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दिल्ली चुनाव के आइने में कांग्रेस का भविष्य

अभी भी इसे बचाया जा सकता है
उपेन्द्र प्रसाद - 2020-02-19 10:43
दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत हुई और भारतीय जनता पार्टी की हार हुई, लेकिन आज ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि कोई यह नहीं कह रहा कि यहां कांग्रेस की हार हा गई है। कारण स्पष्ट है, उसकी हार चर्चा का विषय होती है, जिसकी जीत की उम्मीद थी, लेकिन कांग्रेस की जीत की तो कोई उम्मीद ही नहीं थी। देश की सबसे बड़ी पार्टी के लिए चुनावी आशावाद सिर्फ इसको लेकर ही था कि शायद कांग्रेस अपना खाता खोल ले। यदि कांग्रेस को वास्तव में एक सीट भी मिल जाती तो कुछ कांग्रेस नेता खुश होकर बोलते कि खाता खुल जाना ही उनकी जीत है। लेकिन दिल्ली की जनता ने संतोष करने के लिए कांग्रेस को एक सीट तक नहीं दी।

मध्यप्रदेश में कांग्रेस का गुटीय संघर्ष जारी

कमलनाथ के हाथों अपमानित महसूस कर रहे हैं सिंधिया
एल एस हरदेनिया - 2020-02-18 13:04
भोपालः बीजेपी ने आखिरकार मध्यप्रदेश के लिए अपना अध्यक्ष चुन लिया है, लेकिन कांग्रेस अभी भी इस मुद्दे को सुलझा नही पा रही है। इस बीच मुख्यमंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच दरार लगातार बढती जा रही है और एक दूसरे के खिलाफ दोनों के तेवर तल्ख होते जा रहे हैं।

भारत के लिए चीन का एटीआर ब्रेक

के रवीन्द्रन - 2020-02-17 11:23
थोड़ा डराने के बाद, घरेलू पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है। यह निश्चित रूप से मोदी सरकार के लिए सांत्वना का एक बिंदु है, जो सभी संभावित आर्थिक मोर्चों पर परेशानी का सामना कर रही है।

बोडो समझौते खड़े कर सकते हैं असुविधाजनक सवाल

बीजेपी को असम में नहीं हो पाएगा राजनैतिक लाभ
बरुन दास गुप्ता - 2020-02-15 11:08
पिछले महीने के अंत में केंद्र ने असम में कई आतंकवादी समूहों केे साथ एक और शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए। इनमें नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड, राभा नेशनल लिबरेशन फ्रंट, कामतापुर लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन, नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ बंगालिज शामिल हैं। इनमें से अधिकांश कागजी संगठन थे जिनके पास समस्या पैदा करने की बहुत कम ताकत थी। यह भी अच्छी बात है कि 644 आतंकवादियों ने गुवाहाटी में आत्मसमर्पण कर दिया था। रिपोर्टों से पता चलता है कि उनमें से लगभग सभी ने सुरक्षा बलों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया|

आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अनुचित

सामाजिक न्याय के लिए एक बड़ा झटका है
डी राजा - 2020-02-14 11:29
अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को नौकरियों और शिक्षा में संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के आधार पर आरक्षण दिया जाता है ताकि जाति की वजह से भेदभाव, असमानता और अभाव की समस्याओं को दूर किया जा सके।

दिल्ली के बाद क्या बिहार की बारी है?

लेकिन पाटलीपुत्र में राजग को हराना आसान नहीं
उपेन्द्र प्रसाद - 2020-02-13 10:36
दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी हार गई। यह उसकी लगातार सातवीं विधानसभा हार है। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद यह उसकी चैथे राज्य में हार है, जबकि उस लोकसभा चुनाव के पहले उसने एक साथ ही तीन राज्यों में पराजय का सामना किया था। एक साथ उसने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ गंवा दिए थे। लोकसभा की जीत में उन तीनों राज्यों की हार ढक गई थी, लेकिन चार राज्यों में एक के बाद एक हारने के बाद अब उन तीनों राज्यों की हार भी ताजा हो गई है।

