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प्रणब की नागपुर यात्रा का राजनीतिक और सामाजिक महत्व

संघ की छवि बनाने की कोशिश
अनिल सिन्हा - 2018-06-09 10:44 UTC
पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व कांग्रेस नेता प्रणब मुखर्जी का आरएसएस के नागपुर मुख्यालय में आयोजित एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाग लेना भारतीय राजनीति की एक बड़ी घटना है। इसमें दो बातें साफ दिखाई देती है। एक, आरएसएस आने वाले लोक सभा चुनावों में एक नए तरीके से मैदान में आएगा और दूसरा, राहुल गांधी को अपनी ही पार्टी के कारपोरेट समर्थक लाबी का सामना करना पड़ेगा। इस घटना पर जानबूझ कर संवाद और सहमति का मुलम्मा चढाया जा रहा है। लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रणब दा कोई भोले राजनेता नहीं है और न ही उनका इतिहास किसी जुझारू नेता का है। वह आपातकाल में संजय गांधी के सहयोगी थे और बाद में कारपोरेट समर्थक आर्थिक नीतियों को लागू करने में आगे रहने वाले नेताओं में से रहे हैं। उनके नागपुर जाने को न तो आम सहमति बनाने के गांधीवादी कदम के रूप में लिया जाना चाहिए और न ही एक गैर-राजनीतिक कदम के रूप में।

आरएसएस के कैंप में प्रणब मुखर्जी

संघ का मंसूबा पूरा नहीं हो सका
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-06-08 10:26 UTC
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने कैंप में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को जिन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आमंत्रित किया था, वे उद्देश्य पराजित हो चुके हैं। एक तरफ आरएसएस की भाजपा भारत को कांग्रेस मुक्त बनाने का अभियान चलाती है, तो दूसरी तरफ वह कांग्रेसियों को भारतीय जनता पार्टी में शामिल करने के लिए भी प्रेरित करती है। प्रणब मुखर्जी को अपने कैंप में बुलाकर वह इसी अभियान को मजबूती प्रदान करना चाहता था।

योगी बनाम बाबा: सुशासन की खुली पोल

उपेन्द्र प्रसाद - 2018-06-07 16:56 UTC
बाबा रामदेव और योगी आदित्यनाथ की सरकार के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है, इसका पता उस समय चला जब पतंजति उद्योग समूह के प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण ने उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना करते हुए अपने फूड पार्क को उत्तर प्रदेश से बाहर ले जाने की घोषणा की दी। यह एक सनसनीखेज खबर थी। क्योंकि बाबा रामदेव भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं के साथ कुछ इस तरह जुड़े हुए हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता कि भाजपा की सरकार में उनका दिक्क्त हो सकती है।

शिव सेना-बीजेपी में दरार से सांप्रदायिक तनाव

महाराष्ट्र सरकार स्थिति नियंत्रित करने में विफल
डॉ भालचंद्र कांगो - 2018-06-06 16:31 UTC
औरंगाबादः शिवसेना ने 19 मई को औरंगाबाद में शहर पुलिस और गृह विभाग के खिलाफ हिंदू शक्ति मार्च का आयोजन किया और आरोप लगाया कि हालिया हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने में वे नाकाम रहे।

उपचुनावों के परिणाम में छिपे हैं आगामी चुनावों का भविष्य

डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2018-06-05 10:10 UTC
देश में नरेन्द्र मोदी के नेतृृत्व में केन्द्र शासित भाजपा अब तक अपने 4 वर्ष के कार्य काल के दौरान हुए 27 लोकसभा उपचुनाव में मात्र 5 सीट ही हासिल कर पाई जब कि इस वर्ष हुए 28 उपचुनाव में से मात्र 3 उपचुनाव में ही जीत दर्ज करा पाई। अभी हाल ही में तीन राज्यों की 4 लोकसभा एवं 9 राज्यों की 11 विधान सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा मात्र एक - एक सीट पर ही जीत हासिल कर पाई। इस तरह के हालात आगामी चुनावों में भाजपा के लिये बड़ी चुनौती बन सामने उभर कर आ रहे है जहां दिन पर दिन बढ़ता भाजपा का ग्राफ गिरता नजर आ रहा है।

