विपक्षी एकता: विचारधारा की उलझनें
विपक्षी पार्टियों के पास मोदी-विरोध का कोई साझा मुद्दा नहीं
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2018-05-05 10:37 UTC
दिल्ली के कंस्टीच्यूशन क्लब में 1 मई को लगी विपक्षी नेताओं की जमघट असरदार थी। कई पार्टियों ने इसमें हिस्सा लिया। समाजवादी अंादोलन के शीर्ष नेताओं में से एक मधु लिमये की जयंती पर आयोजित इस सभा का विषय भी मौके के मुताबिक ही था-प्रगतिशील ताकतों की एकता। मधु लिमये आरएसएस और भारतीय जनसंघ (भारतीय जनता पार्टी का पुराना संस्करण) के कट्टर विरेाधी तथा समाजवादी और साम्यवादी पार्टियां की एकता के हिमायती थे। हालांकि गैर-कांग्रेसवाद और इंदिरा गांधी के तीखे विरोध की राजनीति में वे आगे रहे, लेकिन अपनी धारा के वे शायद अकेले नेता थे जिन्होंने आरएसएस की राजनीति का उस समय इतना तीव्र विरोध किया था जब कोई उसे बड़ा खतरा मानने को तैयार नहीं था। वे हिंदुत्व को देश के लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे। उन्होंने 1977 में सत्ता में आई जनता पार्टी के उन सदस्यों को आरएसएस की सदस्यता छोड़ने के लिए कहा था जो भारतीय जनसंघ के विलय के बाद पार्टी में आए थे।