयता के लिए पूंजी या धन को ही सर्वोच्च मानदंड माना जा रहा है। इस समाज ने अधिकांश कार्यों के लिए न्यूनतम धन का निर्धारण किया है जिससे कम धन वालों को अयोग्य करार दिया जाता है –
ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से

दिल्ली का संकट ...

System Administrator - 2007-10-20 06:49 UTC
दिल्ली की बदहाली के लिए बाहर से आने वाले लोगों, विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश से, को दोषी ठहराने वाले अपने बयान पर मुख्य मंत्री शीला दीक्षित ने माफी मांग ली, लेकिन इससे मूल मुद्दा खत्म नहीं होता। लोक सभा में उनके बयान पर हंगामा होने और सदन में उन्हें तलब किये जाने के बाद उनके पास माफी मांगने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया था, लेकिन दिल्ली की बदहाली के लिए उनकी सरकार को माफ नहीं किया जा सकता।
ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से

बीस रुपये से भी कम पर गुजारा

System Administrator - 2007-10-20 06:41 UTC
अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री के कार्यकाल में भारत में गरीबों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इससे भी ज्यादा आश्चर्य यह कि डा. मनमोहन सिंह देश के विकास के नाम पर अभी भी अपनी पीठ थपथपाते हैं। कहते हैं कि उनकी आर्थिक नीतियां ही सही हैं। उधर करोड़ों लोग दाने - दाने को तरस रहे हैं।

ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से

नांदीग्राम कांड ...

System Administrator - 2007-10-20 06:32 UTC
आम लोगों को सामाजिक और आर्थिक न्याय दिलाने के आंदोलन में हमारे पूर्वज वामपंथियों में से अनेकों के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता, लेकिन इस आधार पर आज के नकली वामपंथियों पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं है।
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छत्तीसगढ़ में हिंसा और ...

System Administrator - 2007-10-20 06:19 UTC
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में बीजापुर जिले के रानीपोटली गांव स्थित सशस्त्र बल के एक शिविर पर माओवादियों के हमले में कल 54 लोगों की जानें गयीं जिनमें छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल के 15 जवान भी शामिल थे। शेष मृतक स्थानीय आदिवासी युवा थे जिन्हें विशेष पुलिस अधिकारी का ओहदा देकर नक्सलियों का मुकाबला करने के लिए सल्वा जुडुम संगठन में शामिल किया गया था।
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बदलता उत्तर प्रदेश

मायावती, मुलायम और मनमोहन
System Administrator - 2007-10-20 06:14 UTC
क्या मायावती बहुस्तरीय अन्यायपूर्ण और शोषण पर आधारित प्रणाली बदल पायेंगी ?
उत्तर प्रदेश की सत्ता में अपने दम पर बहुमत से आने के बाद मायावती जाति, नस्ल, और धर्म से ऊपर उठकर विकास की राजनीति के रास्ते चल पड़ी हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन इससे भी अच्छी बात यह कि हाल में उनके द्वारा उठाये गये साहसिक कदम के तहत अन्यायपूर्ण और शोषण पर आधारित अर्थव्यवस्था बदलने की कोशिश एक ऐसे समय में की गयी है जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केन्द्र की सरकार उसका सम्पोषण करते हुए उसी गलत प्रणाली को बढ़ावा दे रही है और राज्य के पूर्व मुख्य मंत्री मुलायम सिंह ने भी ऐसा ही किया था। लेकिन सवाल है कि क्या वह सफल हो पायेंगी या फिर उसी दुश्चक्र में फंस जायेंगी?
ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से

हरियाणा में पंचायती राज

System Administrator - 2007-10-20 05:59 UTC
सारे देश की तरह हरियाणा में भी पंचायती राज के मामले में सरकार असंवैधानिक तौर तरीकों से चल रही है और स्वसरकार (तीसरे तृणमूल स्तर की सरकार) का बंटाधार किया जा रहा है, लेकिन जनता को लुभाने के लिए आकर्षक घोषणाएं की जाती हैं और पत्रकार सम्मेलनों में उन्हें इस ढंग से पेश किया जाता है मानो सरकार ने तीर मार लिया।
ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से

गरीब-विरोधी रेलवे ...

System Administrator - 2007-10-20 05:57 UTC
भारत के रेलवे स्टेशनों पर सामान बेचकर आजीविका चलाने वाले गरीब वेंडरों की गर्दनें अब बलि के खूंटे पर रख दी गयी हैं। उन्हें नीतिगत सुधारों के नाम पर धनी ठेकेदारों से मुकाबला करने को विवश किया जा रहा है। स्वाभाविक तौर पर गरीब वेंडरों को अपने काम और आजीविका से हाथ धोना पड़ेगा।

ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से

सांसद और संसदीय आचार संहिता

System Administrator - 2007-10-20 05:54 UTC
गुरुवार को भारतीय संसद के पतन का एक और रिकार्ड उस समय बना जब जद (यू) नेता प्रभुनाथ सिंह और राजद नेता तथा रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के साले साधु यादव के बीच हाथापाई की नौबत आ गयी। फिर दोनों तरफ के सदस्यों द्वारा उत्पन्न किये गये गाली-ग्लौज और शोर-गुल के माहौल में प्रभुनाथ सिंह ने लोक सभा की सदस्यता से त्यागपत्र भी दे दिया।
ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से

राजनीतिज्ञों के निशाने पर ...

System Administrator - 2007-10-20 05:52 UTC
भारत वैश्वीकरण की नीति पर चल रहा है। हमारे नेता बड़े उत्साह के साथ आगे बढ़ रहे हैं। विधायिका और कार्यपालिका को चलाने वाले ये जन प्रतिनिधि जिस दिशा में बढ़ रहे हैं और जितनी तेजी से बढ़ रहे हैं उतनी तेजी से बेचारी न्यायपालिका नहीं चल पा रही है।