संप्रदायिकता के जहर ने भी बीजेपी की मदद नहीं की

दिल्ली में मोदी- शाह की करारी हार
अमूल्य गांगुली - 2020-02-12 12:13
बहुत लोगों ने आम आदमी पार्टी से पांच साल पहले के अपने धमाकेदार प्रदर्शन को दोहराने की उम्मीद की होगी। उस समय उसने 70 में से 67 विधानसभा सीटें जीती थीं। लेकिन यह तथ्य कि यह 62 सीटों को जीत चुका है और अपने 50 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर को बनाए रखने में सफल रहा है। यह दर्शाता है कि इसकी राजनीतिक अपील में बहुत कम कमी आई है।

दिल्ली में भारत जीत गया और नफरत हार गई

उपेन्द्र प्रसाद - 2020-02-11 10:50
दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी एक बार फिर विजयी हुई है। यह उसका कोई साधारण विजय नहीं है। एक मायने में यह 2015 वाली विजय से भी बड़ी है, क्योंकि उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने उतना जोर नहीं लगाया था, जितना इस बार लगा दिया। हां, यह सच है कि नरेन्द्र मोदी ने इस बार कम चुनावी रैलियां की। लेकिन इसका कारण यह था कि भारतीय जनता पार्टी नरेन्द्र मोदी की प्रतिष्ठा को दांव पर नहीं लगाना चाहती थी। उसे पहले ही दिन से पता था कि दिल्ली चुनाव की डगर उसके माकूल नहीं है, क्योंकि केजरीवाल सरकार का प्रदर्शन यहां बहुत ही शानदार रहा था। केजरीवाल का जादू चुनावी माहौल बनते ही लोगों के सिर पर चढ़ कर बोल रहा था कि शायद भाजपा को शून्य सीटों से ही संतोष करना पड़े। यही कारण है कि नरेन्द्र मोदी ने इस चुनाव में अपने आपको उस तरह नहीं झोंका, जिस तरह किसी भी विधानसभा चुनाव में अपने आपको झोंकने की उनकी आदत है।

मोहन भागवत ने मप्र पर इतना ध्यान क्यों केंद्रित कर रखा हैं?

वे एक के बाद एक शिविरों में भाग ले रहे हैं
एल एस हरदेनिया - 2020-02-10 10:33
भोपालः मध्यप्रदेश में आरएसएस प्रमुख डॉ मोहन भागवत द्वारा दिए जा रहे अतिरिक्त ध्यान पर रहस्य छाया हुआ है। पिछले तीन से चार महीनों में भागवत ने राज्य के कई शहरों में शिविरों का आयोजन किया है। वर्तमान में, वह भोपाल में पांच दिवसीय शिविर में भाग ले रहे हैं। राज्य में आरएसएस के विशेष ध्यान के लिए जिम्मेदार कारणों में से एक यह है कि कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने नरम हिंदुत्व की छवि बनाने के लिए कई कार्यक्रम किए हैं। कमलनाथ की रणनीति कांग्रेस के लिए काम करती प्रतीत होती है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव-2003

शीला के काम ने कांग्रेस को फिर जिताया, भाजपा को फिर मिली करारी हार
अनिल जैन - 2020-02-08 15:42
केंद्र में एनडीए की सरकार होने के बावजूद दिल्ली की मुख्यमंत्री के तौर पर शीला दीक्षित को काम करने में कोई खास परेशानी नहीं हुई। पूरे पांच साल के दौरान केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच शायद ही कभी टकराव की स्थिति पैदा हुई हो। हालांकि दिल्ली में कांग्रेस की सरकार बनने के एक साल बाद यानी 1999 में ही केंद्र में वाजपेयी सरकार गिरने की वजह से देश को फिर मध्यावधि चुनाव का सामना करना पडा। दिल्ली की जिस जनता ने एक साल पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा को बुरी तरह धूल चटाई थी, उसी जनता ने इस बार लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें भाजपा की झोली में डाल दी थी। लेकिन जब 2003 के विधानसभा चुनाव का वक्त आया तो कांग्रेस पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनाव मैदान में उतरी, क्योंकि शीला दीक्षित सरकार के पास थे पांच साल के विकास कार्य और उनकी निरंतरता का मुद्दा। दूसरी ओर कई गुटों में बंटी भाजपा बिल्कुल मुद्दाविहीन स्थिति में थी। अलबत्ता वाजपेयी सरकार का ‘शाइनिंग इंडिया’ और ‘फील गुड फैक्टर’ का प्रचार जोरों पर था।