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अष्टछाप कवि

वल्लभाचार्य के चार तथा उनके पुत्र विट्ठलनाथ के चार शिष्यों के अष्टछाप कवि कहा जाता है। ये अष्टसखा के नाम से भी विख्यात हैं।

ये हैं - कुम्भनदास (1468-1582), सूरदास (1478-1580 से 1585 के बीच), कृष्णदास (1495 – 1575 से 1581 के बीच) , परमानंददास (1491-1583), गोविन्ददास (1505-1585), छीतस्वामी (1481-1585) , नन्ददास (1533 – 1586), तथा चतुर्भुजदास (1540-1585)।

इन भक्त संत कवियों के बारे में प्रसिद्ध है कि ये अच्छे गायक भी थे।

कहा जाता है कि गोविन्ददास से संगीत सीखने के लिए तानसेन भी आते थे तथा छीतस्वामी का संगीत सुनने के लिए राजा अकबर वेश बदलकर जाते थे।

अष्टछाप कवि कृष्णभक्ति के लिए जाने जाते हैं।

अष्टछाप कवियों का न केवल पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय में बल्कि पूरे समाज में प्रभाव था। कृष्णभक्ति आन्दोलन में इसका महान् योगदान है। इस आन्दोलन ने पूरे समाज को एक नवीन चेतना दी थी। समाज के सभी वर्गों को आशा की नयी किरण दिखायी दी।

इन भक्त कवियों में ऊंच-नीच का भेद नहीं था। स्त्री, शूद्र, वेश्या तथा पतित पुरुष-स्त्रियों तक में कृष्णभक्ति के सहारे मुक्ति पा लेने की उम्मीद जगी। उन्होंने रूढ़ियों के कारण जर्जर समाज में नयी जान डाल दी थी।

उनकी कविताओं ने जीवन तथा साहित्य में मानवता के नये मूल्यों की स्थापना की थी।

Page last modified on Saturday February 1, 2014 10:41:33 GMT-0000