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इस्पात निर्माण और खनन में भारत-पोलैंड द्विपक्षीय सहयोग

इस्पात मंत्री की पोलैंड यात्रा
एस एन वर्मा - 2013-10-29 11:04 UTC
इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने इस्पात निर्माण एवं कोयला खनन के क्षेत्र में भारत और पोलैंड के बीच संबंधों को मजबूत बनाने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। श्री वर्मा पोलैंड गणराज्य के उप प्रधानमंत्री, अर्थव्यवस्था मंत्री, श्री यानूस पेहोचिंस्कि पेहोचिंस्कि के साथ को वारसाव में मुलाकात की।

केरल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी

क्या वह हिंदू नाराजगी का लाभ उठा पाएगी?
पी श्रीकुमारन - 2013-10-29 10:22 UTC
तिरुअनंतपुरमः जैसे जैसे लोकसभा का चुनाव नजदीक आ रहा है केरल भाजपा का आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा है। क्या भारतीय जनता पार्टी का यह आत्मविश्वास ठोस धरातल पर आधारित है? इसे समझने के लिए भारतीय जनता पार्टी की राजनीति पर एक नजर डालनी होगी।

आतंकवाद को बिहार का मुहतोड़ जवाब

धमाकों के बीच रैली का अनूठा कीर्तिमान
उपेन्द्र प्रसाद - 2013-10-28 10:27 UTC
लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बनने के सबसे प्रबल दावेदार नरेन्द्र मोदी की पटना रैली की बहुत दिनों से प्रतीक्षा की जा रही थी। इसका कारण है कि उनके प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने का सबसे ज्यादा विरोध और समर्थन बिहार में ही हो रहा था। उनका वह विरोध और समर्थन सियासी स्तर पर हो रहा था। जनता के स्तर पर उनकी क्या लोकप्रियता और किस तरह का विरोध उन्हें देखने को मिलता है, इस पर सबकी नजरें टिकी हुई थी। कुछ लोग उम्मीद कर रहे थे कि गोधरा के बाद गुजरात में हुए दंगे का मुद्दा उठाकर कोई समूह उनका पटना में सांकेतिक विरोध बगैरह कर सकता है, लेकिन उनका विरोध हुआ बमों के धमाके से, जो सवा तीन घंटे तक रुक रुक कर होते रहे।

इन्दिरा ने राज्य स्तर पर कांग्रेस को नेतृत्वहीन कर दिया था

क्या राहुल गांधी नेतृत्व खड़ा कर पाएंगे?
हरिहर स्वरूप - 2013-10-28 10:23 UTC
काग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के सामने राज्य और जिला स्तरों पर पार्टी के नेतृत्व के निर्माण की कठिन चुनाती है। सच तो यह है कि अभी इन स्तरों पर कांग्रेस के संगठन की जो समस्या है, वह इन्दिरा गांधी कीे राजनीति का परिणाम है। उन्होंने कांग्रेस पर अपनी पकड़ को बनाए रखने के लिए राज्य स्तर के कांग्रेसी नेताओं को कमजोर करना शुरू कर दिया था। स्थापित नेताओं को उन्होंने कमजोर तो किया ही था, नये नेताओं को उन्होंने उभरने भी नहीं दिया था। इन्दिरा गांधी ने अपने समय में जो किया था, वह सिलसिला उनके बाद भी जारी रहा। उसका असर यह हुआ कि कांग्रेस धीरे धीरे जमीनी नेताओं से विहीन होती गई। और आज इतना खराब हाल हो गया है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में उसका कोई नेता ही नहीं दिखाई पड़ रहा है। यही हाल बिहार, झारखंड और उड़ीसा में भी है। देश के अन्य अनेक राज्यों में भी स्थ्तिि कोई बेहतर नहीं हैं।

दिल्ली एक बार फिर बन गई है कुरुक्षेत्र

क्या शीला चैथी बार जीत पाएंगी?
कल्याणी शंकर - 2013-10-25 12:05 UTC
आगामी 4 दिसंबर को दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतदान है। शीला दीक्षित खुद कांग्रेस की जीत के प्रति बहुत आश्वस्त नहीं है, क्योंकि वह तीन बार से लगातार चुनाव जीत रही हैं और रिकार्ड चैथी बार चुनाव जीतना आसान नहीं होता है।

