भारत
क्षेत्रीय दलीय नेताओं से जूझती यूपीए सरकार
- 2010-08-10 13:06 UTCभारतीय राजनीति का ढांचा कुछ ऐसा हो गया है कि आज सभी दलों का वर्चस्व कायम हो गया है और इन दलों के नेताओं की क्षमता और बहुमत की बात कही जाए तो उसमें कुछ ही नेता अपने आपको जनता के सामने मुखर पाते हैं और अन्य केवल कागजी घोड़े बनते नज़र आ रहे है और अन्य रास्तों से अपनी क्षमता के अनुसार नहीं बल्कि पैसे के बल पर संसद की सीढ़ियां चढ़ने को मजबूर हो चुके है। बिहार तथा उत्तर प्रदेश समेत उत्तरोपूर्व तथा दक्षिण में भी क्षेत्रीय दलों का बोलबाला हो चुका है। एक दल से कई दल निकल चुके है। करूणानीधि और जयललिता तमिल राजनीति की धूरी बनती जा रही है। करूणा नही ंतो जयललिता सही। जम्मू व कश्मीर में अब्दुला नहीं तो महबूबा ही सही। लेकिन कहीं कांग्रेस नहीं तो भाजपा ही सही और उत्तर प्रदेश में तो माया नहीं तो मुलायम ही सही वाली स्थिति बनती जा रही है।