नीतीश एक बार फिर अपने पुराने रंग में

मोदी को दिखा रहे हैं अपना महत्व
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-06-04 11:17 UTC
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर अपने पुराने रंग में वापस आ गए हैं। बिना किसी जनाधार के बिहार की राजनीति को पिछले 13 सालों से अपने पीछे चलाने का रिकाॅर्ड उनके पास है और वे ऐसा इसलिए कर पाते हैं, क्योकि वे अपने विरोधियो और सहयोगियों की कमजोर नसों को बेहतर तरीके से समझते हैं। उनके पिताजी वैद्य थे और वे किसी मरीज की नस पकड़ कर उसकी बीमारी का पता लगाते थे और उसका इलाज भी करते थे। तब नीतीश कुमार, जैसा कि वह खुद कह चुके हैं, अपने पिता के पास बैठकर दवाई की पुड़िया बनाया करते थे।

उपचुनाव के नतीजे बानगी हैं 2019 की

वादाखिलाफी का बदला जनता मत डालकर ले रही है
अनिल जैन - 2018-06-02 11:32 UTC
पिछले चार वर्षों के दौरान देश में लोकसभा चुनाव समेत जितने भी चुनाव-उपचुनाव हुए हैं, सभी के नतीजों में प्रायः सत्ता विरोधी रुझान साफ दिखा है। इसी रुझान के चलते भाजपा ने न सिर्फ केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाई बल्कि वह उन सभी राज्यों में भी अपनी या अपने सहयोगी दलों की मदद से गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब रही है जहां पहले कांग्रेस या अन्य दलों की सरकारें थीं। इसी रुझान के चलते पिछले चार वर्षों के दौरान लोकसभा और विधानसभा के जितने भी उपचुनाव हुए उनमें भी इक्का-दुक्का सीटों को छोडकर सभी के नतीजे भाजपा के खिलाफ गए हैं। यही रुझान हाल ही में दस राज्यों में विधानसभा की 11 और लोकसभा की चार सीटों के लिए हुए उपचुनाव में भी भाजपा की हार के रूप में साफ तौर पर देखने को मिला है। भाजपा अपनी महज एक लोकसभा और एक विधानसभा सीट किसी तरह बचाने में कामयाब रही है।

उपचुनावों के नतीजे: क्या भाजपा शासन के अंत की शुरुआत हो चुकी है

उपेन्द्र प्रसाद - 2018-06-01 09:46 UTC
इस बार 10 विधानसभा और 4 लोकसभा क्षेत्रों के चुनाव हो रहे थे। ये चुनाव क्षेत्र देश के 10 राज्यों में फैले हुए थे। इन उपचुनावों में भाजपा को भारी हार का सामना करना पड़ा। उसके हाथ सिर्फ एक लोकसभा और एक विधानसभा की सीट ही लगी। वह इस बात के लिए संतोष कर सकती है कि उसकी एक सहयोगी पार्टी को नगालैंड की सीट हाथ लगी।

कैराना उपचुनाव के सबक

एकजुट विपक्ष के सामने नहीं टिक सकती भाजपा
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-05-31 12:05 UTC
उत्तर प्रदेश के कैराना लोकसभा सीट से भाजपा की करारी हार का संदेश स्पष्ट है और वह संदेश यह है कि यदि विपक्ष एकजुट होकर चुनाव लड़े, तो फिर भाजपा का 2019 लोकसभा चुनाव के बाद सत्ता में बने रहने का सवाल ही नहीं है। कर्नाटक में अल्पमत में होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने जिस प्रकार सरकार बनाने की कोशिश की है, उसमें उसका 2019 का इरादा भी साफ दिखाई पड़ता है। यानी अल्पमत में रहने के बावजूद वह अपनी सरकार सिर्फ इस बिना पर बनाएगी कि लोकसभा में सबसे ज्यादा सीटें जीतकर लाई है, भले ही उसे बहुमत का समर्थन हासिल हो या न हो।

कर्नाटक चुनाव और न्यायपालिका

लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का करने में कोर्ट समर्थ है
डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2018-05-30 09:59 UTC
कर्नाटक में विधान सभा चुनाव के आये परिणाम के बाद वहां संवैधानिक संकट पैदा हो गया था। वहां किसी भी राजनीतिक दल को सरकार बनाने हेतु स्पष्ट जनादेश नहीं मिला था। सत्तारूढ़ कांग्रेस चुनाव हार गई थी। मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी भी चुनाव हार गई थी। वहां एक खंडित जनादेश मिला था, जिसके तहत तीन पार्टियों मे से दो आपस में गठबंधन कर ही सरकार बना सकते थे। हम दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वहां जनादेश तीन मुख्य पार्टियों मे से दो को मिलकर सरकार चलाने का था।