दलित मतदाताओं को लुभाने की कोशिश में सपा

मायावती के गढ़ पर मुलायम का हमला
प्रदीप कपूर - 2013-10-24 10:30 UTC
लखनऊः समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव लगातार अपने कार्यकत्र्ताओं से कह रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवारों की जीत वे सुनिश्चित कराएं। इसी क्रम में उन्होने दलित मतदाताओं को अपनी ओर खींचने के लिए भी पुख्ता रणनीति बनाने में लगे हुए हैं।

अपनी कब्र खुद खोद रही है कांग्रेस

मां बेटा मिलकर पार्टी को डुबो देंगे
अमूल्य गांगुली - 2013-10-23 11:42 UTC
अपने पैर पर कुल्हाड़ी चलाने में कांग्रेस अन्य सभी पार्टियों से आगे है। 1989 के लोकसभा चुनाव में उसकी दो कारणों से हार हुई थी। एक कारण था शाहबानों केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए मुस्लिम कट्टरवादियों के सामने किया गया आत्मसमर्पण। उसने उन्हें खुश करने के लिए संविधान में संशोधन कर डाला और शाहबानों मामले में हुए फैसले को निरस्त कर डाला। उसने दूसरा फैसला बाबरी मस्जिद के बंद पड़े ताले को खुलवा कर किया। वह ताला 1949 से ही बाबरी मस्जिद पर जड़ा हुआ था। उसे खुलवाने का फैसला कांग्रेस ने हि‘दू कट्टरवादियों को खुश करने के लिए किया था। राजीव गांधी ने तब सोचा था कि शाहबानों केस के फैसले को निरस्त करवाकर वह मुसलमानों का वोट हासिल कर लेंगे और बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर हिंदुओं का वोट। लेकिन उनका अनुमान गलत निकला। 1984-85 के चुनाव में 410 से भी ज्यादा लोकसभा सीटें पाने वाली कांग्रेस 1989 के लोकसभा चुनाव में 200 सीटें भी जीत नहीं पाईं। इस तरह उसे लोकसभा में जो बड़ा बहुमत हासिल हुआ था, उसका इस्तेमाल उसने अपनी बर्बादी में किया।

बंगाल में वामपंथी कर रहे हैं रणनीति पर बहस

तृणमूल का सामना कर पाने में सीपीएम विफल
आशीष बिश्वास - 2013-10-22 11:27 UTC
पश्चिम बंगाल में सीपीएम के सामने दो विकल्प हैं - या तो वे तृणमूल का सामना करें या बेहतर समय आने का इंतजार करें।

चुनावों पर वंशवाद का दबदबा, मध्यप्रदेश सबसे आगे

हरिहर स्वरूप - 2013-10-22 11:23 UTC
वंशवाद की राजनीति देश पर हावी होती जा रही है। राजनेताओं के बच्चे और बच्चियों का दबदबा राजनीति पर इस कदर बढ़ता जा रहा है कि इससे दलीय व्यवस्था और दलीय लोकतंत्र पर ही खतरा पैदा होने का डर लगा रहा है। वंशवाद अब सिर्फ गांधी नेहरू परिवार या कश्मीर के अब्दुल्ला या हरियाणा के चैटाला, उडीसा के पटनायक, तमिलनाडु के करुणानिधि, उत्तर प्रदेश के मुलायम, महाराष्ट्र के शरद पवार और बिहार के लालू तक सीमित नहीं रह गया है। वह देश के हरेक हिस्से में दीमक की तरह फैलता जा रहा है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल का जलवा

पहली बार हो रहा है त्रिकोणात्मक संघर्ष
उपेन्द्र प्रसाद - 2013-10-20 18:21 UTC
दिल्ली की राजनीति शुरू से ही दो ध्रुवीय रही है। यहां मुकाबला कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच ही होता रहा है। 1993 के विधानसभा चुनाव में जनता दल ने तब मुकाबले को तितरफा बनाने की कोशिश जरूर की थी। उस समय उसके नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह अपनी जनसभाओं में सबसे ज्यादा भीड़ जुटा रहे थे। बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद और रामविलास पासवान की सभाएं भी बड़ी बड़ी हुआ करती थीं, लेकिन तब जनता दल का मात्र 4 सीटें मिली थीं, हालांकि उसे 10 फीसदी से ज्यादा वोट आए थे। जाहिर है, मुकाबला दोतरफा ही रहा था, जिसमें भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई थी।